लोकोक्तियाँ भाग -3

न आव देखा न ताव -> बिना सोचे-समझे काम करना
न ईंट डालो, न छींटे पड़ें -> यदि तुम किसी को छेड़ोगे, तो तुम्हें दुर्वचन अवश्य सुनने पड़ेंगे
न ऊधो का लेना, न माधो का देना -> किसी से कोई सम्बन्ध न रखना
न घर का रहना न घाट का -> बिल्कुल असहाय होना
न तीन में न तेरह में -> जिसकी कोई गिनती न हो
न नामलेवा न पानी देवा -> जिसका संसार में कोई न हो
नंगा क्या पहनेगा, क्या निचोड़ेगा -> एक दरिद्र किसी को क्या दे सकता है।
नया नौ दिन पुराना सौ दिन -> नई चीजों की अपेक्षा पुरानी चीजों का अधिक महत्व होता है।
नादान की दोस्ती जी का जंजाल -> मूर्ख की मित्रता बड़ी नुकसानदायक होती है।
नाम बड़ा और दर्शन छोटे -> नाम बहुत हो परन्तु गुण कम या बिल्कुल नहीं हों
नेकी और पूछ-पूछ -> भलाई करने में संकोच कैसा
नेकी कर, दरिया में डाल -> उपकार करते समय बदले की भावना नहीं रखनी चाहिए
नौ दिन चले अढ़ाई कोस -> बहुत सुस्ती से काम करना
नौ सौ चूहे खाके बिल्ली हज को चली -> पूरी जिंदगी पाप करके अंत में धर्मात्मा बनना
नंग बड़े परमेश्वर से -> ईश्वर की बजाए, निर्लज्ज से डर कर रहना चाहिए
न लेना एक न देना दो -> कोई संबंध न रखना
नानी के आगे ननिहाल की बातें -> अपने से अधिक जानकारी रखने वाले के सामने जानकारी की शेखी बघारना
नित्य कुआँ खोदना, नित्य पानी पीना -> प्रतिदिन काम करके पेट भरना
निन्यानवे के फेर में पड़ना -> धनसंग्रह की धुन समाना
नक्कारखाने में तूती की आवाज -> सुनवाई न होना
न देने के नौ बहाने -> न देने के बहुत-से बहाने
नदी में रहकर मगर से वैर -> जिसके अधिकार में रहना, उसी से वैर करना
नौ की लकड़ी, नब्बे खर्च -> काम साधारण, खर्च अधिक
नीम हकीम खतरे जान -> अयोग्य से हानि
नाच कूदे तोड़े तान, ताको दुनिया राखे मान -> आडम्बर दिखानेवाला मान पाता है।
पढ़े फारसी बेचे तेल, यह देखो किस्मत (या कुदरत) का खेल -> पढ़े-लिखे लोग भी दुर्भाग्य के कारण दुःख उठाते हैं।
पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होतीं -> सब मनुष्य एक जैसे नहीं होते
पल में तोला, पल में माशा -> अत्यन्त परिवर्तनशील स्वभाव होना
पाँचों उंगलियाँ घी में होना -> हर तरफ से लाभ होना
पूत के पाँव पालने में पहचाने जाते हैं -> बच्चे की प्रतिभा बचपन में ज्ञात हो जाती है।
प्यासा कुएँ के पास जाता है, कुआँ प्यासे के पास नहीं आता -> जिसे गर्ज होती है, वही दूसरों के पास जाता है।
पेट में आँत, न मुँह में दाँत -> बहुत वृद्ध व्यक्ति
परहित सरिस धरम नहिं भाई -> परोपकार से बढ़कर और कोई धर्म नहीं
पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं -> परतंत्रता में कभी सुख नहीं
पहले पेट पूजा, बाद में काम दूजा -> भोजन किए बिना काम में मन न लगना
पर उपदेश कुशल बहुतेरे -> दूसरों को उपदेश देने में सब चतुर होते हैं
पारस को छूने से पत्थर भी सोना हो जाता है -> सत्संगति से बुरे भी अच्छे हो जाते हैं
