राज्यपाल

राज्यपाल, राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है जिसका उल्लेख अनुसूची 153-162 तथा भाग 6 में किया गया है। वह कार्य मंत्रिपरिषद की सलाह से करता है परंतु उसकी संवैधानिक स्थिति मंत्रिपरिषद की अपेक्षा बहुत सुरक्षित है। वह राष्ट्रपति के समान असहाय नहीं होता है। राष्ट्रपति के पास मात्र विवेकाधीन शक्ति ही होती है जिसके अलावा वह सदैव प्रभाव का ही प्रयोग करता है किंतु संविधान राज्यपाल को प्रभाव तथा शक्ति दोनों देता है। उसका पद जितना शोभात्मक है, उतना ही कार्यात्मक भी है।

  • अनुच्छेद 166 के अंर्तगत यदि कोई सवाल उठता है कि राज्यपाल की शक्ति विवेकाधीन है या नहीं तो उसी का निर्णय आखिरी निर्णय माना जाता है।
  • अनुच्छेद 166 राज्यपाल इन शक्तियों का प्रयोग उन नियमों के निर्माण करने के लिए कर सकता है जिनसे राज्यकार्यों को सुगमता पूर्वक संचालन हो साथ ही वह मंत्रियों में कार्य बांटने का कार्य भी कर सकता है।
  • अनुच्छेद 200 के अधीन राज्यपाल अपनी विवेक शक्ति का प्रयोग राज्य विधायिका द्वारा जारी बिल को राष्ट्रपति की अनुमति हेतु सुरक्षित कर सकता है।
  • अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राज्यपाल राष्ट्रपति को राज्य के प्रशासन को अधिग्रहित करने के लिए निमंत्रण दे सकता है यदि यह संविधान के प्रावधानों के अनुरूप नहीं चल सकता हो।

राज्यपाल की योग्यता (अनुच्छेद 157) –

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • आयु 35 वर्ष से कम न हो।
  • समान समय में किसी अन्य कार्यालय में पदासीन नहीं हो।
  • वह संघ के विधानमंडल या किसी अन्य राज्य का सदस्य नहीं होना चाहिए। विधानमंडल के सदस्यों में से किसी एक को राज्यपाल बनाने पर कोई रोक नहीं है, बशर्ते नियुक्ति के बाद, वह तुरंत ही विधानमंडल के सदस्य नहीं रह जाता है।

राज्यपाल की चुनावी प्रक्रिया

राज्यपाल का चुनाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष मतदान (मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति की तरह) की प्रक्रिया से नहीं किया जाता है। राज्यपाल को भारत के राष्ट्रपति द्वारा किसी विशेष राज्य के राज्यपाल के रूप में पांच साल की अवधि के लिए नियुक्त किया जाता है। राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाने के लिए राज्यपाल को सभी योग्यता मानदंडों को पूरा करना आवश्यक है।

राज्यपाल की पदावधि (अनुच्छेद 156):

  • राज्यपाल, राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त पद धारण करेगा ।
  • राज्यपाल, राष्ट्रपति को सम्बोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद का त्याग कर सकता है।
  • इस अनुच्छेद के पूर्वगामी उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्यपाल अपने पद को ग्रहण की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा। परन्तु राज्यपाल, अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने पर भी, तब तक पद पर रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है ।

राज्यपाल की शक्तियां

कार्यकारी शक्तियां

  • राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति में राज्यपाल राष्ट्रपति से परामर्श लेता है।
  • राज्यपाल जिला न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है।
  • राज्यपाल राज्य के मुख्यमंत्री, महाधिवक्ता (ऐडवोकेट जनरल) और राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों सहित मंत्रिपरिषद की नियुक्ति कर सकता है। हालांकि, राज्यपाल राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्यों को हटा नहीं सकता क्योंकि उन्हें केवल राष्ट्रपति के आदेश के द्वारा हटाया जा सकता है।
  • यदि राज्यपाल को लगता है कि विधानसभा में आंग्ल भारतीय समुदाय का पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नहीं हो रहा है, तो वह आंग्ल भारतीय समुदाय के एक सदस्य को राज्य की विधानसभा में नामित कर सकता है।
  • उन सभी राज्यों में जहाँ एक द्विसदनीय विधायिका मौजूद है, वहाँ राज्यपाल को विधान परिषद के लिए सदस्यों को नामित करने का अधिकार है, जो “साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारी आंदोलन और सामाजिक सेवा जैसे मामलों में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखते हैं”

न्यायिक शक्तियां

  • राज्यपाल किसी दोषी व्यक्ति के दण्ड को क्षमा कर सकता है, उसके दंड को रोक सकता है, दंड को टाल सकता है या दंड से निलंबित कर सकता है। राज्यपाल कानून के खिलाफ अपराध किए गए किसी भी दोषी व्यक्ति की सजा को रोकने, कम करने या बदलने की शक्ति भी रखता है।
  • राज्यपाल विशेष राज्य के उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में राष्ट्रपति से परामर्श करता है।

विधायी शक्तियां

  • जैसा कि गवर्नर को राज्य विधानमंडल का हिस्सा माना जाता है, इसलिए राज्यपाल को संसद के संबंध में राष्ट्रपति के समान ही, राज्य विधानमंडल को संदेश भेजने, बैठक बुलाने, हटाने और भंग करने आदि का अधिकार भी होता है। हालांकि ये औपचारिक शक्तियां होती हैं, वास्तव में, राज्यपाल को ऐसे निर्णय लेने से पहले मुख्यमंत्री और उनकी मंत्रिपरिषद द्वारा निर्देशित किया जाना चाहिए।
  • राज्यपाल राज्य विधायिका और सत्तारूढ़ सरकार की नई प्रशासनिक नीतियों को विधानसभा को रेखांकित करके, प्रत्येक वर्ष के पहले सत्र का संबोधित करता है।
  • राज्यपाल राज्य वार्षिक वित्तीय विवरण और ‘मनी बिल‘ की अनुदान और अनुशंसा की मांग भी विधानमंडल के समक्ष रखता है।
  • राज्यपाल राज्य वित्त आयोग का गठन करता है। किसी भी अप्रत्याशित परिस्थितियों के मामले में राज्य के आकस्मिक निधि को बढ़ने की शक्ति राज्यपाल के पास होती है।
  • केवल राज्यपाल से मंजूरी मिलने के बाद ही विधानसभा द्वारा पारित सभी बिल एक कानून बन जाते हैं। यदि यह धन बिल नहीं है, तो राज्यपाल को इसे पुनर्विचार के लिए विधानसभा में वापस भेजने का अधिकार है। लेकिन यदि विधानसभा दूसरी बार राज्यपाल को बिल भेजती है, तो उस पर राज्यपाल को हस्ताक्षर करने ही पड़ते है।

आपातकालीन शक्तियां

  • यदि राज्य की विधानसभा में कोई राजनीतिक दल बहुमत नहीं देता है, तो राज्यपाल को मुख्यमंत्री का चयन करने के लिए अपने विवेकाधिकार का उपयोग करने की शक्ति प्राप्त होती है।
  • राज्यपाल राष्ट्रपति की तरफ से एक विशेष आपात काल की स्थिति की आधिकारिक रिपोर्ट में राष्ट्रपति को सूचित करता है और राष्ट्रपति की तरफ से राष्ट्रपति शासन लगाता है। राज्यपाल ऐसी परिस्थितियों में, मंत्रिपरिषद की सलाह या कार्यों को अधिभूत करता है और राज्य के कार्यकलापों पर खुद निर्देश देता है।