UNIT-8: जीन पियाजे (GEAN PIAGET)

जीन पियाजे को विकासात्मक मनोविज्ञान का जनक कहा जाता है। जीन पियाजे का जन्म 1896ई  में स्विट्जरलैंड में हुआ। प्याजे ने सर्वप्रथम ‘द लैंग्वेज ऑफ थॉट ऑफ द चाइल्ड’ पुस्तक 1923 में लिखी। 

पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत-

पियाजे द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धांत को संज्ञानात्मक विकास के नाम से जाना जाता है पियाजे ने बताया कि मनोवैज्ञानिकों ने मानव विकास के तीन प्रमुख पक्ष बताए हैं-

  1. जैविकीय  परिपक्वता
  2. मौलिक पर्यावरण के साथ अनुभव
  3. सामाजिक पर्यावरण के साथ अनुभव

पियाजे ने एक और पक्ष का समावेश किया जिससे संतुलनीकरण कहा जाता है। संतुलित करण उपयुक्त तीनों पक्षों के मध्य समन्वय स्थापित करता है इस आधार पर पियाजे ने एक दृष्टिकोण विकसित किया जिसे ‘स्कीमा’ के नाम से जाना जाता है।

स्कीमा- पियाजे के अनुसार संतुलनीकरण ही स्कीमा है। स्कीमा को सही रूप में समझने हेतु इन तीन अवधारणाओं को समझना अत्यंत आवश्यक है-

संतुलनीकरण– विकास के लिए संतुलन एक अनिवार्य शर्त है क्योंकि संतुलन ही जैविक परिपक्वता, भौतिक पर्यावरण और सामाजिक पर्यावरण के साथ समन्वय स्थापित करता है। इसके अभाव में किसी भी प्राणी का विकास संभव नहीं है। पियाजे ने संतुलनीकरण को स्वचालित आरोही प्रक्रिया कहां है जो व्यक्ति के विकास को धीरे-धीरे आगे बढ़ाती रहती है। यह संतुलनीकरण ही पियाजे के अनुसार स्कीमा है। स्कीमा की संरचना की ग्रहिता एक प्रमुख प्रक्रिया है इस प्रक्रिया में दो तत्व होते हैं-

  1. आत्मीकरण- आत्मीकरण को किसी व्यक्ति की वह योग्यता या क्षमता को कहा जा सकता है जिसके सहयोग से वह नवीन परिस्थिति के साथ अपना समन्वय स्थापित करता है।
  2. समंजन- समंजन का अर्थ है पूर्व अनुभवों की पृष्ठभूमि में नवीन अनुभवों का आत्मिकरण अर्थात वातावरण से ज्ञान प्राप्त करने में बालक के पूर्व अनुभव भी सहायक होते हैं जो समंजन कहलाते हैं।

बालक जैसे-जैसे अपने वातावरण से समंजन और आत्मीकरण करता जाता है उसका संज्ञानात्मक विकास आगे बढ़ता जाता है। जीन पियाजे ने स्कीमा के साथ-साथ बालक के बौद्धिक विकास की अवस्थाएं भी बताई है जोकि निम्नलिखित है-

1. संवेदी गतिक काल- पियाजे के अनुसार यह अवस्था जन्म से लेकर  2 वर्ष तक होती है। इसे भी पुनः 6 भागों में बांटा गया है।
इस काल को सवेंदी गतिक काल इसलिए कहा गया है क्योंकि इस समय में बालक अपने आसपास के पर्यावरण को समझने लगता है।

सारांशतः  इस काल में बालक अपना ध्यान किसी चीज पर बहुत ही थोड़े समय के लिए केंद्रित कर सकता है। उसका केवल  संवेगात्मक जैसे स्पर्श,स्वाद, गंध, श्रवण, दृश्य आदि का विकास होता है। भाषा के स्थान पर संकेतों का प्रयोग करता है। वह कहने की मुद्रा एवं कहने के ढंग, भावनाओं को समझने लगता है। किस अवस्था के अंत तक अनेक शब्द भी बोल सकता है।

2. प्रतिनिधानात्मक बुद्धि एवं मूर्त संक्रिया काल- यह अवस्था सामान्यत 2 वर्ष से 11 वर्ष तक की होती है।  पियाजे ने इस अवस्था को पुनः दो भागों में बांटा है-

(I) पूर्व संक्रियात्मक काल- यह अवस्था 2 वर्ष से 7 वर्ष तक की होती है इस अवस्था में बालक में आत्म केंद्रित चिंतन की प्रवृत्ति रहती है उसका चिंतन साधारण एवं सरल होता है वह भाषा के माध्यम से अपने विचारों को व्यक्त करता है।

