गुरुत्वाकर्षण

दो कणों के मध्य कार्य करने वाला आकर्षण बल उन कणों की संहतियों के गुणनफल का समानुपाती होता है तथा उनके मध्य की दूरी के वर्ग का व्युत्क्रमानुपाती होता है। कणों के बीच कार्य करने वाले आपसी आकर्षण को गुरुत्वाकर्षण (Gravitation) तथा उससे उत्पन्न बल को गुरुत्वाकर्षण बल (Force of Gravitation) कहा जाता है।

गुरुत्वाकर्षण बल का सूत्र

F = Gm1m2 / r2

जहाँ –

  • F – बल को दर्शाता है
  • G – गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक को दर्शाता है
  • m1 – वस्तु का द्रव्यमान 1 को दर्शाता है
  • m2 – वस्तु का द्रव्यमान 2 को दर्शाता है
  • r – वस्तु के केंद्रों के बीच की दूरी को दर्शाता है।

पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण – 9.807 m/s²

गुरुत्वाकर्षण का इतिहास –

भारत के महान गणितज्ञ तथा खगोलशास्त्री आर्यभट (476 – 550 ईसा पूर्व) और महान यूनानी तत्वज्ञानी अरस्तू (384 – 322 ईसा पूर्व), ने सर्वप्रथम गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत के बारे मे तथ्य दिये।

उसके बाद आधुनिक युग के 16वीं शताब्दी मे गैलीलियो गैलीली (1564 – 1642) ने एक परीक्षण किया जिसमे उन्होने कुछ गेंदों को एक टावर (पीसा का मीनार) से सीधा नीचे फेंका। उसके बाद किसी झुकाव वाली वस्तु पर उन गेंदों को लुढ़काते हुये गिरने के लिए नीचे छोड़ा और इन दोनों स्थिति मे भौतिकीय परीक्षण किए, तथा उन्होने पाया की सभी वस्तुओं के गुरुत्वीय त्वरण समान होता है।

अंत में, सर आईजक न्यूटन ने सालों तक परीक्षण किया तथा गुरुत्वाकर्षण पर एक गणितीय सूत्र प्रतिपादित किया। जो न्यूटन के सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत कहलाता है।

न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण का सार्वत्रिक नियम –

न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का नियम प्रतिपादित किया जिसके अनुसार दो द्रव्य कण के मध्य लगने वाला आकर्षण बल कण के द्रव्यमानों के गुणनफल के समानुपाती होता है तथा उनके मध्य की दूरी के वर्ग के व्युतक्रमानुपाती होता है। इस बल की दिशा दोनों कण को मिलाने वाली रेखा की सीध में रहती है।

दो कण जिनके द्रव्यमान क्रमश: m1m2 है, तथा आपसी दूरी r पर स्थित हैं। यदि उनके मध्य कार्यरत गुरुत्वाकर्षण बल F है तो –

F ~ m1m2

F ~ 1/r2

F ~ m1m2/ r2

F = Gm1m2/r2

यहां G समानुपाती नीयतांक है जिसको सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नीयतांक (Universal gravitational constant) कहते हैं।

G का मान :-

G = सार्वत्रिक गुरुत्वाकर्षण नीयतांक

SI पद्धति में :– G = 6.67 × 10-11 न्यूटन×मी.2/किग्रा.2

G की विमा :- [M-1L3T-2]

न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सार्वत्रिक नियम के महत्व –

  • गुरुत्वकर्षण का नियम का उपयोग नए तारों तथा ग्रहों को खोजने में किया जाता है।
  • गुरुत्वाकर्षण का नियम के द्वारा सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहों के द्रव्यमान का पता किया जाता है।
  • गुरुत्वाकर्षण का नियम पृथ्वी का सही द्रव्यमान पता करने में मदद करता है।
  • गुरुत्वाकर्षण का मुख्य उपयोग युग्मतारों (double stars) के द्रव्यमानों का आंकलन करने में किया जाता है।

गुरूत्वीय त्वरण (g) –

जब किसी वस्तु को ऊपर से मुक्त रूप से छोड़ा जाता है, तो वह गुरूत्व बल के कारण पृथ्वी की तरफ गिरने लगती है और जैसे-जैसे वस्तु पृथ्वी के सतह के पास आती है, वैसे-वैसे उसके वेग में वृद्धि हो जाती है। अतः उसके वेग में त्वरण पैदा हो जाता है। यही गुरूत्वीय त्वरण कहलाता है।

गुरूत्वीय त्वरण को g के द्वारा दर्शाया जाता है। यह वस्तु के आकार, आकृति, द्रव्यमान आदि पर निर्भर नहीं होता है। पृथ्वी तल पर इसका औसत मान 9.8 मी/से2 होता है। यह मान 45 अक्षाश पर समुन्द्र तल पर माना जाता है।

पृथ्वी का द्रव्यमान M तथा त्रिज्या R है तथा पृथ्वी का कुल द्रव्यमान उसके केंद्र पर संकेंद्रित है। अब यदि m द्रव्यमान की वस्तु पृथ्वी के केंद्र से r दूरी पर हो तो वस्तु पर कार्यरत गुरुत्वाकर्षण बल –

F = GMm/r2

g = GM/R2

गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र :-

किसी द्रव्य कण अथवा द्रव्य कण तंत्र के चारो तरफ मौजूद क्षेत्र में अन्य द्रव्य कण को गुरुत्वाकर्षण बल का अनुभव होता है। यह क्षेत्र उस द्रव्य कण तंत्र का गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र कहलाता है। सैद्धांतिक रूप से गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र की परास (range) अंनत तक होती है, परन्तु प्रायोगिक रूप से किसी विशिष्ट सीमा के पश्चात गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र बहुत कम हो जाता है।

गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र की तीव्रता (I) :-

किसी गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में किसी बिंदु पर गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र की तीव्रता को उस बिंदु पर रखे एकांक द्रव्यमान पर आरोपित गुरुत्वाकर्षण बल द्वारा परिभाषित किया जाता है।

I = F/m

गुरूत्वीय स्थितिज ऊर्जा –

किसी गुरूत्वीय क्षेत्र में एक बिंदु पर रखे कण की गुरूत्वीय स्थितिज ऊर्जा को गतिज ऊर्जा में बदलाव किये बिना अंनत से उस बिंदु तक लाने में आवश्यक कार्य की मात्रा द्वारा परिभाषित किया जाता है।

गुरुत्वाकर्षण विभव –

किसी द्रव्यमान पिंड के चारो तरफ गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र को केवल गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र की तीव्रता से ही प्रदर्शित नहीं किया जा सकता है बल्कि
एक अदिश फलन के द्वारा भी दर्शाया जा सकता है जिसे गुरुत्वाकर्षण विभव (V) कहा जाता है। तथा किसी एकांक द्रव्यमान को उसकी गतिज ऊर्जा में कोई बदलाव किए बिना अनंत से किसी बिंदु तक लाने में किये गए कार्य को उस बिंदु पर गुरुत्वाकर्षण विभव कहा जाता है।