लोकोक्तियाँ भाग -2

ओखली में सिर दिया, तो मूसलों से क्या डर -> काम करने पर उतारू होना
आ बैल मुझे मार -> स्वयं मुसीबत मोल लेना)
आँखों के अन्धे नाम नयनसुख -> गुण के विरुद्ध नाम होना
आँख का अन्धा नाम नयनसुख -> गुण के विरुद्ध नाम होना।
आँख के अन्धे गाँठ के पूरे -> मूर्ख किन्तु धनवान
आग लगन्ते झोपड़ा, जो निकले सो लाभ -> नुकसान होते-होते जो कुछ बच जाय, वही बहुत है।
आगे नाथ न पीछे पगहा -> किसी तरह की जिम्मेवारी का न होना
आम के आम गुठलियों के दाम -> अधिक लाभ
आगे कुआँ, पीछे खाई -> दोनों तरफ विपत्ति या परेशानी होना
आई मौज फकीर को, दिया झोंपड़ा फूँक -> वैरागी स्वभाव के पुरुष मनमौजी होते हैं।
आज हमारी, कल तुम्हारी -> जीवन में विपत्ति सब पर आती है।
आधी छोड़ सारी को धावे, आधी रहे न सारी पावे -> अधिक लालच करना बुरा होता है
आप काज, महा काज -> अपना काम स्वयं करने से ठीक होता है।
आये थे हरि-भजन को, ओटन लगे कपास -> आवश्यक कार्य को छोड़कर अनावश्यक कार्य में लग जाना
आप भला तो जग भला -> दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार किया जाए तो दूसरे भी अच्छा व्यवहार करेंगे
आसमान से गिरे खजूर में अटके -> एक मुसीबत खत्म न हो उससे पहले दूसरी मुसीबत आ जाए
आप डूबे जग डूबा -> जो स्वयं बुरा होता है, दूसरों को भी बुरा समझता है।
आग लगाकर जमालो दूर खड़ी -> झगड़ा लगाकर अलग हो जाना
आधा तीतर आधा बटेर -> बेमेल स्थिति
ओछे की प्रीत बालू की भीत -> नीचों का प्रेम क्षणिक
ओस चाटने से प्यास नहीं बूझती -> अधिक कंजूसी से काम नहीं चलता

इतनी-सी जान, गज भर की जुबान -> बहुत बढ़-बढ़ कर बातें करना
इधर कुआँ और उधर खाई -> हर तरफ विपत्ति होना
इन तिलों में तेल नहीं निकलता -> कंजूसों से कुछ प्राप्त नहीं हो सकता।
ईश्वर की माया कहीं धूप कहीं छाया -> ईश्वर की बातें विचित्र हैं।
ईंट की लेनी, पत्थर की देनी -> बदला चुकाना
ईश्वर की माया, कहीं धूप कहीं छाया -> संसार में सभी एक जैसे नहीं हैं- कोई अमीर है, कोई गरीब
इस हाथ दे, उस हाथ ले -> लेने का देना
उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे -> अपराधी निरपराध को डाँटेे
उतर गई लोई तो क्या करेगा कोई -> इज्जत जाने पर डर किसका?
