UNIT-10 बुद्धि( भाग 2): बुद्धि के सिद्धांत

बुद्धि के निम्नलिखित सिद्धांत है-
1. एक तत्व सिद्धांत– प्रवर्तक जॉनसन प्रतिपादन अल्फ्रेड बिने  एवं टर्मन
2.द्वितत्व सिद्धांत– प्रतिपादक- स्पीयर मैन
3. बहुत  तत्व सिद्धांत– प्रवर्तक -ई एल थर्नडाइक (1927)
4. समूह तत्व सिद्धांत– थर्स्टन(1935)
5. त्रिआयामी सिद्धांत– प्रतिपादक- गिलफोर्ड
6. पदानुक्रम सिद्धांत– प्रतिपादक- बर्न और वरनन
7. प्रतिदर्श सिद्धांत-थॉमसन

1. एक तत्व सिद्धांत- इस सिद्धांत के अनुसार बुद्धि एकल शक्ति है जो एक समय में एक व्यक्ति को एक ही कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। जॉनसन का मानना है कि बुद्धि एक शक्तिशाली मानसिक प्रक्रिया है वह समस्त मानव क्रियाओं पर शासन करती है। सभी मानसिक क्रियाएं इसके अधीन है और बुद्धि केवल एक ही तत्वों से निर्मित है।
परंतु इस सिद्धांत में एक कमी है कि यदि बुद्धि एक ही तत्वों से निर्मित है तो व्यक्ति को सभी क्षेत्रों में बुद्धिमान होना चाहिए परंतु ऐसा नहीं होता है

 2.द्वितत्व सिद्धांत–  इस सिद्धांत के अनुसार बुद्धि दो तत्वों से मिलकर बनी होती है . सामान्य तत्व (GENRAL FECTOR) 
विशिष्ट तत्व (SPECIFIC FECTOR )
1. सामान्य तत्व (GENRAL FECTOR) स्पीयरमैन के अनुसार सामान्य तत्व ऐसी मानसिक क्षमता है जो सभी प्रकार की मानसिक क्रियाओं  में रहती है यह मात्रा विभिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न होती है किसी में कम अथवा किसी में अधिक। जिस व्यक्ति में सामान्य तत्व की मात्रा अधिक होती है वे सामान्यतः प्रत्येक क्षेत्र में अच्छी सफलता प्राप्त करता है।
2. विशिष्ट तत्व(SPECIFIC FECTOR ) स्पीयरमैन के अनुसार एक व्यक्ति में एक सामान्य तत्व होता है और अनेक विशिष्ट तत्व होते हैं। सभी विशिष्ट तत्व सामान्य तत्व को प्रभावित करते हैं। यह विशिष्ट तत्व भी भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न मात्रा में पाया जाता है। किसी कार्य को करने में सामान्य तत्व के साथ विशिष्ट तत्वों का होना भी आवश्यक है और सामान्य तत्व और विशिष्ट तत्वों में जितना उच्च संबंध होगा व्यक्ति क्षेत्र में उतनी ही अधिक सफलता प्राप्त करेगा। किंतु कोई विशिष्ट तत्व ऐसा नहीं होता जिस की आवश्यकता सभी कार्यों को करने में आवश्यकता हो। कुछ विशेष तत्व इस प्रकार है – संगीत चित्रकारी हस्त कार्य इत्यादि

3. बहुत  तत्व सिद्धांत– इस सिद्धांत के अनुसार बुद्धि में सामान्य योग्यता जैसी कोई सत्ता नहीं बल्कि बुद्धि के अंतर्गत कई तत्व या कारक हैं। किसी मानसिक क्रिया में कई तत्व मिलकर कार्य करते हैं यह सिद्धांत थर्नडाईक के उद्दीपन अनुक्रिया सिद्धांत पर आधारित है। थर्नडाईक के अनुसार  बुद्धि उन सभी मानसिक क्षमताओं का योग है जो मस्तिष्क की क्रियाओं में भाग लेते हैं। थर्नडाईक ने बुद्धि की चार विशेषताएं बताई है-
1.स्तर  2.विस्तार 3. क्षेत्र  4. गति