उदाहरण- एक लंबा तथा दूसरा चौड़ा ग्लास जिसमें बराबर पानी भरा है  के बारे में बालक यह तो बता सकता है कि लंबे गिलास में पानी चौड़े गिलास की तुलना में अधिक है परंतु यह नहीं बता सकता है कि दूसरे ग्लास की चौड़ाई अधिक है अतः पानी बराबर है।

(II) मूर्त संक्रियात्मक काल- यह अवस्था 7 वर्ष से 11 वर्ष के मध्य की अवस्था है इस अवस्था में बच्चा अमूर्त एवं तार्किक उदाहरणों को समझने लगता है। बच्चे की आत्म केंद्रित कम होने लगती है एवं पूछे गए प्रश्नों का सही उत्तर देने लगता है। इस अवस्था में बालक तथ्यों का सारणीयन वर्गीकरण और अनुरूपीकरण करना प्रारंभ कर देता है।

3. औपचारिक संक्रिया काल- यह अवस्था 11 से 15 वर्ष की उम्र तक की होती है। इस समय बालक विचार करने की योग्यता चिंतन शक्ति अर्जित कर लेता है। वह अमूर्त संबंधों की विषय में चिंतन कर सकता है एवं समस्या समाधान भी कर सकता है। इस प्रकार यह  सउद्देश्य चिंतन की अवस्था है। इस काल में बालक तादात्मीकरण(Identification), निषेधीकरण( Nagation), पारस्परिक संबंधता( Reciprocalness), तथा  सहसंबंध रूपांतरण(Co-relative transformation) ये चार क्रियाऐं करने लगता है जिन्हें पियाजे ने ‘INRC’ के द्वारा अभिव्यक्त किया है।

पियाजे ने उपरोक्त अवस्थाओं के अतिरिक्त नैतिक और धार्मिक विकास का भी अध्ययन किया तथा पियाजे ने नैतिकता को दो रूप में देखा आश्रित अवस्था एवं स्वायत्त अवस्था तथा आयु वर्गों अनुसार इन्हें पुनः चार अलग-अलग भागों में विभाजित किया है-

नैतिक विकास की अवस्थाएं-

1.  आश्रित अवस्था-इस अवस्था में बालक माता-पिता की बातें अनिवार्य रूप से मानते हैं तथा उन सभी बातों या नियमों को मानने के लिए  बाध्य होते हैं। इस अवस्था को तीन भागों में बांटा है-
(I) अनौमी-यह अवस्था प्रारंभ से 5 वर्ष तक की अवस्था है इस अवस्था में बालक माता-पिता व समीपजनों के कार्यों की नकल करता है और नैतिक  आचरणों में माता-पिता का अनुसरण करता है इसे प्राकृतिक परिणामों का अनुशासन कहा जाता है वह अपने बड़ों का विरोध नहीं करता तथा उनकी हर बात को स्वीकार करता है।

(II)  अधिकारी  परायत्ता-5 से 8 वर्ष के मध्य होती है। इसमें बालक समाज द्वारा बताए गए अच्छे नैतिक नियमों को मानने के लिए बाध्य होता है। बालक पुरस्कार एवं दंड द्वारा नियंत्रित होता है। वह अपने सवेंगों पर नियंत्रण रखता है तथा आज्ञाकारी होता है।

(III)  परायत्ता– यह अवस्था 9 वर्ष से 13 वर्ष तक की अवस्था होती है इस समय बालक में सहयोग की भावना का विकास होने लगता है उसमें ईमानदारी, न्यायप्रियता, सहयोग और  परोपकार जैसी भावनाएं विकसित होने लगती हैं तथा विवेक आ जाता है।

2. स्वायत्ता- यह अवस्था 13 से 18 वर्ष तक की अवस्था है इस अवस्था में बालक यह समझने लगता है कि नैतिक नियम हमारे व्यवहार के नियामक है यह व्यक्ति के अंतकरण की उपज है अतः बालक अपनी व्यवहारों के प्रति पूर्ण उत्तरदाई होता है। उसका व्यवहार स्वनिर्धारित होता है वह न तो सत्ता द्वारा नहीं समाज द्वारा नियंत्रित होता है बल्कि वह मानवता के आधार पर निर्मित प्रेम सहानुभूति जैसे  नैतिक आचरणों के अनुसार चलता है।


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