उल्टे बांस बरेली को -> जहाँ जिस वस्तु की आवश्यकता न हो, उसे वहां ले जाना
उसी का जूता उसी का सिर -> किसी को उसी की युक्ति या चाल से बेवकूफ बनाना
उद्योगिन्न पुरुषसिंहनुपैति लक्ष्मी -> उद्योगी को ही धन मिलता है।
ऊँची दुकान फीके पकवान -> जिसका नाम अधिक हो, पर गुण कम हो
ऊँट के मुँह में जीरा -> जरूरत के अनुसार चीज न होना
ऊधो का लेना न माधो का देना -> केवल अपने काम से काम रखना
ऊपर-ऊपर बाबाजी, भीतर दगाबाजी -> बाहर से अच्छा, भीतर से बुरा
ऊँचे चढ़ के देखा, तो घर-घर एकै लेखा -> सभी एक समान
ऊँट किस करवट बैठता है -> किसकी जीत होती है।
ऊँट बहे और गदहा पूछे कितना पानी -> जहाँ बड़ों का ठिकाना नहीं, वहाँ छोटों का क्या कहना
एक पन्थ दो काज -> एक काम से दूसरा काम हो जाना
एक हाथ से ताली नहीं बजती -> झगड़ा एक ओर से नहीं होता।
एक तो करेला दूजे नीम चढ़ा -> कुटिल स्वभाव वाले मनुष्य बुरी संगत में पड़ कर और बिगड़ जाते है।
एक तो चोरी, दूसरे सीनाज़ोरी -> गलत काम करके आँख दिखाना
एक अनार सौ बीमार -> जिस चीज के बहुत चाहने वाले हों
एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है -> एक खराब चीज सारी चीजों को खराब कर देती है।
एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं -> एक वस्तु के दो समान अधिकारी नहीं हो सकते
एक अकेला, दो ग्यारह -> संगठन में शक्ति होती है
एक तंदुरुस्ती, हजार नियामत -> स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है
एकै साधे सब सधे, सब साधे सब जाय -> किसी कार्य को संपन्न कराने के लिए किसी एक समर्थ व्यक्ति का सहारा लेना अच्छा है बजाए अनेक लोगों के पीछे भागने के
एक ही थैली के चट्टे-बट्टे -> एक ही प्रवृत्ति के लोग
ऐरा-गैरा नत्थू खैरा -> मामूली आदमी
ऐरे गैरे पंच कल्याण -> ऐसे लोग जिनके कहीं कोई इज्जत न हो
‘ऐसो को प्रकट्यो जगमाँही, प्रभुता पाय जाहि मदनाहीं’ -> जिसके पास धन-संपत्ति होती है, वह अहंकारी होता है
ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डर -> कष्ट सहने के लिए तैयार व्यक्ति को कष्ट का डर नहीं रहता।
ओस चाटने से प्यास नहीं बुझती -> किसी को इतनी कम चीज मिलना कि उससे उसकी तृप्ति न हो।
ओछे की प्रीति, बालू की भीति -> दुष्ट का प्रेम अस्थिर होता है
कहाँ राजा भोज कहाँ गाँगू तेली -> उच्च और साधारण की तुलना कैसी
कंगाली में आटा गीला -> परेशानी पर परेशानी आना
कोयले की दलाली में मुँह काला -> बुरों के साथ बुराई ही मिलती है
कहीं की ईट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा -> बेमेल वस्तुओं को एक जगह एकत्र करना
काला अक्षर भैंस बराबर -> बिल्कुल अनपढ़ व्यक्ति
कभी घी घना, कभी मुट्ठी चना -> जो मिल जाए उसी में संतुष्ट रहना
करे कोई, भरे कोई -> अपराध कोई करे, दण्ड किसी और को मिले
कागा चले हंस की चाल -> गुणहीन व्यक्ति का गुणवान व्यक्ति की भांति व्यवहार करना
काम को काम सिखाता है -> कोई भी काम करने से ही आता है।
कुत्ता भी अपनी गली में शेर होता है -> अपने घर में निर्बल भी बलवान या बहादुर होता है।
कुत्तों के भौंकने से हाथी नहीं डरते -> विद्वान लोग मूर्खों और ओछों की बातों की परवाह नहीं करते
कै हंसा मोती चुगे, कै लंघन मर जाय -> प्रतिष्ठित और विद्वान व्यक्ति अपने अनुकूल प्रतिष्ठा के साथ ही जाना ठीक समझता है।
कोयले की दलाली में हाथ काले -> बुरी संगत का बुरा असर
