विधुत धारा

विद्युत आवेश के प्रवाह या गति में होना, विद्युत धारा (इलेक्ट्रिक करंट) कहलाता है। मात्रात्मक रूप से, आवेश की प्रवाह दर विद्युत धारा कहलाती हैं। एक कूलांम प्रति सेकेण्ड की दर से बहने वाली विद्युत आवेश को एक एम्पीयर धारा कहते है। अधिकतर धातुओं के परमाणुओं की अंतिम कक्षा में सिर्फ एक-दो इलेक्ट्रॉन ही उपस्थित रहते हैं और नाभिक से दूरी के कारण इनमें नाभिक के प्रति आकर्षण बल का मान काफी कम होता है।

अतः ऐसे तत्वों के परमाणुओं में से कुछ बल लगाकर जैसे- विद्युत वाहक बल लगाकर इलैक्ट्रॉन्स को गतिमान किया जा सकता है। ऐसे इलेक्ट्रॉन्स (मुक्त इलेक्ट्रॉन्स) एक परमाणु से दूसरे परमाणु में होते हुए उस तत्व के टुकड़े के आरपार प्रवाहित किए जा सकते हैं। इस प्रकार किसी तत्व का पदार्थ में से इलैक्ट्रॉन्स का प्रवाह को विद्युत धारा कहा जाता है।

विद्युत धारा का सूत्र

विद्युत धारा = आवेश/समय
या
I= Q/T

विद्युत धारा का मात्रक

विद्युत धारा का SI मात्रक एम्पियर (Ampere) है। छोटे रूप में इसको amp तथा इसका चिन्ह A होता है इसका मापन एंपियर मीटर या एमीटर द्वारा किया जाता है।
धारा का मात्रक = कुलाम /समय = Cs-1

विद्युत धारा के अन्य मात्रक

1 मिली ऐम्पीयर = 10-3 ऐम्पीयर
1 माइक्रो ऐम्पीयर = 10-6 ऐम्पीयर
1 नैनो ऐम्पीयर = 10-9 ऐम्पीयर

विद्युत धारा की विमा – विद्युत धारा एक मूल राशि है इसलिए इसकी विमा A1 होती है।

एम्पीयर की परिभाषा :- किसी विद्युत परिपथ में 1 सेकण्ड में 1 कूलॉम आवेश का प्रवाहन होता है तो उस परिपथ में विद्युत धारा का मान भी 1 एम्पीयर होता है।

विद्युत धारा की दिशा –

प्रारम्भिक अवधारणा (conventional Concept) के अनुसार विद्युत धारा की दिशा धन (+) वस्तु से ऋण () वस्तु की ओर होती है परन्तु इलैक्ट्रॉन्स की खोज एवं परमाणु संरचना का पता हो जाने के बाद यह ज्ञात हुआ कि जिस वस्तु के परमाणु कुछ इलैक्ट्रॉन्स को त्याग कर देते हैं, उस वस्तु को धनावेशित (positively charged) कहते है।

इसी प्रकार, जिस वस्तु के परमाणु कुछ इलैक्ट्रॉन्स ले लेते हैं वह वस्तु ऋणावेशित (negatively charged) वस्तु कहलाती है अर्थात् मुक्त इलैक्ट्रॉन्स की बहुलता वाली वस्तु ऋणावेशित एवं इनकी कमी वाली वस्तु, धनावेशित वस्तु होती है जिस वस्तु के पास मुक्त इलैक्ट्रॉन्स की बहुलता है, वही दूसरी मुक्त इलैक्ट्रॉन्स की कमी वाली वस्तु को मुक्त इलैक्ट्रॉन्स दे सकता है। अतः इलैक्ट्रॉन्स के बहाव की दिशा ऋण वस्तु से धन वस्तु की ओर होती है।

धन आवेश उच्च विभव से निम्न विभव की तरफ प्रवाहित होते है तथा धारा का प्रवाह भी उच्च विभव से निम्न विभव की तरफ होता है अतः धन आवेश तथा धारा की दिशा समान रहती है ( धन (+) वस्तु से ऋण (-) वस्तु की तरफ )।
ऋण आवेश निम्न विभव से उच्च विभव की तरफ प्रवाहित होता है। अतः ऋण आवेश (इलेक्ट्रॉन) का प्रवाह धारा की दिशा के ठीक विपरीत दिशा में होता है।

विद्युत धारा घनत्व –

इकाई क्षेत्रफल से बहने वाली धारा की मात्रा विद्युत धारा घनत्व या करंट डेन्सिटी कहलाती है। इसको J से दर्शाया जाता हैं। यदि किसी चालक से I धारा बह रही हो और धारा के प्रवाह के लम्बवत उस चालक का क्षेत्रफल A हो तो-