पिष्टपेषण करना -> एक ही बात को बार-बार दोहराना
पीर, बाबरची, भिश्ती खर -> जब किसी व्यक्ति को छोटे-बड़े सब काम करने पड़ें
पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं -> अच्छे गुणों के लक्षण बचपन में ही पता चल जाते हैं
पैसा गाँठ का, विद्या कंठ की -> धन और विद्या अपनी पहुँच के भीतर हों तभी लाभकारी होते हैं
पहले भीतर तब देवता-पितर -> पेट-पूजा सबसे प्रधान
पूछी न आछी, मैं दुलहिन की चाची -> जबरदस्ती किसी के सर पड़ना
पराये धन पर लक्ष्मीनारायण -> दूसरे का धन पाकर अधिकार जमाना
पानी पीकर जात पूछना -> कोई काम कर चुकने के बाद उसके औचित्य पर विचार करना
पंच परमेश्वर -> पाँच पंचो की राय
फटक चन्द गिरधारी, जिनके लोटा न थारी -> अत्यन्त निर्धन व्यक्ति
फूंक दो तो उड़ जाय -> बहुत दुबला-पतला आदमी
बन्दर क्या जाने अदरक का स्वाद -> वह व्यक्ति जो किसी विशेष वस्तु या व्यक्ति की कद्र न जानता हो
बहती गंगा में हाथ धोना -> अवसर का लाभ उठाना
बिल्ली के भागों छींका टूटा -> अकस्मात् कोई काम बन जाना
बंदर के हाथ नारियल -> किसी के हाथ ऐसी मूल्यवान चीज पड़ जाए, जिसका मूल्य वह जानता न हो
बगल में छुरी, मुँह में राम -> मुँह से मीठी-मीठी बातें करना और हृदय में शत्रुता रखना
बड़े मियाँ तो बड़े मियाँ, छोटे मियाँ सुभान अल्लाह -> एक से बढ़ कर एक
बत्तीस दाँतों में जीभ -> शत्रुओं से घिरा रहना
बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपया -> रुपए-पैसे का सर्वाधिक महत्व होना
बासी बचे न कुत्ता खाय -> आवश्यकता से अधिक चीज न बनाना जिससे कि खराब न हो।
बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न भीख -> यदि भाग्य प्रतिकूल हो तो माँगने पर भीख भी नहीं मिलती
बुरे काम का बुरा अंजाम -> बुरे काम का बुरा फल
बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम -> बेमेल बात
बैठे से बेगार भली -> खाली बैठे रहने से कुछ न कुछ काम करना भला होता है।
बंदर के गले में मोतियों की माला -> किसी मूर्ख को मूलयवान वस्तु मिल जाना
बंदर की दोस्ती जी का जंजाल -> मूर्ख से मित्रता करना मुसीबत मोल लेना है
बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी -> अपराधी किसी-न-किसी दिन पकड़ा ही जाएगा
बद अच्छा, बदनाम बुरा -> बदनाम व्यक्ति बुराई न भी करें तो भी लोगों का ध्यान उसी पर जाता है
बारह वर्षों में तो घूरे के दिन भी बदलते हैं -> एक न एक दिन अच्छा समय आता ही है
बाप न मारी मेढ़की, बेटा तीरंदाज -> छोटे का बड़े से आगे निकल जाना
बाबा ले, पोता बरते -> किसी वस्तु का अधिक टिकाऊ होना
विपत्ति परे पै जानिए, को बैरी, को मीत -> संकट के समय ही मित्र और शत्रु की पहचान होती है
बिल्ली को ख्वाब में भी छींछड़े नजर आते हैं -> जरूरतमंद को स्वप्न में भी जरूरत की चीज दिखाई देती है
बिल्ली खाएगी, नहीं तो लुढ़का देगी -> दुष्ट लोग स्वयं लाभ न उठा पाएँ तो दूसरों की हानि तो कर ही देंगे
बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि ले -> पिछली बातों को भुलाकर आगे की चिन्ता करनी चाहिए
बूर के लड्डू जो खाए सो पछताए, जो न खाय वह भी पछताय -> ऐसा कार्य जिसको करने वाले तथा न करने वाले, दोनों ही पछताते हैं
बेकार से बेगार भली -> न करने से कुछ करना ही अच्छा है
बोया गेहूँ, उपजे जौ -> कार्य कुछ परिणाम कुछ और
बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ ते होय -> बुरे कर्मो से अच्छा फल नहीं मिलता
बूड़ा वंश कबीर का उपजा पूत कमाल -> श्रेष्ठ वंश में बुरे का पैदा होना
बाँझ क्या जाने प्रसव की पीड़ा -> जिसको दुःख नहीं हुआ है वह दूसरे के दुःख को समझ नहीं सकता
बैल का बैल गया नौ हाथ का पगहा भी गया -> बहुत बड़ा घाटा
भागते चोर की लंगोटी ही सही -> सारा जाता देखकर थोड़े में ही सन्तोष करना
भैंस के आगे बीन बजाना -> मूर्ख को गुण सिखाना व्यर्थ है।
भागते भूत की लँगोटी ही भली -> जहाँ कुछ न मिलने की आशंका हो, वहाँ थोड़े में ही संतोष कर लेना अच्छा होता है।
भरी मुट्ठी सवा लाख की -> भेद न खुलने पर इज्जत बनी रहती है।
भूखा सो रूखा -> निर्धन मनुष्य में मृदुता नहीं होती
भेड़ की खाल में भेड़िया -> जो देखने में भोला-भाला हो, परन्तु वास्तव में खतरनाक हो।
भगवान जब देता है तो छप्पर फाड़कर देता है -> ईश्वर की जब किसी पर कृपा होती है तो उसे चारों ओर से लाभ ही लाभ होता है
भीख माँगे और आँख दिखावे -> दयनीय होकर भी अकड़ दिखाना
भूखे भजन न होय गोपाला -> भूखा व्यक्ति धर्म-कर्म भी नहीं करता
भूख में किवाड़ पापड़ -> भूख के समय सब कुछ अच्छा लगता है
भइ गति साँप-छछूँदर केरी -> दुविधा में पड़ना
मुँह में राम बगल में छुरी -> बाहर से मित्रता पर भीतर से बैर
मान न मान मैं तेरा मेहामन -> जबरदस्ती किसी के गले पड़ना
मियाँ-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी -> जब दो व्यक्ति आपस में मिल जाएँ जो किसी अन्य के दखल देने की जरूरत नहीं होती
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत -> भारी से भारी विपत्ति पड़ने पर भी साहस नहीं छोड़ना चाहिए
मन चंगा तो कठौती में गंगा -> यदि मन शुद्ध हो तो तीर्थाटन का फल घर में ही मिल सकता है।
मरता क्या न करता -> विपत्ति में फंसा हुआ मनुष्य अनुचित काम करने को भी तैयार हो जाता है।
माया गंठ और विद्या कंठ -> गाँठ का रुपया और कंठस्थ विद्या ही काम आती है।
मारे और रोने न दे -> बलवान आदमी के आगे निर्बल का वश नहीं चलता
मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त -> जिसका काम हो, वह सुस्त हो और दूसरे उसका ख्याल रखें
मुफ़लिसी में आटा गीला -> दुःख पर और दुःख आना
मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक -> जहाँ तक किसी मनुष्य की पहुँच होती है, वह वहीं तक जाता है।
मुर्दे पर जैसे सौ मन मिट्टी वैसे सवा सौ मन मिट्टी -> बड़ी हानि हो तो उसी के साथ थोड़ी और हानि भी सह ली जाती है।
मेरी ही बिल्ली और मुझी से म्याऊँ -> जिसके आश्रय में रहे, उसी को आँख दिखाना
