विद्युत चुम्बक

विद्युत धारा के कारण जिस लोहे में चुंबकत्व का निर्माण होता है, वह विद्युत चुंबक (Electromagnet) कहलाता हैं। इसके लिये लोहे पर तार को लपेटकर उस तार से विद्युत धारा प्रवाहित करके लोहे में चुम्बकत्व का गुण पैदा किया जाता है। (लोहे पर चुंबक रगड़कर लोहे को चुंबकीय किया जा सकता है जो विद्युत चुम्बकत्व नहीं है)

विद्युत चुम्बक को नर्म लोहे के टुकड़े पर तांबे का तार लपेट कर उत्पन्न किया जाता हैं तथा यह विद्युत धारा के प्रवाह द्वारा ही अपना प्रदर्शन कर सकती है व इसमें विद्युत प्रभाव बंद करने पर इसका चुंबकीय गुण भी समाप्त हो जाता है।

विद्युत चुंबक की खोज – सर्वप्रथम 1825 ई. में इंग्लैंड के विलियम स्टर्जन (William Sturgeon) ने।

विद्युत चुंबक का SI मात्रक – एंपियर/मीटर।

चुम्बक के दो प्रकार होते है –

  1. स्थाई चुम्बक
  2. अस्थाई चुंबक

स्थायी चुम्बक :-

स्थायी चुम्बक के द्वारा बनाये गये चुम्बकीय क्षेत्र बिना किसी बाह्य विद्युत धारा के ही प्राप्त होते है और सामान्य परिस्थितियों में बिना किसी कमी के बना रहता है। जिस चुम्बक में स्थायी चुम्बकत्व का गुण पाया जाता है वह स्थायी चुम्बक कहलाता हैं। इन चुम्बक का निर्माण लोहा, निकिल, कोबाल्ट आदि के द्वारा किया जाता हैं। इनका चुम्बकत्व जल्दी ख़त्म नहीं होता है अत: इनका उपयोग लम्बे समय तक किया जा सकता हैं। उदाहरण के लिए लाउडस्पीकर, दिक्सूचक, गैल्वेनोमीटर आदि के स्थायी चुम्बक इस्पात के द्वारा ही बनाये जाते है।

अस्थायी चुम्बक :-

अस्थायी चुम्बक तभी चुम्बकीय क्षेत्र बनाते करते हैं जब इनके द्वारा उपयोग किये गए तारों से होकर विद्युत धारा को प्रवाहित किया जाता है। धारा के समाप्त करते ही इनका चुम्बकीय क्षेत्र लगभग शून्य हो जाता है। जिस चुम्बक में स्थायी चुम्बकत्व का गुण नहीं पाया जाता है वह चुम्बक अस्थायी चुम्बक कहलाती हैं। अस्थायी चुम्बकों को प्रायः नर्म (मुलायम) लोहे का बनाया जाता है। उदाहरण के लिए विद्युत घण्टी, ट्रांसफॉर्मर क्रोड, डायनेमो आदि के अस्थायी चुम्बक का निर्माण नर्म लोहे के द्वारा किया जाता है। अधिकतर अस्थायी चुम्बकों को नर्म लोहे के चारों तरफ प्रथक्कृत चालक तार की कुण्डली में विद्युतधारा प्रवाहित करके बनाया जाता है।

चुम्बक के गुण :-

  • स्वतंत्रतापूर्वक लटकाने पर चुम्बक हमेशा उत्तर-दक्षिण दिशा में ही रहता है।
  • यह चुम्बकीय पदार्थों को अपनी ओर खींचता है।
  • विजातीय ध्रुवों में आकर्षण तथा सजातीय ध्रुवों में प्रतिकर्षण का गुण पाया जाता है।
  • चुम्बक के दो ध्रुव- उत्तरी ध्रुव (North Pole) व दक्षिणी ध्रुव (South Pole) होते हैं।
  • चुम्बक के अन्दर प्रत्येक सिरे के निकट एक ऐसा बिन्दु पाया जाता है जहाँ चुम्बकत्व का गुण सर्वाधिक होता है, इसे चुम्बकीय ध्रुव कहा जाता हैं।
  • चुम्बक का चुम्बकत्व का गुण चुम्बक को गर्म करने पर, पीटने पर या घिसने पर नष्ट हो सकता है।

विद्युत चुम्बक के उपयोग:-

  • विद्युत चुम्बक का उपयोग लोहे के भारी सामान को उठाने में, लोहे की छीलन तथा लोहे के टुकड़ों आदि को उठाने आदि कार्यो में किया जाता है।
  • इसका उपयोग विद्युत चलित उपकरणों जैसे टेलीग्राफ, मिक्सर-ग्राइंडर, विद्युत घंटी, पंखा, टेलीफोन, स्पीकर आदि में किया जाता है।
  • उद्योगों में अचुम्बकीय पदार्थों से चुम्बकीय पदार्थ जैसे लोहा, निकिल, कोबाल्ट आदि को पृथक करने में।

विद्युतधारा तथा चुम्बकत्व –

सन् 1820 में डेनमार्क के प्रसिद्ध भौतिकशास्त्री हेंस क्रिस्टियन ओर्स्टेड ने विभिन्न प्रयोग करके पता लगाया कि विद्युतधारा और चुम्बकत्व का आपस में गहरा संबंध है। किसी तार में विद्युत धारा प्रवाहित करने पर तार के आसपास चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है ।

