फ्रांस की क्रांति

  • समय – 5 मई 1789 – 9 नवम्बर 1799
  • स्थान – फ्रांस
  • परिणाम
    • सामंत शाही का अंत हुआ
    • राष्ट्रीयता की भावना का विकास हुआ
    • धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना की गयी
    • समाजवाद की स्थापना की गयी
    • सामाजिक समानता एवं राष्ट्रीय बंधुत्व की भावना का विकास हुआ

फ्रांस के इतिहास की राजनैतिक और सामाजिक उथल-पुथल एवं आमूल परिवर्तन का समय 1789 से 1799 तक था। बाद में, नेपोलियन बोनापार्ट ने फ्रांसीसी साम्राज्य के विस्तार द्वारा कुछ अंश तक इस क्रान्ति को आगे तक फैलाया। क्रान्ति के परिणामस्वरूप राजा को गद्दी से हटाया गया, एक गणतंत्र की स्थापना की गई, खूनी संघर्ष दौर की शुरुआत हुई और अंत में नेपोलियन की तानाशाही स्थापित हुई जिससे इस क्रान्ति के अनेकों मूल्यों का पश्चिमी यूरोप में तथा उसके बाहर प्रचार-प्रसार हुआ। इस क्रान्ति ने आधुनिक इतिहास की दिशा को ही बदल दिया। इससे विश्व भर में पूर्ण राजतन्त्र का नुकसान होना आरम्भ होने लगा, नये गणतन्त्र एवं उदार प्रजातन्त्र बने। फ्रांसीसी क्रान्ति में प्रमुख नेता जैसे – मिराबो, लाफायेत, दांतो, राॅब्सपियर, मारा, ब्रीसो एवं कार्नो का योगदान है।

फ्रांस की क्रांति में दार्शनिकों का योगदान –

मौटेस्क्यू

मॉण्टेस्क्यू ने अपनी पुस्तक ‘द स्पिरिट ऑफ लॉज’ (The Spirit of Laws) में राजा के दैवी अधिकारों के सिद्धान्तों को खंडित किया और फ्रांसीसी राजनीतिक संस्थाओं को आलोचित किया। उसने लिखा कि फ्रांसीसी सरकार एक निरकुंश सरकार है क्योंकि फ्रांस में कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका से सम्बंधित सभी शक्तियां एक ही व्यक्ति अर्थात राजा के हाथों में केन्द्रित है अतः फ्रांस की जनता को स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हुई। इसी के सदंर्भ में उसने शक्ति के पृथक्करण का सिद्धान्त भी प्रतिपादित किया जिसमें शासन के तीन प्रमुख अंग – कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका को अलग-अलग रखने का प्रस्ताव दिया।

उसके इंग्लैंड की सरकार को आदर्श सरकार कहने का कारण वहां संवैधानिक राजतंत्र था, जिससे वहां नागरिकों को स्वतंत्रता प्राप्त थी। इस प्रकार मॉण्टेस्क्यू ने शक्ति के पृथक्करण के माध्यम से फ्रांस की निरंकुश राजव्यवस्था पर प्रहार किया। उसके ये विचार इतने प्रसिद्ध हुए कि ‘द स्पिरिट ऑफ लाज’ के तीन वर्षों में छह संस्करण भी प्रकाशित हो गए। मॉण्टेस्क्यू ने न तो क्रांति की बात की और न ही राजतंत्र को समाप्त करने की। उसने तो सिर्फ निरंकुश राजतंत्र के दोषों को उजागर किया और संवैधानिक राजतंत्र की बात की।

वाल्टेयर

वाल्टेयर इस युग में दूसरा प्रसिद्ध दार्शनिक था। वह चर्च की रूढ़िवादिता अंग शोषण का कट्टर विरोधी था। उसने अपने चर्च और राज्य की बुराई की और लोगो का ध्यान आकर्षित किया। परिणामस्वरूप जनता में एक नए दृस्टि कोण का विकास हुआ और ये एक आदर्श शासन करने लगा। वाल्टेयर का कहना था की चर्च के प्रभाव के अंत से ही न्याय का शासन किया जाये। वह ऐसे शासन का समर्थक था की जिसका मुख्य उद्देश्य था – शक्ति जनता के हाथो में हो

रूसो

रूसो निरकुट सत्ता का कट्टर विरोध करता था और जनता को शक्ति का श्रोत मानता था। अपनी एक प्रसिद्ध पुस्तक में अपने विचारों का संकलप करते हुए फ्रांसीसी जनता को यह बताया की मनुष्य स्वतंत्र है लेकिन वह हर जगह जंजीर की जकड़न में है।