मेरे मन कछु और है, दाता के कछु और -> किसी की आकांक्षाएँ सदैव पूरी नहीं होती
मँगनी के बैल के दाँत नहीं देखे जाते -> माँगी हुई वस्तु में कमी नहीं देखना चाहिए
महँगा रोए एक बार, सस्ता रोए बार-बार -> महँगी वस्तु केवल खरीदते समय कष्ट देती है पर सस्ती चीज हमेशा कष्ट देती है
माँ के पेट से कोई सीख कर नहीं आता -> काम, सीखने से ही आता है
माया को माया मिले, कर-कर लंबे हाथ -> धन ही धन को खींचता है
माने तो देवता, नहीं तो पत्थर -> विश्वास में सब कुछ होता है
मार के डर से भूत भागते हैं -> मार से सब डरते हैं
मियाँ की जूती मियाँ का सिर -> जब अपनी ही चीज अपना नुकसान करे
मूल से ज्यादा ब्याज प्यारा होता है -> मनुष्य को अपने नाती-पोते अपने बेटे-बेटियों से अधिक प्रिय होते हैं
मोको और न तोको ठौर -> हम दोनों की एक-दूसरे के बिना गति नहीं
मेढक को भी जुकाम -> ओछे का इतराना
मार-मार कर हकीम बनाना -> जबरदस्ती आगे बढ़ाना
माले मुफ्त दिले बेरहम -> मुफ्त मिले पैसे को खर्च करने में ममता न होना
मोहरों की लूट, कोयले पर छाप -> मूल्यवान वस्तुओं को छोड़कर तुच्छ वस्तुओं पर ध्यान देना
यह मुँह और मसूर की दाल -> जब कोई अपनी हैसियत से अधिक पाने की इच्छा करता है तब ऐसा कहते हैं।
यहाँ परिन्दा भी पर नहीं मार सकता -> जहाँ कोई आ-जा न सके
यथा राजा, तथा प्रजाा -> जैसा स्वामी वैसा ही सेवक
रस्सी जल गयी पर ऐंठन न गयी -> बुरी हालत में पड़कर भी अभियान न त्यागना
रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी -> कारण का नाश कर देना
रात छोटी कहानी लम्बी -> समय थोड़ा है और काम बहुत है।
राम मिलाई जोड़ी, एक अंधा एक कोढी -> दो मनुष्यों के एक ही तरह का होना
राम राम जपना, पराया माल अपना -> ढोंगी मनुष्य; दूसरों का माल हड़पने वाले
रात गई, बात गई -> अवसर निकल जाना
रोज कुआँ खोदना, रोज पानी पीना -> नित्य कमाना और नित्य खाना
रोजा बख्शवाने गए थे, नमाज गले पड़ गई -> छोटे काम से जान छुड़ाने के बदले बड़ा काम गले पड़ जाना
रोटी खाइए शक़्कर से, दुनिया ठगिए मक्कर से -> आजकल फ़रेबी लोग ही मौज उड़ाते हैं
रोग का घर खाँसी, झगड़े घर हाँसी -> अधिक मजाक बुरा
लकड़ी के बल बंदरी नाचे -> शरारती से शरारती या दुष्ट लोग भी डंडे के भय से वश में आ जाते हैं।
लकीर के फकीर -> पुरानी परम्पराओं और रीति-रिवाजों का पालन करने वाला
लगा तो तीर, नहीं तो तुक्का -> काम बन जाए तो अच्छा है, नहीं बने तो कोई बात नहीं
लाख जाए, पर साख न जाए -> धन व्यय हो जाए तो कोई बात नहीं, पर सम्मान बना रहना चाहिए
लाठी टूटे न साँप मरे -> किसी की हानि हुए बिना स्वार्थ सिद्ध हो जाना
लातों के भूत बातों से नहीं मानते -> दुष्ट प्रकृति के लोग समझाने से नहीं मानते
लाल गुदड़ी में नहीं छिपता -> मेधावी लोग दीन-हीन अवस्था में भी प्रकट हो जाते हैं।
लालच बुरी बला -> लालच से बहुत हानि होती है इसलिए हमें कभी लालच नहीं करना चाहिए
