भौतिक प्रकाशिकी

भौतिक प्रकाशिकी ऐसी शाखा होती है जिसमे विवर्तन, ध्रुवण, व्यतिकरण तथा अन्य घटनाओं के बारे में अध्ययन किया जाता है। जिनका ज्यामितीय प्रकाशिकी शुद्ध परिणाम नहीं देती। तथा यह प्रकाश के तरंग स्वरूप को बताती है। इसलिए इन्हे तरंग प्रकाशिकी भी कहा जाता है।

प्रकाश , Energy का ही एक Form है तथा जब प्रकाश किसी वस्तु से परावर्तित होकर हमारी आँखों में जाता है तो इस प्रकाश के परावर्तन की घटना के कारण ही वह वस्तु हमें दिखाई देने लगती है ऐसा इसलिए होता है क्योंकि यह जो प्रकाश परावर्तित होकर हमारी आंख में पहुँचता है वह हमारी आंख के रेटिना पर एक दृष्टि सवेंदना ( Sensation Of Vision ) उत्पन्न करता है जिसके कारण वह वस्तु हमें दिखाई देने लगती है इस प्रकार यह घटना होती है |

हाइगेन्स का तरंग सिद्धान्त –

प्रकाश के तरंग-सिद्धान्त का प्रतिपादन हॉलैण्ड के वैज्ञानिक हाइगेन्स ने सन् 1678 ई० में किया था। हाइगेन्स के अनुसार, प्रकाश तरंगों के रूप में चलता है। ये तरंगें प्रकाश-स्रोत से निकलकर सभी दिशाओं में प्रकाश की चाल से चलती हैं। चूँकि तरंगों को चलने के लिये माध्यम की आवश्यकता होती है, अत: हाइगेन्स ने एक सर्वव्यापी माध्यम ‘ईथर‘ (ether) की कल्पना की।

इस काल्पनिक माध्यम के लिए यह माना गया कि यह भारहीन है तथा सभी पदार्थों में प्रवेश कर सकता है। इसमें प्रकाश-तरंग के संचरण के लिए आवश्यक सभी गुण होते हैं। उदाहरण के लिये, प्रकाश अति तीव्र चाल (3 x 108 मीटर/सेकण्ड) से चलता है। अत: यह माना गया कि माध्यम ईथर का घनत्व बहुत कम है।

तरंगाग्र (Wavefront)

किसी क्षण विशेष पर समान कला में कम्पन के रहे माध्यम के कणो के बिंदु पथ को तरंगाग्र कहते है ।

प्रकाश स्त्रोत की आकृति के अनुसार तरंगाग्र तीन प्रकार के होते है :

गोलीय तरंगाग्र (Spherical Wavefront)
बेलनाकार तरंगाग्र (Cylindrical Wavefront)
समतल तरंगाग्र (Plane Wavefront)

गोलीय तरंगाग्र (Spherical Wavefront)

यदि माध्यम में तरंगे एक बिंदु स्त्रोत से उतपन्न हो रही है तब यदि हम बिंदु स्त्रोत को केंद्र मान कर उसके चारो ओर एक गोलीय पृष्ठ खींचे तो उस पर स्थित माध्यम के कण समान कला में कम्पन कर रहे होंगे अतः इस दशा में बनने वाला तरंगाग्र गोलीय होगा।

बेलनाकार तरंगाग्र (Cylindrical Wavefront)

यदि प्रकाश स्त्रोत रेखीय हो तो , रेखीय स्त्रोत से समान दुरी पर स्थित बिन्दुओ का बिन्दुपथ बेलनाकार तरंगाग्र कहलाता है ।

समतल तरंगाग्र (Plane Wavefront)

जब प्रकाश का बिंदु स्त्रोत या रेखीय स्त्रोत बहुत अधिक दुरी पर होता है तो क्रमशः गोलीय तथा बेलनाकार तरंगाग्र का आकार बहुत बड़ा हो जाता है ।अतः इन तरंगाग्रो का छोटा सा भाग समतल तरंगाग्र माना जा सकता है ।

