राजनीतिक विज्ञान : अर्थ एवं सिद्धांत

राजनीति सिद्धांत के अंतर्गत राजनीति के भित्र – भित्र पक्षों का अध्ययन किया जाता है । राजनीति का संबंध मनुष्यों के सावंजनिक जीवन से है।राजनीतिक प्रंबध के अंतर्गत समाज के सारे सदस्यों के पर सत्ता का प्रयोग किया जाता है ।

राजनीतिक सिद्धांत का विचारक्षेत्र

  1. वैज्ञानिक पद्धति
  2. मानकीय पद्बति
  3. दार्शनिक पद्बति
  4. परम्परागत दृष्टिकोण

राजनीति के विविध पक्षों के अस्तित्व एवं वैज्ञानिक अध्ययन को राजनीतिक सिद्धांत कहा जाता है।

राजनीति के लिए प्रयुक्त अंग्रेजी शब्द पॉलिटिक्स(politics) की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के तीन शब्दों ‘Polis'(नगर-राज्य), ‘Polity'(शासन) तथा ‘Politia'(संविधान) से हुई है। इस अर्थ में राजनीति नगर-राज्य तथा उसके प्रशासन का व्यवहारिक एवं दार्शनिक धरातल पर अध्ययन प्रस्तुत करती है।राजनीति को Polis नाम प्रसिद्ध ग्रीक विचारक अरस्तू द्वारा दिया गया है। अतः अरस्तू  को ‘राजनीति विज्ञान का पिता’ कहा जाता है।

आधुनिक अर्थों में राजनीति शब्द को इन व्यापक अर्थों में प्रयुक्त नहीं किया जाता। आधुनिक समय में इसका संबंध राज्य ,सरकार, प्रशासन, व्यवस्था के तहत समाज के विविध संदर्भों व संबधों के व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध ज्ञान एवं अध्ययन से है।

प्लेटो, अरस्तू, सिसरो, ऑगस्टाइन व एक्वीनास राजनीति विज्ञान की परम्परागत विचारधारा के विचारक है। आधुनिक राजनीतिक विचारकों में चार्ल्स मेरियम, रॉबर्ट डहल, लासवेल, कैटलिन, मैक्सवेबर, लास्की, मैकाइवर का नाम उल्लेखनीय है।

राजनीतिक सिद्धांत में ‘सिद्धांत’ के लिए अंग्रेजी शब्द Theory की उत्पत्ति यूनानी शब्द ‘Theoria'(थ्योरिया) से हुई है, जिसका अर्थ है- “समझने का विशिष्ट दृष्टिकोण”। यह वही समझ है जिससे किसी घटनाक्रम को तार्किक विवेचन द्वारा स्पष्ट किया जाए अर्थात किसी अवधारणा की व्याख्या कर उसे ‘सामान्यीकरण’ की ओर अग्रसर करना। इस प्रकार, राजनीतिक सिद्धांत का अभिप्राय राजनीति और उससे संबंधित समस्याओं का विभिन्न तथ्यों के आधार पर व्याख्या प्रस्तुत करने से है।

जॉर्ज एच. सेबाइन की चर्चित कृति राजनीतिक सिद्धांत का इतिहास व डब्ल्यू.ए.डनिंग के राजनीतिक सिद्धांत का इतिहास के अंतर्गत प्राचीन काल से आधुनिक काल तक के राजनीतिक विचारों के इतिहास पर प्रकाश डाला गया है।

परम्परागत दृष्टिकोण में राजनीति शास्त्र को चार अर्थों में परिभाषित किया जाता हैं-

राज्य के अध्ययन के रुप में
सरकार के अध्ययन के रूप में
राज्य और सरकार के अध्ययन के रूप में
राज्य, सरकार और व्यक्ति के अध्ययन के रुप में
राज्य के अध्ययन के रुप में ( State studies forms ) –
ब्लंटसलि,गेरीस, गार्नर, तथा गेटल आदि लेखको ने राजनीति विज्ञान को राज्य के अध्ययन के रूप में परिभाषित किया हैं।