दिदरो

वैचारिक क्रान्ति के क्षेत्र में दिदरो की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका है। अन्य दार्शनिकों के समान वह भी क्रान्तिकारी विचारों का समर्थक था। उसने आलोवेयर की मदद से 17 भागों का एक विशाल विश्वकोश का संपादन किया। इस विश्वकोश में कई प्रकार के विषयों के साथ एकतन्त्रात्मक शासन, सामन्त प्रथा, कर पद्धति, अन्धविश्वास, असहिष्णुता, कानून तथा दास प्रथा पर विशद रूप से विचार किया गया। उसके विचारों तथा विश्वकोश ने फ्रांस में क्रान्तिकारी भावनाओं को फैलाने में अहम् भूमिका निभाई।

क्वेसने

क्वेसने एक मध्यवर्गीय परिवार से था। वह एक अर्थशास्त्री था और व्यापारियों पर चुंगी कर लगाने का घोर विरोध करता था। उसका यह मानना था कि कृषि और खाने राष्ट्रीय सम्पत्ति होती हैं। व्यापारी के द्वारा केवल उनका विनिमय किया जाता है या उनका रूप बदला जाता है। अत: व्यापार तथा उद्योग-धन्धों पर सरकार का कम-से-कम नियन्त्रण होना चाहिए। व्यापार तथा उद्योग-धन्धों को स्वतन्त्र छोड़ देना चाहिए। उसके इन विचारों ने क्रान्ति की प्रगति को अत्यधिक प्रभावित किया।

फ्रांस की क्रांति के कारण

फ्रांस की क्रांति के सामाजिक कारण –

फ्रांस का समाज एक असमान और विघटित समाज था। यह सामन्तवादी प्रवृत्तियों और विशेषाधिकारों के सिद्धान्त पर आधारित था। यह समाज तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया था –

  • प्रथम एस्टेट– पादरी
  • द्वितीय एस्टेट– सामन्त
  • तृतीय एस्टेट- जन साधारण।

सामाजिक हैसियत और अधिकारों के आधार पर उच्च पादरी तथा कुलीन सामन्त वर्ग विशेषाधिकार वर्ग के अंदर तथा सभी जनता-किसान, मजदूर, नौकरी और व्यापार करने वाले आदि अधिकारहीन वर्ग में शामिल थे। उच्च पादरी और कुलीन सामन्त सम्पन्न और अधिकतर भूमि के मालिक होने के बावजूद कर से आजाद थे। उनके पदों को खरीदा जा सकता था, जिससे उच्च पदाधिकारी और पादरी अयोग्य, भ्रष्ट और चापलूस हो गये थे।

सामन्त वर्ग का जीवन विलासिता का जीवन था और उसे किसानों से विभिन्न प्रकार के करों को वसूल करने का विशेष अधिकार प्राप्त था। मध्यम वर्ग धन और योग्यता में सम्पन्न होने के बाबजूद सुविधा की कमी थी, जिससे उसमें अत्यधिक असंतोष था। किसानों और मजदूरों की स्थिति सबसे दयनीय थी जिनकी जनसंख्या 80 प्रतिशत थी तथा जिन्हें अपनी आय का आधा भाग सामन्तीय, धार्मिक और राजकीय करों के रूप में चुकाना पड़ता था। समाज की यह दोहरी रवैया धीरे धीरे आपसी तनाव का आधार बन गई।

फ्रांस की क्रांति के राजनैतिक कारण –

फ्रांस में लुई 14वें के समय सत्ता का पूरी तरह से केन्द्रीकरण हो गया था। उसने पूर्ण निरंकुशता और शान-शौकत से शासन किया। कई युद्धों और नई राजधानी वर्साय की स्थापना करने में पर अत्यधिक खर्च करने के बावजूद उसने अपने उत्तराधिकारी को युद्ध न करने और जनहित के कार्य करने का सुझाव दिया। परन्तु उसका उत्तराधिकारी लुई 15वाँ कमजोर और विलासी प्रवृति का था। उसने अपने पड़ोसियों के साथ कई युद्ध लड़े जिनमे से अधिकांशतः युद्ध असफल हुए। लुई 16वाँ गद्दी पर बैठा तो फ्रांस की स्थिति निराशाजनक थी। वह स्थिति को सुधारने में सक्षम नहीं था। लुई 16वाँ ना तो खुद निर्णय ले सकता था और ना ही अपने मंत्रियों की उचित सलाह पर कार्य कर सकता था।

उस पर अपनी रानी मेरी एन्टोयनेट का अत्यधिक प्रभाव था। वह राजनीति और प्रशासन में लगातार हस्तक्षेप किया करती थी। वह आस्ट्रिया की राजकुमारी थी तथा फ्रांस की जनता को वह पसन्द नहीं थी। क्रांति के समय उसने राजा की कठिनाईयों को बढ़ा दिया।

