स्टडी मटेरियल

डच (1596)

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1602 ई. में डच (हॉलैण्ड) संसद द्वारा पारित प्रस्ताव से एक संयुक्त डच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना हुई, इस कंपनी को डच संसद द्वारा 21वर्षों के लिए भारत तथा पूरब के देशों के साथ व्यापार करने,आक्रमण और विजयें करने से सम्बंधित अधिकार पत्र मिला ।

डच ईस्ट इंडिया कंपनी की आरंभिक पूँजी जिससे उन्हें व्यापार करना था 6,500,000 गिल्डर थी।

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भारत में शीघ्र ही वेरिगदे ओस्त-इंडिसे कंपनी ने मसाला व्यापार पर एकाधिकार हासिल कर लिया।

भारत में डच फैक्ट्रियों की सबसे बङी विशेषता यह थी कि पुलीकट स्थित गेल्ड्रिया के दुर्ग के अलावा सभी डच बस्तियों में कोई भी किलेबंदी नहीं थी।

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डच ईस्ट इंडिया कंपनी की भारत से अधिक रुचि इंडोनेशिया के मसाला व्यापार में थी।

डचों ने 1613ई. में जकार्ता को जीतकर बैटविया नामक नये नगर की स्थापना की, 1641 ई. में डचों ने मलक्का और 1658 ई. में सिलोन पर कब्जा कर लिया।

डचों ने 1605 ई. में मुसलीपट्टम् में प्रथम डच कारखानें की स्थापना की।

डचों द्वारा भारत में स्थापित कुछ अन्य कारखानों की स्थापना की गई जो इस प्रकार हैं-

डचों द्वारा भारत से नील,शोरा और सूतीवस्र का निर्यात किया जाता था। डच लोग मसुलीपट्टनम से नील का निर्यात करते थे।मुख्यतः डच लोग भारत से सूती वस्र का व्यापार करते थे। सूरत स्थित डच व्यापार निदेशालय डच ईस्ट इंडिया कंपनी का सर्वाधिक लाभ कमाने वाला प्रतिष्ठान था। बंगाल में प्रथम डच फैक्ट्री पीपली में स्थापित की गई लेकिन शीघ्र ही पीपली की जगह बालासोर में फैक्ट्री की स्थापना की गई।

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1653ई. में चिनसुरा अधिक शक्तिशाली डच व्यापार केन्द्र बन गया। यहाँ पर डचों ने गुस्तावुल नाम के किले का निर्माण कराया। बंगाल से डच मुख्यतः सूती वस्र,रेशम,शोरा और अफीम का निर्यात करते थे। डचों द्वारा कोरोमंडल तटवर्ती प्रदेशों से सूती वस्र का व्यापार किया जाता था। मालाबार के तटवर्ती प्रदेश से डच मसालों का व्यापार करते थे। डचों ने पुलीकट में अपने स्वर्ण निर्मित पैगोडा सिक्के का प्रचलन करवाया।

डचों ने भारत में पुर्तगालियों को समुद्री व्यापार से एक तरह से निष्कासित कर दिया, लेकिन अंग्रेजों के नौसैनिक शिक्ति के सामने डच नहीं टिक सके। डचों और अंग्रेजों के बीच 1759ई. में लङे गये बेदरा के युद्ध में भारत ने अंग्रेजी नौसेना की सर्वश्रेष्ठता को सिद्ध करते हुए डचों को भारतीय व्यापार से अलग कर दिया।

भारत में डचों की असफलता के प्रमुख कारण थे-इसका सरकार के सीधे नियंत्रण में होना, कंपनी के भ्रष्ट एवं अयोग्य पदाधिकारी और कर्मचारी। भारत में डचों के आगमन के परिणाम स्वरूप यहाँ का सूतीवस्र उद्योग निर्यात की सर्वोच्च स्थिति में पहुंच गया। भारतीय वस्रों के यूरोप में निर्यात का इतना गहरा प्रभाव पङा कि इंग्लैंड आगे चल कर वस्रोद्योग का महत्त्वपूर्ण केन्द्र बन गया।

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