हाइगेन्स का द्वितीयक तरंगिकाओं का सिद्धान्त

हाइगेन्स ने किसी माध्यम में तरंगों के संचरण के सम्बन्ध में एक सिद्धान्त प्रतिपादित किया जिसे हाइगेन्स का ‘द्वितीयक तरंगिकाओं का सिद्धान्त‘ कहते हैं। इसके लिये हाइगेन्स ने निम्नलिखित परिकल्पनाएँ की :

(i) जब किसी माध्यम में स्थित तरंग-स्रोत से तरंगें निकलती हैं, तो स्रोत के चारों ओर स्थित माध्यम के कण कम्पन करने लगते हैं। माध्यम
में वह पृष्ठ जिसमें स्थित सभी कण कम्पन की समान कला में हों, ‘तरंगाग्र’ (wave-front) कहलाता है। यदि तरंग-स्रोत बिन्दुवत् है, तो तरंगाग्र गोलीय (spherical) होता है। स्रोत से बहुत अधिक दूरी पर तरंगाग्र लगभग समतल हो जाता है।

(ii) तरंगाग्र पर स्थित प्रत्येक माध्यम-कण एक नये तरंग-स्रोत का कार्य करता है जिससे नई तरंगें सभी दिशाओं में निकलती हैं। इन तरंगों को द्वितीयक तरंगिकाएँ (secondary wavelets) कहते हैं तथा ये भी माध्यम में प्राथमिक तरंग की चाल से आगे बढ़ती हैं।

(iii) यदि किसी क्षण आगे बढ़ती हुई इन द्वितीयक तरंगिकाओं का अन्वालोप (envelope), अर्थात् उन्हें स्पर्श करते हुए पृष्ठ खींचें, तो यह अन्वालोप उस क्षण तरंगाग्र की नई स्थिति को प्रदर्शित करेगा।

तरंगो का अध्यारोपण सिद्धांत (Superposition of Waves)

जब दो या दो से अधिक तरंगे माध्यम के किसी कण पर एक साथ पहुँचती है तो उस कण का परिणामी विस्थापन तरंगो के द्वारा उतपन्न विस्थापनों के सदिश योग के तुल्य होगा ।

कला संबद्ध स्त्रोत (Coherent Sources)

ऐसे प्रकाश स्त्रोत जिनसे उत्सर्जित तरंगो के मध्य कलान्तर का मान किसी स्थिति पर शून्य या समय के साथ नियत रहे, कला संबद्ध स्त्रोत कहलाते है ।

ऐसे दो स्वतंत्र प्रकाश स्त्रोत प्राप्त करना असम्भव है जिनसे प्राप्त तरंगे कला संबद्ध होती है कला संबद्ध स्त्रोत प्राप्त करने की विधियाँ

(i) तरंगाग्र के विभाजन द्वारा

(ii) आयाम विभाजन द्वारा

प्रकाश का व्यतिकरण (Interference of Light)

जब समान आवृति की दो तरंगे किसी माध्यम में एक ही दिशा में गमन करती है तो उनके अध्यारोपण के कारण किसी बिंदु पर प्रकाश की तीव्रता अधिकतम एवं किसी अन्य बिंदु पर तीव्रता न्यूनतम प्राप्त होती है , इस घटना को प्रकाश का व्यतिकरण कहते है ।

यह दो प्रकार का होता है

  1. संपोषी व्यतिकरण
  2. विनाशी व्यतिकरण

व्यतिकरण फ्रिंजे उत्पन्न करने की आवश्यक शर्ते-

  • दोनों प्रकाश स्रोतों को कलासंबद्ध होना चाहिए, अर्थात प्रकाश -स्रोतों के बीच एक निश्चित कलान्तर होना चाहिए जो समय के साथ अपरिवर्तित रहे ।
  • प्रकाश के दोनों स्रोतों से एक ही तरंगदैधर्य तथा आवृति की तरंगे उत्सर्जित होनी चाहिए, अर्थात स्रोतों को एकवर्णी होना चाहिए ।
  • दोनों तरंगो के आयाम को बराबर या लगभग बराबर होना चाहिए । ऐसा होने से व्यतिकरण फ्रिन्जो के बीच विषमता बढ़ जाती है और वे स्पष्ट दिखाई देती है ।
  • प्रकाश स्रोतों को संकरा होना चाहिए ।