चुम्बक में आकर्षण व प्रतिकर्षण :-

चुम्बक के सजातीय ध्रुवों में प्रतिकर्षण तथा विजातीय ध्रुवों में आकर्षण पाया जाता है। किसी चुम्बक के आसपास का वह क्षेत्र जिसमें चुम्बकीय शक्ति का प्रभाव मौजूद होता है उसे चुम्बकीय क्षेत्र कहा जाता है। चुम्बक जितना शक्तिशाली होगा उसका चुम्बकीय क्षेत्र उतना ही ज्यादा बड़ा होगा। धनात्मक व ऋणात्मक विद्युत आवेश स्वतंत्रतापूर्वक रहते हैं ।

पार्थिव चुम्बकत्व :-

पृथ्वी भी एक चुम्बक की तरह व्यवहार करती है। पृथ्वी के इस गुण को पार्थिव चुम्बकत्व का गुण कहा जाता हैं ।

पार्थिव चुम्बकत्व हेतु प्रमाण :

  1. क्षैतिज तल में स्वतंत्रतापूर्वक लटकता हुआ चुम्बक सदैव उत्तर-दक्षिण दिशा में ही रुकता है। ऐसा होने का कारण पृथ्वी का चुम्बक की भाँति व्यवहार करना होता है।
  2. लोहे की एक छड़ को उत्तर-दक्षिण दिशा में जमीन में गाड़ देने पर वह कुछ समय बाद चुम्बक पार्थिव बन जाती है। ऐसा तभी होता है जब पृथ्वी चुम्बक की भाँति व्यवहार करे।
  3. पृथ्वी एक विशाल चुम्बक की तरह व्यवहार करती है। उत्तर दिशा (भौगोलिक उत्तर) के करीब पार्थिव चुम्बक (पृथ्वी के चुम्बक) का दक्षिणी ध्रुव व दक्षिण दिशा (भौगोलिक दक्षिण) के करीब पार्थिव चुम्बक का उत्तरी ध्रुव स्थित है।

विद्युत चुम्बकीय प्रेरण :-

जब किसी चालक में विद्युतधारा को प्रवाहित किया जाता है तो उसके चारो ओर चुम्बकीय क्षेत्र का निर्माण हो जाता है। यदि किसी कुण्डली और चुम्बक के बीच सापेक्षिक गति होती रहती है तो विद्युतधारा भी उत्पन्न होती रहती है। चुम्बक व बन्द कुण्डली के बीच आपेक्षिक गति तीव्र होने पर कुण्डली में धारा ज्यादा मात्रा में उत्पन्न होती है और आपेक्षिक गति धीमी होने पर धारा कम मात्रा में उत्पन्न होती है। आपेक्षिक गति शून्य होने पर कोई धारा उत्पन्न नहीं होती। इस प्रकार से बन्द कुण्डली में उत्पन्न धारा को प्रेरित विद्युतधारा कहा जाता हैं। यह सिद्धांत विद्युत चुम्बकीय प्रेरण (Electromagnetic Induction) कहलाता हैं। कई प्रकार के यंत्र विद्युत चुम्बकीय प्रेरण के सिद्धान्त पर कार्य करते हैं जैसे- विद्युत जनित्र, ट्रांसफार्मर आदि इसके उदाहरण है।

चुम्बकीय फ्लक्स (Magnetic flux)

वह भौतिक राशि जो किसी तल (जैसे किसी चालक तार की कुण्डली) से होकर गुजरने वाले चुम्बकीय क्षेत्र का सम्पूर्ण परिमाण की माप होती है, चुम्बकीय फ्लक्स कहलाती है। इसे Φm से प्रदर्शित किया जाता है। चुम्बकीय फ्लक्स का SI मात्रक वेबर (weber) होता है तथा इसका व्युत्पन्न मात्रक वोल्ट-सेकेण्ड तथा CGS मात्रक मैक्सवेल होता है।

फैराडे की विद्युत चुंबकीय प्रेरण के नियम

प्रथम नियम :- जब किसी बंद परिपथ से जुड़े चुंबकीय फ्लक्स में बदलाव किया जाता है तो परिपथ में प्रेरित विद्युत वाहक बल पैदा होता है। तथा इस प्रेरित विद्युत वाहक बल के कारण प्रेरित धारा पैदा होती है। जब तक चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है, तब तक यह विद्युत वाहक बल रहता है।

दूसरा नियम :- किसी परिपथ में प्रेरित विद्युत वाहक बल चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन की दर के समान होता है।

अर्थात यदि प्रेरित विद्युत वाहक बल (e) हो तो –

e= -dΦ/dt

जहाँ-

  • e – विद्युतवाहक बल को प्रदर्शित करता है
  • Φ – परिपथ से होकर गुजरने वाला चुम्बकीय फ्लक्स को दर्शाता है

यदि कुंडली में फेरो की संख्या N हो तो प्रेरित विद्युत वाहक बल –

e= -NdΦ/dt

जहाँ-

  • N – घुमावों की संख्या दर्शाता है
  • – चुम्बकीय फ्लक्स में बदलाव को प्रदर्शित करता है।
  • dt – समय में बदलाव को दर्शाता है।

चुम्बकीय फलक्स में निम्न प्रकार से परिवर्तन किये जा सकते है –

  • कुंडली को चुंबकीय क्षेत्र में घुमाकर।
  • कुंडली के क्षेत्रफल में बदलाव करके।
  • कुंडली में मौजूद चुंबकीय क्षेत्र को परिवर्तित करके।