ब्लंटसलि के सब्दो में – “राजनीति शास्त्र वह शास्त्र है जिसका सम्बन्द्ध राज्य से है, जोरजी की आधारभूत सिथतियो ,उसकी प्रकृति, तथा विविध स्वरूपों एवं विकास को समझने का प्रयत्न करता हैं।
गैरिस के शब्दों में- राजनीति शास्त्र राज्य को एक शक्ति शास्त्र के रूप में मानता है जो राज्य के समस्त संबंधो, उसकी उत्पत्ति, उसके स्थान, उसके उद्देश्य उसके नैतिक महत्व,उसकी आर्थिक समस्याओं, उसके वितिय पहलू आदि का विवेचन करता हैं।
गार्नर के अनुसार”- राजनीति शास्त्र का आरंभ और अंत राज्य के साथ होता है।
गैटल के शब्दों में- राजनीति शास्त्र राज्य के भूत ,भविष्य व वर्तमान का,राजनीति संग़ठन तथा राजनीति कार्यों का,राजनीती संस्थाओं का तथा राजनीति सिद्धान्तों का अध्ययन करता हैं।
राजनीतिक सिद्धांत का अर्थ एवं प्रकृति ( Meaning and nature of political theory )
राजनीतिक सिद्धांत ज्ञान की वह शाखा है जो राजनीति के अध्ययन का सामान्य ढांचा प्रस्तुत करते हैं राजनीतिक मनुष्यों के सार्वजनिक जीवन से है राजनीतिक सिद्धांत के तीन करते है_ १.समालोचना २.पुनर्निर्माण ३.व्याख्या

पहले दो कृत्य राजनीतिक दर्शन से संबंधित है जो मूल्यों पर बल देते हैं जबकि तीसरा करते राजनीतिक विज्ञान से संबंधित है जो तथ्यों पर बल देता है

एंड्र्यू हैकर ने अपनी पुस्तक पोलिटिकल थ्योरी में राजनीतिक सिद्धांत के दो अर्थ बताएं

परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत में अपने विचारों का इतिहास सम्मिलित है
आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत से राजनीतिक व्यवहार का व्यवस्थित अध्ययन किया जाता है बल्हम ने अपनी पुस्तक Theories of political system में बताता है कि राजनीतिक सिद्धांत राजनीतिक व्यवस्था के लिए अमृत प्रतिमान प्रस्तुत करता है राजनीतिक तथ्यों के आकलन एवं विश्लेषण के लिए एक निर्देशक का काम करता है
राजनीतिक सिद्धांत के प्रकार ( Types of Political Theory ) –
परंपरागत ( The traditional )
आधुनिक ( Modern )
समकालीन ( Contemporaneous )

  1. परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत ( Conventional political theory ) – पर दर्शन का प्रभाव देखा जाता है पाश्चात्य जगत में द्वितीय विश्व युद्ध से पूर्व तक जिन मान्यताओं एवं अवधारणा का समूह प्रचलित रहा है उसे परंपरागत राजनीति सिद्धांत दिया शास्त्रीय यथार्थवाद राजनीतिक की संज्ञा दी जाती है
    परंपरागत राजनीति सिद्धांत के निर्माण के विकास में अनेक राजनीतिक चिंतकों का योगदान रहा है जैसे प्लेटो अरस्तू सेंट थामस एक्विनास हॉब्स लॉक रूसो मॉन्टेस्क्यू कांट आदि

परंपरागत राजनीति सिद्धांत की विशेषताएं ( Characteristics of traditional politics theory )

परंपरागत राजनीति सिद्धांत दर्शनशास्त्र से प्रभावित है
वस्तुतः राजू शास्त्रीय नहीं राजनीति विज्ञान और दर्शनशास्त्र के सहयोग से ज्ञान की राजनीति दर्शन शाखा का निर्माण किया और इसके आधार पर राजनीतिक सिद्धांत का निर्माण किया
परंपरागत राजनीतिक सिद्धांत राजनीति संपूर्णता को विश्लेषण की संपूर्ण इकाई मानता है
परंपरागत राजनीति में राजनीति के तुलनात्मक अध्ययन पर बल दिया जाता है
कोलकाता के राजनीति के प्रमुख अध्ययन पद्धतियां है ऐतिहासिक विश्लेषणात्मक आदर्शात्मक वर्णात्मक परिभाषा आत्मक

  1. आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत ( Modern political theory ) – में तथ्यों एवं विज्ञान का बोलबाला है इसका विकास दूसरे विश्व युद्ध के बाद हुआ आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत के विकास में रो बडहल, चार्ल्स मेरियम, कैथलीन, लॉसवेल, पिनाक, डेविड ईस्टन आदि विद्वानों ने
    भूमिका अदा की है