कबहुँ निरामिष होय न कागा -> दुष्ट अपनी दुष्टता नहीं छोड़ता
काठ की हाँड़ी बार-बार नहीं चढ़ती -> चालाकी से एक ही बार काम निकलता है
का वर्षा जब कृषि सुखाने -> समय निकल जाने पर मदद करना व्यर्थ है
कहे से धोबी गधे पर नहीं चढ़ता -> मूर्ख पर समझाने का असर नहीं होता
काम का न काज का, दुश्मन अनाज का -> किसी मतलब का न होना
कौड़ी न हो पास तो मेला लगे उदास -> धन के अभाव में जीवन में कोई आकर्षण नहीं
कबीरदास की उलटी बानी, बरसे कंबल भींगे पानी -> प्रकृतीविरुद्ध काम
कहे खेत की, सुने खलिहान की -> हुक्म कुछ और करना कुछ और
काबुल में क्या गदहे नहीं होते -> अच्छे बुरे सभी जगह हैं।
किसी का घर जले, कोई तापे -> दूसरे का दुःख में देखकर अपने को सुखी मानना
खोदा पहाड़ निकली चुहिया -> बहुत कठिन परिश्रम का थोड़ा लाभ
खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे -> किसी बात पर लज्जित होकर क्रोध करना
खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग पकड़ता है -> एक को देखकर दूसरा बालक या व्यक्ति भी बिगड़ जाता है।
खरी मजूरी चोखा काम -> मजदूरी के तुरन्त बाद नकद पैसे मिलना
खाली दिमाग शैतान का घर -> बेकार बैठने से तरह-तरह की खुराफातें सूझती हैं।
खुदा गंजे को नाख़ून न दे -> नाकाबिल को कोई अधिकार नहीं मिलना चाहिए
खुशामद से ही आमद होती है -> बड़े आदमियों (धनी या बड़े पद वालों) की खुशामद करने से धन, यश और पद प्राप्त होता है।
खूब मिलाई जोड़ी, एक अंधा एक कोढ़ी -> एक ही प्रकार के दो मनुष्यों का साथ
खरा खेल फर्रुखावादी -> स्पष्टवक्ता सदा सुखी होता है
खग जाने खग ही की भाषा -> साथी की बात साथी समझ लेता है
खून सिर चढ़कर बोलता हैै -> पाप स्वतः सामने आ जाता है
खेत खाये गदहा, मार खाये जोलहा -> अपराध करे कोई, दण्ड मिले किसी और को
गागर में सागर भरना -> कम शब्दों में बहुत कुछ कहना
गया वक्त फिर हाथ नहीं आता -> जो समय बीत जाता है, वह वापस नहीं आता
गरज पड़ने पर गधे को भी बाप कहना पड़ता है -> मुसीबत में हमें छोटे-छोटे लोगों की भी खुशामद करनी पड़ती है।
गरजने वाले बादल बरसते नहीं हैं -> जो बहुत बढ़-बढ़ कर बातें करते हैं, वे काम कम करते हैं।
गवाह चुस्त, मुद्दई सुस्त -> जिसका काम हो वह परवाह न करे, बल्कि दूसरा आदमी तत्परता दिखाए
गीदड़ की शामत आए तो वह शहर की तरफ भागता है -> जब विपत्ति आती है तब मनुष्य की बुद्धि विपरीत हो जाती है।
गुरु गुड़ ही रहा, चेला शक़्कर हो गया -> शिष्य का गुरु से अधिक उन्नति करना
गेहूँ के साथ घुन भी पिसता है -> अपराधियों के साथ निर्दोष व्यक्ति भी दण्ड पाते हैं।
गुड़ खाए गुलगुलों से परहेज -> कोई बड़ी बुराई करना और छोटी से बचना
गंगा गए तो गंगादास, जमुना गए तो जमनादास -> सिद्धांतहीन मनुष्य, अवसरवादी
गरीब की जोरू, सबकी भाभी -> कमजोर पर सब अधिकार जताते हैं
गुड़ न दे तो गुड़ की सी बात तो कहे -> भले ही किसी को कुछ न दें पर मधुर व्यवहार करें
गाँव का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध -> बाहर के व्यक्तियों का सम्मान, पर अपने यहाँ के व्यक्तियों की कद्र नहीं
गोद में छोरा नगर में ढिंढोरा -> पास की वस्तु का दूर जाकर ढूँढना
गाछे कटहल, ओठे तेल -> काम होने के पहले ही फल पाने की इच्छा
गुड़ गुड़, चेला चीनी -> गुरु से शिष्य का ज्यादा काबिल हो जाना
घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध -> जो मनुष्य बहुत निकटस्थ या परिचित होता है उसकी योग्यता को न देखकर बाहर वाले की योग्यता देखना
घर की मुर्गी दाल बराबर -> घर की वस्तु या व्यक्ति को कोई महत्व न देना
घर में नहीं दाने, बुढ़िया चली भुनाने -> झूठा दिखावा करना
घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या -> मेहनताना या पारिश्रमिक माँगने में संकोच नहीं करना चाहिए।
घर का भेदी लंका ढाए -> आपस की फूट से हानि होती है।
घड़ी में घर जले, नौ घड़ी भद्रा -> हानि के समय सुअवसर-कुअवसर पर ध्यान न देना
घर पर फूस नहीं, नाम धनपत -> गुण कुछ नहीं, पर गुणी कहलाना
घर में दिया जलाकर मसजिद में जलाना -> दूसरे को सुधारने के पहले अपने को सुधारना
घी का लड्डू टेढ़ा भला -> लाभदायक वस्तु किसी तरह की क्यों न हो।
चिराग तले अँधेरा -> अपनी बुराई नहीं दीखती
चार दिन की चाँदनी फिर अँधेरी रात -> सुख के कुछ दिनों के बाद दुख का आना
चोर की दाढ़ी में तिनका -> अपने आप से डरना
चोर पर मोर -> एक दूसरे से ज्यादा धूर्त
चमड़ी जाय, पर दमड़ी न जाय -> अत्यधिक कंजूसी करना
चिकने घड़े पर पानी नहीं ठरहता -> बेशर्म आदमी पर किसी बात का कोई असर नहीं होता
चित भी मेरी, पट भी मेरी, अंटा मेरे बाप का -> हर तरह से लाभ चाहना
चील के घोंसले में मांस कहाँ -> किसी व्यक्ति से ऐसी वस्तु की प्राप्त करने की आशा करना, जो उसके पास न हो।
चोर के पैर नहीं होते -> चोर चोरी करते वक्त जरा-सी आहट से डरकर भाग जाता है।
चोर-चोर मौसेरे भाई -> एक व्यवसाय या स्वभाव वालों में जल्दी मेल हो जाता है।
चोरी चोरी से जाय, पर हेरा-फेरी से न जाय -> किसी की प्रकृति में पूर्ण परिवर्तन न होना
चोरी और सीना जोरी -> अपराध करके अकड़ना
चलती का नाम गाड़ी -> हस्ती समाप्त होने के बाद भी धाक जमी रहना
चाँद पर थूका, मुँह पर गिरा -> सज्जन की बुराई करने से अपनी ही बेइज्जती होती है
चूहे घर में दण्ड पेलते हैं -> आभाव-ही-आभाव
छछूंदर के सिर में चमेली का तेल -> किसी व्यक्ति के पास ऐसी वस्तु हो जो कि उसके योग्य न हो।
छोटा बड़ा खोटा -> नाटा आदमी बड़ा तेज-तर्रार होता है।
छोटा मुँह बड़ी बात -> कम उम्र या अनुभव वाले मनुष्य का लम्बी-चौड़ी बातें करना
छोटे मियां तो छोटे मियां, बड़े मियां सुभान अल्लाह -> जब बड़ा छोटे से अधिक शैतान हो
जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ -> परिश्रम का फल अवश्य मिलता है
जैसी करनी वैसी भरनी -> कर्म के अनुसार फल मिलता है
जिसकी लाठी उसकी भैंस -> बलवान की ही जीत होती है
जंगल में मोर नाचा, किसने देखा -> ऐसे स्थान में कोई अपना गुण दिखाए जहाँ कोई देखने वाला न हो।
जब ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डरना -> जब कोई कष्ट सहने के लिए तैयार हो तो डर कैसा
जब चने थे तब दांत न थे, जब दांत हुए तब चने नहीं -> जब धन था तब बच्चे न थे, जब बच्चे हुए तब धन नहीं है।
जब तक जीना, तब तक सीना -> जब तक मनुष्य जीवित है तब तक उसे कुछ न कुछ काम तो करना ही पड़ता है।
जब तक सांस तब तक आस -> जब तक मनुष्य जीवित है तब तक आशा बनी रहती है।
जर, जोरू, जमीन जोर की, नहीं तो और की -> धन, स्त्री और जमीन बलवान अपने बल से प्राप्त कर सकता है, निर्बल व्यक्ति नहीं
जल्दी का काम शैतान का, देर का काम रहमान का -> जल्दी करने से काम बिगड़ जाता है और शांति से काम ठीक होता है।
जहाँ का पीवे पानी, वहाँ की बोले बानी -> जिस व्यक्ति का खाए, उसी की-सी बातें करनी चाहिए
