ब्रिटेन का संविधान

ब्रिटिश संविधान यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन तथा उत्तरी आयरलैंड का संविधान है। इंग्लैंड, वेल्स और स्कॉटलैंड से मिलकर ग्रेट ब्रिटेन मिलकर बना है। 1535 में इंग्लैंड, और वेल्स का एकीकरण हुआ था और ग्रेट ब्रिटेन के राज्य का निर्माण करने के लिए उनमें स्कॉटलैंड 1707 में शामिल हुआ था जब कि यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन और उत्तरी आयरलैंड की स्थापना 1921 में हुई।

ब्रिटेन संविधान की विशेषताएं –

अलिखित संविधान-

संविधान शब्द का अर्थ यह है कि संविधान एक सर्वोच्च कानून है जिसमें समस्त नियमों व अन्य कानूनों का वर्णन सूचीबद्ध ढ़ंग से किया जाता है। परंतु ब्रिटेन इसका अपवाद है क्योंकि अन्य देशों की तरह वहाँ संविधान एक मुद्रित और पुस्तक के रूप में नहीं दिखाई देता क्योंकि अधिकतर भाग अलिखित और बिखरा पड़ा है।

कुछ ऐतिहासिक चार्टर अधिनियम हैं जिनमें ब्रिटिश संवैधानिक व्यवस्था के मूल सिद्धांत हैं जैसे –

  • मेग्नाकार्टा (1215),
  • पिटिशन क्रमाँक राइटस (1628),
  • अधिकार बिल (1689) जन प्रतिनिधित्व कानून (1918)
  • समान मताधिकार कानून (1928)
  • वेस्टमिनिस्टर अधिनियम 1931
  • 1911 व 1949 के संसदीय कानून।

राजतंत्र, कुलीनतंत्र, तथा प्रजातंत्र का मिश्रण-

ब्रिटेन का संविधान इन तीनों का मिश्रित संविधान है। ब्रिटेन मे एक राजा भी होता है जिसे क्राॅउन भी कहा जाता है लेकिन वह भारत के राष्ट्रपति के समान नाममात्र का कार्यपालक होता है। लार्ड सभा कुलीनतंत्र और लोकसभा प्रजातंत्र का प्रतिनिधित्व करती है।

प्राचीन संविधान

ब्रिटिश संविधान की एक विशेषता यह है कि यह विश्व के सबसे प्राचीन संविधानों मे से एक संविधान है। ब्रिटेन में ही सर्वप्रथम संवैधानिक शासनकी शुरुआत हुई थी।

विकसित संविधान

ब्रिटिश संविधान विकास का एक परिणाम है। इसे बनाने के लिए सोवियत संघ (रूस) अमेरिकि, फ्रांस, भारत आदि देशो की तरह संविधान सभा का गठन नही किया गया था और न ही इस संविधान कि कोई घोषणा की गई थी। इसका विकास अंग्रेजी समाज के साथ ही हुआ है।

लचीलापन

ब्रिटिश संविधान अपने लचीलेपन से विश्व प्रसिद्द है। ब्रिटिश के संविधान मे आसानी है संशोधन किया जा सकता है इसमें संशोधन करने की प्रकिया सामान्य कानूनो के समान ही होती है।

संसद की सर्वोच्चता

ब्रिटिश संसद सर्वोच्च होती है उसे ब्रिटेन मे कानून बनाने की असीम शक्ति है। कानून की दृष्टि से ब्रिटेन की संसद को टक्कर देन वाली विश्व में कोई भी संसद नही है। ब्रिटिश संसद के पास संविधान मे संशोधन करने की भी असीमित शक्ति होती है।

विधि का शासन

ब्रिटेन मे विधि का शासन है वहा कानून से ऊपर कोई नही सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता है ब्रिटेन के हर नागरिक पर एक सा कानून लागू होता है।