अनुभव के उपागम
व्यवहारवादी उपागम
उत्तर व्यवहारवादी

  1. समकालीन सिद्धांत – में परंपरागत व आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत को अपनाने का प्रयास किया जाता है

राजनीतिक सिद्धांत तुलनात्मक पद्धति मे ( Political theory comparative method )
समानता व अंतरो दोनों पर ध्यान दिया जाए
धुंधली सामान्यताओं को दूर रखा जाए
सादृश्यो व अनन्यो में भेद बनाए रखा जाए
तुलनाओ के आधार पर ही निष्कर्ष बनाए जाए

  1. ऐतिहासिक उपागम

प्राय यह उपागम एक प्रकार का प्रयोगात्मक उपागम है जो अपने लक्ष्य में सुधार मुखी है
यह आगमनात्मक हैं , क्योंकि यह उपागम तथ्य व प्रक्षेणो पर आधारित होता है
यह एक अध्यापक है क्योंकि यह अतीत की व्याख्या करता है एक पथ प्रदर्शक है क्योंकि यह भविष्य के निर्माण में सहायता करता है
यह तथ्यात्मक ,कारणात्मक एवं मूल्यात्मक है

  1. दार्शनिक उपागम

अपने स्वरुप मे अनिवार्य यह उपागम नैतिक हैं
निर्देशात्मक व मानकिय हैं
“क्या है ” की उपेक्षा “क्या होना चाहिए ” कि वह अधिक झुकता हुआ है
इसमें में “संपूर्णता” पर अधिक बल दिया जाता है “अंश” पर इतना नहीं

  1. मानकीय उपागम

राजनीतिक चिंतन तथा राजनीतिक तथ्यों की मूल्यात्मक सिद्धांत की है
तनावीय प्रवृतियों से दूर तथा व्यवस्था व स्थिरता की प्रशंसा करता है
व्यावहारिक कला है
तथ्यों को नैतिक दृष्टि से देखना

  1. आनुभविक उपागम

यह उपागम तथ्यात्मकता से घनिष्ठ रूप से संबंधित है
तथ्यों के सत्यापन हेतु अनुभव प्रेक्षण व परीक्षणों पर बल देता है
भविष्यवाची कानून संभव

  1. व्यवहारवादी उपागम

खोजी गई नियमितताओं से भविष्यवाची सिद्धांत बनाए जा सकते हैं
सिद्धांतों का परीक्षण किया जा सकता है संख्यात्मक आंकड़ों पर आधारित निर्णय लिए जा सकते हैं
शोध को क्रमबद्ध व सिद्धांत प्रेरित किया जा सकता
तत्थयुक्त व मूल्यविहीन
राजनीतिक सिद्धांत की उपयोगिता ( Usefulness of political theory )
राजनीतिक सिद्धांत अत्यंत व्यवहारिक एवं महत्वपूर्ण विषय है। यह मूर्त्त विषय का अमूर्त्त वर्णन है। माओ के शब्दों में- “अभ्यास, ज्ञान, फिर अभ्यास तथा फिर ज्ञान: यही प्रक्रिया अनन्त चक्रों में पुनरावृत्त होती है और प्रत्येक चक्र में अभ्यास एवं ज्ञान की विषय-वस्तु उच्चतर स्तर प्राप्त करती है।” स्पष्ट संकेत है कि सिद्धांत निर्माण की प्रक्रिया में अभ्यास और ज्ञान का विशिष्ट योगदान है।

इसके महत्व(उपयोगिता) को अग्रलिखित बिंदुओं द्वारा स्पष्ट किया जा रहा है-

सद्भावना, सम्मान तथा सहिष्णुता का परिचय।
शब्दावली का अर्थ-निर्धारण तथा संकल्पनाओं का स्पष्टीकरण।
इतिहास की व्याख्या तथा सामाजिक पुनर्निर्माण।
बौद्धिक चिंतन का आधार
राजनीतिक तर्क का निर्माण तथा परीक्षण।
मैकियावेली ( Machiavelli )
मैकियावेली का जन्म 3 मई 1469 को हुआ था मैकियावेली को राजनीती विज्ञान का पितामह कहा जाता हैं मैक्यावली पाश्चात्य राजनीतिक चिंतन की वह कड़ी है जो मध्यकालीन युग को आधुनिक युग से जोड़ती है मैक्यावली को पाश्चात्य जगत में आधुनिक युग के द्वार पर खड़ा देखते हैं