जहाँ चाह, वहाँ राह -> जब किसी काम को करने की व्यक्ति की इच्छा होती है तो उसे उसका साधन भी मिल ही जाता है।
जहाँ जाए भूखा, वहाँ पड़े सूखा -> अभागे मनुष्य को हर जगह दुःख ही दुःख मिलता है।
जाका कोड़ा, ताका घोड़ा -> जिसके पास शक्ति होती है, उसी की जीत होती है।
जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई -> जिस मनुष्य पर कभी दुःख न पड़ा हो, वह दूसरों का दुःख क्या समझे
जागेगा सो पावेगा, सोवेगा सो खोवेगा -> जो हर क्षण सावधान रहता है, उसे ही लाभ होता है।
जान न पहचान, बड़ी बुआ सलाम -> बिना जान-पहचान के किसी से भी संबंध जोड़कर बातचीत करना
जान मारे बनिया, पहचान मारे चोर -> बनिया परिचित व्यक्ति को ठगता है और चोर भेद मिलने से चोरी करता है।
जान है तो जहान है -> संसार में जान सबसे प्यारी वस्तु है।
जितना गुड़ डालोगे, उतना ही मीठा होगा -> जितना अधिक रुपया खर्च करेंगे, उतनी ही अच्छी वस्तु मिलेगी
जितनी चादर हो, उतने ही पैर फैलाओ -> आदमी को अपनी सामर्थ्य और शक्ति के अनुसार ही कोई काम करना चाहिए
जिस थाली में खाना, उसी में छेद करना -> जिस व्यक्ति के आश्रय में रहना, उसी को हानि पहुँचाना
जिसका काम उसी को छाजै, और करे तो डंडा बाजै -> जिसको जिस काम का अभ्यास और अनुभव होता है, वह उसे सरलता से कर लेता है। गैर-अनुभवी आदमी उसे नहीं कर सकता
जिसकी जूती, उसी का सिर -> किसी व्यक्ति की चीज से उसी को हानि पहुँचाना
जिसकी बिल्ली, उसी से म्याऊँ -> जब किसी के द्वारा पाला-पोसा हुआ व्यक्ति उसी को आँखें दिखाए
जैसा दाम, वैसा काम -> जितनी अच्छी मजदूरी दी जाएगी, उतना ही अच्छा काम होगा
जैसा देश, वैसा वेश -> जहाँ रहना हो वहीं की रीतियों-नीतियों के अनुसार आचरण करना चाहिए
जो करेगा, सो भरेगा -> जो जैसा काम करेगा वैसा फल पाएगा
जो गरजते हैं, वो बरसते नहीं -> जो लोग बहुत शेखी बघारते हैं, वे बहुत अधिक काम नहीं करते
जल में रहकर मगरमच्छ से बैर -> जिसके सहारे रहे, उसी से दुश्मनी करना
जाको राखै साइयाँ, मारि सकै ना कोय -> जिसका रक्षक ईश्वर है उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता
जो किसी को कुआँ खोदता है, उसको खाई तैयार रहती है -> जैसे को तैसा
जान बची तो लाखों पाये -> जान बचने से बड़ा कोई लाभ नहीं है।
झट मंगनी पट ब्याह -> किसी काम का जल्दी से हो जाना
झूठे का मुँह काला, सच्चे का बोलबाला -> अंत में सच्चे आदमी की ही जीत होती है।
झोपड़ी में रह के महलों के सपने देखे -> अपनी सीमा से अधिक पाने की इच्छा करना
टके की हांडी गई, कुत्ते की जात पहचानी गई -> थोड़े ही खर्च में किसी के चरित्र को जान लेना
टुकड़े दे दे बछड़ा पाला, सींग लगे तब मारन चाला -> कृतघ्न व्यक्ति
ठंडा लोहा गरम लोहे को काटता है -> शांत प्रकृति वाला मनुष्य क्रोधी मनुष्य को हरा देता है।
ठेस लगे, बुद्धि बढ़े -> हानि मनुष्य को बुद्धिमान बनाती है।
ठठेरे-ठठेरे बदलौअल -> चालाक को चालक से काम पड़ना
डरा सो मरा -> डरने वाला व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता
डूबते को तिनके का सहारा -> विपत्ति में पड़े हुए मनुष्य को थोड़ा सहारा भी काफी होता है।
डेढ़ पाव आटा पुल पर रसोई -> थोड़ी पूँजी पर झूठा दिखावा करना
ढाक के वही तीन पात -> परिणाम कुछ नहीं निकलना, बात वहीं की वहीं रहना
तुम डाल-डाल तो मैं पात-पात -> किसी की चालों को खूब समझना