4. समूह तत्व सिद्धांत-(Group factor theory)- इस सिद्धांत के अनुसार बुद्धि कुछ ऐसे विशिष्ट मानसिक तत्वों से मिलकर निर्मित है जो समान एवं विशिष्ट मानसिक योग्यताओं के समूह मात्र होते हैं। थर्स्टन ने इन्हें प्राथमिक मानसिक योग्यताएं कहा है। थर्स्टन के अनुसार मानसिक क्रिया असंख्य हो सकती है परंतु वे सभी एक दूसरे से भिन्न एवं विशिष्ट नहीं होती उनमें से कुछ में अधिक समानता हो सकती है और उन्हें एक वर्ग में रखा जा सकता है। इन समस्त मानसिक क्रियाओं को कुछ विशिष्ट वर्गों में बांटा जा सकता है। थर्स्टन ने 8 मानसिक योग्यताओं की खोज की है जो निम्नलिखित हैं-
1.शाब्दिक योग्यता (V)
2.अंक योगिता (N)
3.देशिक योगिता(S)
4.निगनात्मक योग्यता(D)
5. आगमनात्मक योग्यता(I)
6. शब्द प्रवाह(W)
7. स्मृति(M)
8. प्रत्यक्ष ज्ञान योग्यता(P)

5. त्रिआयामी सिद्धांत– इस सिद्धांत के अनुसार व्यक्ति की मानसिक योग्यता को तीन आयामों में वर्गीकृत किया गया है 
1. संक्रिया(operations)
2. विषय वस्तु(content)
3. उत्पाद(product)
संक्रिया में पांच प्रमुख बुद्धि की योग्यताओं को देखा गया है- 1. संज्ञान  2.स्मृति 3.अपसारी चितंन 4.अभिसारी चिंतन 5.मूल्यांकन
विषयवस्तु के चार आधार हैं- 1.आकृत्यात्मक विषयवस्तु  2.प्रतीकात्मक विषयवस्तु 3.शाब्दिक विषयवस्तु 4. व्यवहारात्माक विषयवस्तु
किसी भी बौद्धिक क्रिया में छह प्रकार के उत्पाद सम्मिलित रहते हैं-1. इकाई  2. वर्ग 3. संबंध 4. व्यवस्था    5. रूपांतरण 6. निहितार्थ
गिलफोर्ड के अनुसार यह तीनों आयाम-  1.संक्रिया(4) 2.विषय वस्तु(5) और 3.उत्पाद(6) कुल मिलकर 4*5*6=120  उप तत्व बन जाते हैं।

6. पदानुक्रम सिद्धांत– इस सिद्धांत में प्रत्येक मानसिक योग्यता को सोपान के अनुसार क्रम प्रदान किया जाता है। इसमें  सर्वप्रथ मसामान्य मानसिक योग्यता आती है जो दो प्रमुख खंडों में विभाजित है- इसमें से प्रथम खंड मैं 1.शाब्दिक 2.अंकित और 3.शैक्षिक योग्यता आती है।  द्वितीय खंड में 1.क्रियात्मक 2.यांत्रिक 3.देशिक और 4.शारीरिक योग्यता आती है। यह दोनों प्रमुख एवं महत्वपूर्ण कारक अनेक गुणों लघु कारकों में विभाजित किए जा सकते हैं।

7. प्रतिदर्श सिद्धांत- इस सिद्धांत के अनुसार व्यक्ति में अनेक योग्यताएं होती है परंतु जब वह किसी कार्य का संपादन करता है तो उस कार्य के संपादन में सभी योग्यताओं में से थोड़ा-थोड़ा  प्रतिदर्श(नमूना) लेकर उस कार्य विशेष के लिए एक नवीन योग्यता बना लेता है अर्थात प्रत्येक कार्य निश्चित योग्यताओं का प्रतिदर्श अर्थात नमूना होता है। किसी विशेष कार्य को करने में हम मानसिक योग्यताओं के बड़े समूह में से कुछ योग्यताओं को उनके प्रतिनिधित्व के रूप में छांट लेते हैं इनका परस्पर  सह-संबंध सभी स्वतंत्र कारकों के प्रतिनिधित्व मिश्रण के कारण होता है।


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