मैक्यावली पहला विद्वान है जिसने राजनीतिक विज्ञान को राज्य शब्द दिया उसके समस्त राजनीतिक विचार राज्य की संकल्पना पर केंद्रित है उससे पहले राज्य शब्द एक साधन के रूप में समझा जाता था मैक्यावली ने बताया कि राज्य अपने साध्य का स्वयं साधन है उसने राज्य के लिए लिखा है और बताया है राज्य की सुरक्षा से बड़ा कोई धर्म नहीं होता और उससे बड़ी कोई नैतिकता नहीं होती उसके समस्त राजनीतिक विचारों का सार राज्य कला का सिद्धांत हैं मैक्यावली अपने युग का शिशु का था

मैक्यावली की अध्ययन पद्धति ऐतिहासिक ,पर्यवेक्षणात्मक, आगमनात्मक ,वैज्ञानिक, तुलनात्मक, यथार्थवादी तथा आगमनात्मक है

मैक्यावली की रचनाएं

” द आर्ट ऑफ वार (1521) – युद्ध कला पर लिखी गई एक उत्कृष्ट रचना है
“द हिस्ट्री ऑफ फ्लोरेंस” (1532) – जिसमें मैक्यावली ने इटली के अतीत वर्तमान इतिहास का वर्णन
है
“द प्रिंस” (1532)- मैक्यावली द्वारा लिखी एक अमर रचना है इसमें राज्य कला सिद्धांत का पूर्ण विवरण मिलता हैं,
“द डिसकोर्सिस ऑन फर्स्ट टैन बुक्स ऑफ टाइटस विनियस (1531 )- इसमें गणतंत्रात्मक सरकार का पक्ष लेते हुए बताया गया है डिसकोर्निस, द प्रिंस की अपेक्षा एक संपूर्ण रचना है जिसका संबंध व्यवहारिक राजनीति से है परंतु द प्रिंस की अपनी विशेषता है
मैकियावेली फ्लोरिडा गणराज्य के नौकरशाह थे 1498 में गिरोलामो सावोनारोला के निर्वासन और फांसी के बाद मैकियावेली को फ्लोरिडा चांसलेरी सचिव चुना गया था

राजनीतिक सिद्धान्त महत्वपूर्ण कथन ( Political Theories Important Statements )
आर.जी.गैटेल- ने “राजनीतिक चिंतन का इतिहास” (History of Political Thought-1949) में लिखा है कि *”राजनीति-सिद्धांत पर यह आरोप लगाया जाता है कि व्यवहारिक परिणामों की दृष्टि से यह न केवल बंजर भूमि की तरह निष्फल सिद्ध होता है कि बल्कि यह यथार्थ राजनीति के लिए भी विनाशकारी है।”

डी.डी.रफील- ने अपनी कृति “संकल्पनाओं के स्पष्टीकरण का कार्य घर की सफाई जैसा है।” दुविधाओं और भ्रांतियों के निराकरण हेतु सतत् विश्लेषण तथा तार्किक चिंतन अनिवार्य है।

हेगेल और मार्क्स के अनुसार- सरकार मनुष्यों की अपनी पसंद से नहीं बनती बल्कि यह ऐतिहासिक विकास की स्वभाविक शक्तियों का परिणाम होती है।

मार्क्स ने कहा था- “कि दार्शनिक अब तक विश्व की व्याख्या देते आए हैं, प्रश्न यह है कि इसके परिवर्तन कैसे लाया जाए ?

कार्ल मैनहाइम के अनुसार- सामाजिक विज्ञान हमें सामाजिक पुनर्निर्माण का पथ प्रशस्त करती है। सामाजिक शक्तियों का ज्ञान प्राप्त करके मानव प्रगति को बढ़ावा दिया जा सकता है।

डेविड हेल्ड ने अपनी महत्वपूर्ण कृति- “आज का राजनीतिक सिद्धांत” की भूमिका में स्पष्ट लिखा है कि ‘राजनीतिक-सिद्धांत से विमुखता से राजनीति अक्ल के अंध, स्वार्थी या सत्तालोलुप लोगों के हाथ में प्राप्त होगा।’