  • फ्रांस की प्रतिनिधि सभा स्टेटस जनरल का अधिवेशन 1614 के बाद से नहीं हुआ था।
  • प्रांतों पर केन्द्र का नियंत्रण कमजोर हो गया।
  • पूरा देश अनेक प्रकार की इकाइयों मे विभाजित था तथा अलग-अलग स्थान पर भिन्न भिन्न कानून प्रचलित थे।
  • न्याय व्यवस्था जटिल और खर्चीली थी। एक प्रकार के वारंट ‘लेत्र द काशे’ द्वारा किसी को भी कभी भी गिरफ्तार किया जा सकता था।
  • व्यापार की दृष्टि से भी देश को कई भागो में विभाजित किया गया था और जगह-जगह चुंगी की सीमाएं थीं।
  • कर्मचारी अनियंत्रित और भ्रष्ट थे।

फ्रांस की क्रांति के आर्थिक कारण –

फ्रांस की वित्तीय नीति को दोषपूर्ण कहा जाता था। राज्य का कोई बजट नहीं था तथा राजा की व्यक्तिगत सम्पत्ति और राजकोश में कोई भेद नहीं था। राजपरिवार विलासिता और युद्धों पर अत्यधिक खर्च करता था। आय से अधिक व्यय होने के कारण फ्रांस की अर्थव्यवस्था कर्ज में दुब गयी।

  • फ्रांस मध्यम वर्ग के व्यापारियों का ऋणी बन रहा था।
  • कर व्यवस्था भी दोषपूर्ण थी।
  • करवसूली करते समय गरीब किसानों पर ठेकेदार द्वारा अत्याचार किया जाता था।
  • विशेषाधिकार वर्ग से सम्पन्न होने के बावजूद कोई कर नहीं वसूला जाता था।
  • सम्पूर्ण करों का भार किसानों, मजदूरों और सामान्य जनता को उठाना करना पड़ता था।
  • यहाँ के शासकों द्वारा कृषि और उद्योग के विकास की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था।
  • अप्रत्यक्ष कर जैसे – नमक कर आदि को वसूलने के लिए ठेका प्रथा प्रचलित थी।

फ्रांस की क्रांति के बौद्धिक कारण –

फ्रांस में दार्शनिकों और लेखकों ने फ्रांसीसी समाज में फैली असमानता, भ्रष्टाचार, धार्मिक अंधविश्वास आदि की कटु आलोचना कर जनता को बदलाव करने को प्रेरित किया। अनेक गोश्ठियों (सैलो) और संस्थाओं में यह दार्शनिक वर्तमान व्यवस्था की बुराइयों पर विचार विमर्श करते थे। इनका प्रभाव मध्यम वर्ग पर पड़ा तथा इन्हें क्रांति का जन्मदाता नहीं कहा जा सकता। फ्रांस में परिवर्तन हेतु वैचारिक आधार प्रदान करने का कार्य इन लेखकों द्वारा किया गया।

  • मान्टेस्क्यू ने अपनी पुस्तक द स्पिरिट ऑफ लॉज में शक्ति के पृथक्करण का सिद्धान्त प्रतिपादित किया।
  • वह संवैधानिक शासन पद्धति का पक्षधर था।
  • वाल्टेयर ने प्राचीन रूढ़ियों, कुप्रथाओं और अंधविश्वासों का विरोध किया।
  • रूसो ने ‘सोशल कांट्रैक्ट’ नामक पुस्तक में स्पष्ट किया कि शासक को जनता के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए।

फ्रांस की क्रांति के तात्कालिक कारण –

फ्रांस में वित्तीय संकट उत्पन्न हो गया था। लुई 16वें ने अपने अर्थमंत्रियों क्रमश: तुर्गो, नेकर, कालोन, और ब्रीएन सुझाव से इस संकट को दूर करने के लिए अनेक प्रयास किए। रानी और दरबारी सामन्तों के षड़यंत्र और सहयोग न करने से सभी प्रयास विफल हो गये।

अंतत: लुई 16वें ने अध्यादेशों के द्वारा सामन्त वर्ग पर कर लगाना चाहा। पेरिस की पार्ल मां ने स्पष्ट किया कि राजा नया कर नहीं लगा सकता है, केवल राज्य को ही ‘स्टेटस जनरल’ के माध्यम से कर लगाने का अधिकार है। इस प्रकार विशेषाधिकार सम्पन्न सांमत वर्ग ने राजा का विरोध करके फ्रांस को क्रांति की ओर धकेल दिया।