तेल तिलों से ही निकलता है -> यदि कोई आदमी किसी मामले में कुछ खर्च करता है तो वह फायदा उस मामले से ही निकाल लेता है।
तेल देखो, तेल की धार देखो -> किसी कार्य का परिणाम देखने की बात करना
तेली का तेल जले, मशालची का दिल जले -> जब एक व्यक्ति कुछ खर्च कर रहा हो और दूसरा उसे देख कर ईर्ष्या करे
ताली एक हाथ से नहीं बजाई जाती -> प्रेम या लड़ाई एकतरफा नहीं होती
तीन में न तेरह में -> जिसकी पूछ न हो
तबेले की बला बंदर के सिर -> दोष किसी का, सजा किसी और को
तुरत दान महाकल्यान -> समय रहते किया गया कार्य उपयोगी साबित होता है
तेते पाँव पसारिए, जैती लाँबी सौर -> आय के अनुसार ही व्यय करना चाहिए
ताड़ से गिरा तो खजूर पर अटका -> एक खतरे में से निकलकर दूसरे खतरे में पड़ना
तीन कनौजिया, तेरह चूल्हा -> जितने आदमी उतने विचार
तन पर नहीं लत्ता पान खाय अलबत्ता -> शेखी बघारना
तीन लोक से मथुरा न्यारी -> निराला ढंग
थोथा चना, बाजे घना -> वह व्यक्ति जो गुण और विद्या कम होने पर भी आडम्बर करे
थका ऊँट सराय तके -> दिनभर काम करने के बाद मजदूर को घर जाने की सूझती है।
थूक कर चाटना ठीक नहीं -> देकर लेना ठीक नहीं, वचन-भंग करना, अनुचित।
दाल-भात में मूसलचन्द -> दो व्यक्तियों के काम की बातों में तीसरे आदमी का हस्तक्षेप करना
दीवारों के भी कान होते हैं -> गुप्त परामर्श एकांत में धीरे बोलकर करना चाहिए
दुधारू गाय की लात भी सहनी पड़ती है -> जिस व्यक्ति से लाभ होता है, उसकी कड़वी बातें भी सुननी पड़ती हैं।
दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँक कर पीता है -> एक बार धोखा खाने के बाद बहुत सोच-विचार कर काम करना
दूध का दूध और पानी का पानी -> सच्चा न्याय
दूधो नहाओ, पूतो फलो -> आशीर्वाद देना
दूर के ढोल सुहावने लगते हैं -> दूर के व्यक्ति अथवा वस्तुएँ अच्छी मालूम पड़ती हैं।
देर आयद, दुरुस्त आयद -> कोई काम देर से हो, परन्तु ठीक हो
दोनों हाथों में लड्डू होना -> दोनों तरफ लाभ होना
दो मुल्लों में मुर्गी हराम -> एक चीज को दो या अधिक आदमी प्रयोग करें तो उसकी खींचातानी होती है।
दादा बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया -> रुपैया-पैसा ही सब कुछ है
दुविधा में दोऊ गए, माया मिली न राम -> अनिश्चय की स्थिति में काम करने पर एक में भी सफलता नहीं मिलती
देखे ऊँट किस करवट बैठता है? -> देखें क्या फैसला होता है?
दमड़ी की हाँड़ी गयी, कुत्ते की जात पहचानी गयी -> मामूली वस्तु में दूसरे की पहचान।
दमड़ी की बुलबुल, नौ टका दलाली -> काम साधारण, खर्च अधिक
दूध का जला मट्ठा भी फूंक-फूंक कर पीता है -> एक बार धोखा खा जाने पर सावधान हो जाना
देशी मुर्गी, विलायती बोल -> बेमेल काम करना
धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का -> जिसके रहने का कोई पक्का ठिकाना न हो
धोबी से पार न पावे, गधे के कान उमेठे -> बलवान पर वश न चले तो निर्धन पर गुस्सा निकालना
नाच न जाने आँगन टेढ़ -> काम न जानना और बहाना बनाना
न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी -> झगड़े की जड़ को नष्ट कर देना
न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी -> असंभव शर्ते रखना
नौ नगद, न तेरह उधार -> उधार की अपेक्षा नगद चीजें बेचना अच्छा होता है।
न आगे नाथ न पीछे पगहा -> जिसका कोई सगा-सम्बन्धी न हो


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