प्रकाश तरंगो का विवर्तन (Diffraction of light ) –

  • विवर्तन की घटना का प्रेक्षण सर्वप्रथम ग्रिमाल्डी ने किया ।इसका प्रयोगिक अध्धयन न्यूटन एवं यंग ने किया ।
  • किसी अपारदर्शी अवरोधक या द्वारक के तेज किनारो से प्रकाश के मुड़ने तथा उसकी ज्यामितीय छाया में प्रकाश के फ़ैल जाने की घटना को प्रकाश का विवर्तन कहते है ।
  • किसी तरंग का विवर्तन होने के लिए यह आवश्यक है की विवर्तक (द्वारक या अवरोधक ) का आकार तरंग कि तरंगदैर्ध्य की कोटि का होना चाहिए ।
  • एक ही तरंगाग्र के विभिन्न हिस्सों में प्राप्त द्वितीयक तरंगिकाओं के अध्यारोपण से प्राप्त घटना विवर्तन कहलाती है ।

विवर्तन के प्रकार –

1. फ्रेनेल विवर्तन – अवरोधक या द्वारक से स्रोत तथा पर्दा निश्चित दूरी पर होते है इस प्रकार के विवर्तन को फ्रेनेल विवर्तन कहते है ।

2. फ्राउनहोफर विवर्तन- इसमें अवरोधक या द्वारक से स्त्रोत एवं पर्दा अनंत दूरी पर होते है ।

प्रकाश का ध्रुवण (Polarisation of Light)

प्रकाश अनुप्रस्थ विधुत चुंबकीय तरंगो के रूप में संचरण करता है । विधुत क्षेत्र का परिमाण चुंबकीय क्षेत्र की तुलना में बहुत अधिक होता है अतः हम समान्यतः प्रकाश को विधुत क्षेत्र दोलनों के रूप में व्यक्त करते है ।

अध्रुवित प्रकाश

वह प्रकाश जिसमे तरंग संचरण की दिशा के लंबवत सभी दिशाओं में विधुत क्षेत्र के दोलन सममित रूप से उपस्थित होते है अध्रुवित प्रकाश कहलाता है ।दोलनों को क्षैतिज व् उध्वाधर घटको में वियोजित किया जा सकता है ।

ध्रुवित प्रकाश

वह प्रकाश जिसमे दोलन प्रकाश संचरण की दिशा के लंबवत एक ही रेखा में होते है ध्रुवित या समतल ध्रुवित प्रकाश कहलाते है ।

(i ) ध्रुवित प्रकाश में जिस तल में दोलन होते है उस तल को कम्पन तल कहते है ।

(ii ) कम्पन तल के लंबवत तल को ध्रुवण तल कहते है ।

(iii ) प्रकाश को कुछ निश्चित क्रिस्टलों जैसे टूरमैलीन या पोलोराइडो से गुजारकर ध्रुवित किया जा सकता है ।

ध्रुवण के अनुप्रयोग

(i) ध्रुवण कोण ज्ञात करके एवं ब्रूस्टर नियम से किसी पारदर्शी पदार्थ का अपवर्तनांक ज्ञात कर सकते है।

(ii) इसे प्रकाश कि चमक कम करने में उपयोग में लाया जाता है।

(iii) कैलकुलेटर एवं घड़ियों में अक्षर एवं अंक द्रवीय क्रिस्टल में होने वाले ध्रुवण द्वारा बनाया जाता है, इन्हे LCD (Liquid Crystal Display) कहा जाता है।

(iv) CD प्लयेर में ध्रुवित लेज़र पुंज सुई कि भांति व्यवहार करता है एवं कॉम्पैक्ट डिस्क से ध्वनि उत्पन्न होती है।

(v) ध्रुवित प्रकाश का उपयोग नाभिकीय रसायनो (DNA ,RNA ) के अध्धयन में होता है।