अभिसमयों का महत्व

दुनिया के लगभग सभी संविधानों मे कुछ न कुछ रीति-रिवाज, परम्पराएं, परिपाटियाँ व अभिसमयों का कुछ अंश होता है लेकिन ब्रिटिश संविधान मे इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अभिसमयों के कारण ही ब्रिटिश संविधान का स्वरूप अलिखित होता है। फ्रीमैन के अनुसार हमारे पास राजनीतिक नैतिकता की सम्पूर्ण व्यवस्था है। जो परिनियमों या सामान्य विधियों के किसी पृष्ठ पर नही होती परन्तु व्यवहार मे मे घोषणा-पत्र या पिटीशन ऑफ राइट्स मे शामिल किसी भी सिध्दांत से कम पवित्र नही है।

ब्रिटिश संविधान के तत्व/स्त्रोत –

परंपराएँ :

ब्रिटिश संविधान के अधिकांश मूलतत्त्व का गठन परंपराएं करती हैं । ये राजनीतिक व्यवहारों के अलिखित सिद्धांतों तथा संवैधानिक व्यवहार का प्रथागत आचरण है जिनका विकास समय के दौरान हुआ है । जे.एस. मिल के अनुसार इसको ‘संविधान के अलिखित नीतिवचन’ कहा गया। परंतु कानूनों के विपरीत, उनको न्यायालयों द्वारा मान्यता नहीं मिलती है और न ही न्यायालयों द्वारा इन्हें लागू नहीं किया जाता है ।

ब्रिटिश राजनीतिक संस्थाओं की वास्तविक गतिविधियों में ये परंपराएँ बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं । चूँकि उनको परंपरा और जनमत का समर्थन मिलता है इसलिए आमतौर पर उनका पालन किया जाता है ।

ब्रिटेन की कुछ परंपराएँ :-

  • राजा या रानी को अपने वैधानिक अधिकारों का प्रयोग प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल की सलाह पर करना चाहिए।
  • राजा को प्रधानमंत्री पद पर हाउस ऑफ कॉमंस में बहुमत रखने वाली पार्टी के नेता की नियुक्ति करनी चाहिए।
  • राजा को संसद के निचले सदन की समाप्ति प्रधानमंत्री की सलाह पर करनी चाहिए ।
  • राजा को संसद द्वारा पारित तमाम अध्यादेशों को अपनी सहमत देनी चाहिए ।
  • हाउस ऑफ कॉमंस के प्रति मंत्रिमंडल सामूहिक तथा व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार है ।

महान अधिकार पत्र:

इनको संवैधानिक घोषणा पत्र या संवैधानिक सीमाचिह्न भी कहते है। ये ऐतिहासिक दस्तावेज सम्राट की शक्तियों और नागरिकों की स्वतंत्रताओं को परिभाषित करते हैं। ब्रिटिश संविधान के कुछ मूल पक्षों पर अधिकार उनका उल्लेखनीय प्रभाव हैं। इन अधिकार पत्रों में महत्वपूर्ण हैं-

  • मैग्ना कार्टा (1215)
  • पिटीशन ऑफ राइट्‌स (1628)
  • बिल ऑफ राइट्‌स (1689)

अधिनियम :

ये ऐसे कानून हैं जिनको ब्रिटिश संसद समय-समय पर बनती रहती है। ये ब्रिटेन की अनेक राजनीतिक संस्थाओं के सिद्धांतों, उनके कार्यों और संरचना को निर्धारित तथा नियंत्रित करते हैं ।

ब्रिटेन में महत्त्वपूर्ण अधिनियम –

  • हेबियस कॉर्पस एक्ट (1679)
  • स्टेटयूट ऑफ वेस्टमिंस्टर (1931)
  • मिनिस्टर्स ऑफ क्राउन एक्ट (1937)
  • पीपुल्स रिप्रजेंटेशन एक्ट (1948)

निर्णय विधि :

न्यायिक निर्णयों, अधिनियमों और अधिकार पत्रों की व्याख्या करते समय न्यायाधीश कुछ निर्णयों की घोषणा कर सकते हैं । ऐसे निर्णय औपचारिक कानूनों के अर्थ और विस्तार को निश्चित करते हैं। इनका महत्व इस तथ्य में निहित है कि समान वादों में निचले न्यायालय उच्च न्यायालयों के निर्णयों को मानने के लिए बाध्य होते हैं। इनमें से कुछ ने लोगों के संवैधानिक अधिकारों तथा उनकी स्वतंत्रताओं को निश्चित किया है।