J = I / A

जहाँ –

J – धारा घनत्व को प्रदर्शित करता है

I – विद्युत धारा को दर्शाता है

A – क्षेत्रफल को प्रदर्शित करता है।

इसकी इकाई एम्पीयर / वर्ग मीटर (1A / m2) होती है।

यहाँ धारा घनत्व, चालक के पूरे अनुप्रस्थ क्षेत्रफल पर बराबर है। लेकिन अधिकांश स्थितियों में ऐसा नहीं होता है। उदाहरण के लिये जब भी चालक से अत्यधिक आवृति की प्रत्यावर्ती धारा (जैसे 1 मेगा हर्ट्स की प्रत्यावर्ती धारा) को प्रवाहित किया जाता है तो उसके बाहरी सतह के पास धारा घनत्व काफी ज्यादा रहता है तथा जैसे-जैसे सतह से भीतर केन्द्र की ओर जाते हैं, धारा घनत्व में कमी आने लगती है। यही कारण है की अधिक आवृति की धारा के लिये मोटे चालक बनाने के बजाय बहुत ही कम मोटाइ के तार का निर्माण किया जाता हैं। इससे तार में नम्यता (flexibility) उत्पन्न होती है।

ओम का नियम

ओम के नियम में, एक आदर्श प्रतिरोधक में प्रवाहित धारा, विभवान्तर के समानुपाती होती है।

I = V / R

जहाँ –

I – धारा, (एम्पीयर में)
V – विभवांतर, (वोल्ट में)
R – प्रतिरोध, (ओह्म में)

विद्युत धारा के प्रकार –

  1.  डायरेक्ट करंट (DC)
  2. आल्टरनेटिंग करंट (AC)

1. दिष्ट धारा (डायरेक्ट करंट DC) –

DC करंट में प्रवाह हमेशा एक दिशा में होता है। इसे लगातार या एक ही दिशा में बहने वाली (Unidirectional) करंट भी कहा जाता हैं। इसको (D.C) द्वारा प्रदर्शित किया जाता हैं।
इस तरह की करंट का निर्माण करने के लिए D.C. जनरेटर, D.C रेक्टिफायर, सैल, बैटरी, इत्यादि का उपयोग किया जाता है। इससे बैटरी को चार्ज करने, इलैक्ट्रोप्लेटिंग के कार्य इत्यादि के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

2. प्रत्यावर्ती धारा (आल्टरनेटिंग करंट AC) –

आल्टरनेटिंग करंट का मान और दिशा समय के अनुसार परिवर्तित होते रहते हैं। इसको A.C द्वारा दर्शाया जाता है। इसकी दिशा शून्य से अधिकतम (Maximum) मान की ओर रहती है। और फिर उसी दिशा में शून्य तक कम हो जाती है और फिर से विपरीत दिशा में शून्य से अधिकतम मान की तरफ बढ़ती है और फिर उसी दिशा में शून्य तक हो कम जाती है।

विद्युत धारा के प्रभाव –

विद्युत धारा का चुम्बकीय प्रभाव :-

  • नर्म लोहे के क्रोड वाली परिनालिका विद्युत चुम्बक कहलाती हैं।
  • विद्युत धारा चुम्बकीय क्षेत्र का निर्माण करती है, यह घटना विद्युत का चुम्बकीय प्रभाव कहलाती है।
  • इनका उपयोग फेक्ट्रियों, तार-संचार, अस्पतालों में विद्युत घण्टी, ट्रांसफार्मर, डायनेमो, टेलीफोन आदि का निर्माण करने में होता है। नर्म लोहा अस्थायी चुम्बक बनाता है।

विद्युत धारा का रासायनिक प्रभाव :-

किसी लवण के जलीय विलयन को, जिसमें से विद्युत धारा प्रवाहित हो रही होती है, विद्युत अपघट्य (electrolyte) कहा जाता हैं। जब किसी लवण के जलीय विलयन में विद्युत धारा का प्रवाहन होता है तो उसका विद्युत अपघटन होता है अर्थात उस विलयन का धनात्मक व ऋणात्मक आयनों में अपघटन (decomposition) होता है। यह घटना विद्युत धारा का रासायनिक प्रभाव कहलाती है।

विद्युत धारा का ऊष्मीय प्रभाव :-

चालक के ताप के बढने की घटना को विद्युत धारा का ऊष्मीय प्रभाव कहा जाता है। विद्युत धारा का ऊष्मीय प्रभाव का उपयोग घरेलू उपकरणों जैसे – विद्युत हीटर, विद्युत प्रेस, बल्ब, ट्युबलाइट आदि किया जाता है।