फ्रांस की क्रांति के परिणाम

सामंत शाही का अंत –

फ्रांसीसी क्रांति का मुख्य उद्देश्य इन सामंती व्यवस्था का अंत करना था। इस व्यवस्था के अंदर बहुत वर्षों तक सामान्य जनता का शोषण किया जाता था। आर्थिक शोषण तो इस व्यवस्था की चरित्रिक विशेषता थी फ्रांस की क्रांति द्वारा विशेष अधिकारों का अंत करके समानता के सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया। क्रांति का अन्य देशों पर भी प्रभाव पड़ा कि यूरोप के अन्य देशों में भी धीरे-धीरे सामंत शाही का अंत हो गया।

सामाजिक समानता एवं राष्ट्रीय बंधुत्व की भावना का विकास –

क्रांति के समय क्रांति कार्यों द्वारा इन्हें 3 सिद्धांतों के प्रसार को अपना मुख्य उद्देश्य बनाया गया। क्रांति ने राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक की दृष्टि से प्रत्येक नागरिक को पूर्ण रूप से स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान किया। स्वतंत्रता समानता और बंधुत्व का प्रचार केवल फ्रांस में ही नहीं अपितु समस्त यूरोप में किया गया।

लोकप्रिय संप्रभुता के सिद्धांत का प्रतिपादन –

इस क्रांति के माध्यम से राजनीतिक दृष्टि से राजाओं के अधिकार के सिद्धांत को समाप्त किया गया था तथा लोकप्रिय सिद्धांत का प्रतिपादन किया। सर्वसाधारण द्वारा देश की राजनीति में प्रत्यक्ष रूप से हिस्सा बताने में उनमें आत्मविश्वास की भावना का संचार हुआ।

धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना –

इस क्रांति के परिणामस्वरुप यूरोपीय देशों में धार्मिक सहिष्णुता का विपरीत प्रभाव पड़ा तथा लोगों को धार्मिक उपासना की सुंदरता मिली तथा धारण के संबंध में राजा का कोई हस्तक्षेप नहीं रहा।

समाजवाद की स्थापना –

कुछ इतिहासकारों के अनुसार फ्रांस की क्रांति समाजवादी विचारधारा का एक स्रोत थी। इस घोषणा में स्पष्ट किया गया की “सभी मनुष्य एक समान है तथा उनकी उन्नति के अवसर प्रत्येक को एक समान ही मिलना चाहिए।” विशेषाधिकार युक्त वर्ग को समाप्त करने के लिए 4 अगस्त 1789 ई. को प्रस्ताव जारी किया गया जिसके द्वारा कुलीन वर्ग का अंत हो गया अब कुलीन लोग साधारण वर्ग के समान ही थे तथा अब वेद दरिद्र किसानों पर अत्याचार नहीं कर सकते थे दास प्रथा भी समाप्त हो गयी। जागीरदारों ने जनता के रुख को देखकर स्वयं ही अपने विशेष अधिकारओं का त्याग कर दिया तथा फ्रांस में असमानता का भी अंत हो गया।

राष्ट्रीयता की भावना का विकास –

इस क्रांति का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य नागरिक के हृदय में अपने देश की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीयता की भावना पैदा करना है जब विदेशी सेनाओं ने राजतंत्र की सुरक्षा के लिए फ्रांस पर हमला किया तो उस समय किसान मजदूर एवं अन्य लोगों ने सेना में भर्ती होकर बहुत वीरता से विदेशी सेनाओं का सामना किया तथा विजय हासिल की। राष्ट्रीयता की भावना यूरोप के अन्य देशों में भी फैलती गई। 1830 ई. से 1848 ई. की व्यापक क्रांतियां तथा 1870-71 में इटली और जर्मनी के एकीकरण इसके मुख्य उदाहरण हैं।

शिक्षा एवं संस्कृति का विकास –

फ्रांस की क्रांति ने शिक्षा को चर्च के अधिकार से निकालकर उसे राष्ट्रीय सार्वभौमिक तथा धर्मनिरपेक्ष बनाया साथ ही पुरातन व्यवस्था के अंधविश्वासों को खत्म किया यूरोप साहित्य में स्वच्छंदतावाद ई आंदोलन भी क्रांति का ही परिणाम था।
लार्ड एल्टन के अनुसार “सामाजिक समानता और व्यवसाय क्रांति के उद्देश्य थे जो प्राप्त कर लिए गए। सैनिक गौरव तथा भूमिका कृषकों को हस्ताक्षर क्रांति की अन्य उपलब्धियां थी। आधुनिक फ्रांस की राष्ट्रीय शिक्षा पद्धति की नवीन भी क्रांति रखी।”