लेना एक न देना दो -> किसी से कुछ मतलब न रखना
लोभी गुरु और लालची चेला, दोऊ नरक में ठेलम ठेला -> लालच बहुत बुरी चीज है
लोहे को लोहा ही काटता है -> दुष्ट का नाश दुष्ट ही करता है।
लश्कर में ऊँट बदनाम -> दोष किसी का, बदनामी किसी की
लूट में चरखा नफा -> मुफ्त में जो हाथ लगे, वही अच्छा
लेना-देना साढ़े बाईस -> सिर्फ मोल-तोल करना
वक्त पड़े बांका, तो गधे को कहै काका -> विपत्ति पड़ने पर हमें कभी-कभी छोटे लोगों की भी खुशामद करनी पड़ती है।
वह दिन गए जब खलील खां फाख्ता उड़ाते थे -> आनन्द अथवा उत्कर्ष का समय समाप्त होना
वहम की दवा तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं है -> बुद्धिमान से बुद्धिमान मनुष्य भी शक्की आदमी को ठीक नहीं कर सकता
वही ढाक के तीन पात -> जब किसी की अवस्था ज्यों की त्यों बनी रहे, उसमें कोई सुधार न हो
विनाशकाले विपरीत बुद्धि -> विपत्ति पड़ने पर बुद्धि का काम न करना
विपत्ति कभी अकेली नहीं आती -> मनुष्य के ऊपर विपत्तियाँ एक साथ आती हैं।
विष की कीड़ा विष ही में सुख मानता है -> बुरे को बुराई और पापी को पाप ही अच्छा लगता है।
शठे शाठ्यमाचरेत् -> दुष्टों के साथ दुष्टता का ही व्यवहार करना चाहिए
शर्म की बहू नित भूखी मरे -> जो खाने-पीने में शर्माता है, वह भूखा मरता है।
शक़्कर खोरे को शक़्कर और मूँजी को टक्कर -> जो जिस योग्य होता है, उसे वैसा ही मिल जाता है
शुभस्य शीघ्रम् -> शुभ काम को जल्द कर लेना चाहिए
शेर का बच्चा शेर ही होता है -> वीर व्यक्ति का पुत्र वीर ही होता है।
शेर भूखा रहता है पर घास नहीं खाता -> सज्जन लोग कष्ट पड़ने पर भी नीच कर्म नहीं करते
साँच को आँच नहीं -> जो मनुष्य सच्चा होता है, उसे डर नहीं होता
साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे -> आसानी से काम हो जाना
सीधी ऊँगली से घी नहीं निकलता -> सीधेपन से काम नहीं चलता
सौ सुनार की, एक लुहार की -> कमजोर आदमी की सौ चोट और बलवान व्यक्ति की एक चोट बराबर होती है।
सौ-सौ चूहे खाके बिल्ली हज को चली -> जीवनभर कुकर्म करके अंत में धर्म-कर्म करना
संतोषी सदा सुखी -> संतोष रखने वाला व्यक्ति सदा सुखी रहता है।
सच्चे का बोलबाला, झूठे का मुँह काला -> सच्चे आदमी को सदा यश और झूठे को अपयश मिलता है।
सत्तर (या नौ सौ) चूहे खाकर बिल्ली हज को चली -> जब कोई पूरे जीवन पाप करके पीछे पुण्य करने लगता है।
सब एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं -> एक पिता के पुत्र या मित्र आदि की राय एक-सी होना
सबसे भली चुप -> चुप रहना अच्छा होता है।
सबसे भले मूसलचंद, करें न खेती भरें न दंड -> मुफ्तखोर लोग सबसे मजे में रहते हैं, क्योंकि उन्हें किसी बात की चिन्ता नहीं रहती
सब्र का फल मीठा होता है -> सब्र करने से बहुत लाभ होता है।
सभी जो चमकता है, सोना नहीं होता -> जो ऊपर से आकर्षक और अच्छा मालूम होता है, वह हमेशा अच्छा नहीं होता
सयाना कौआ गलीज खाता है -> चालाक लोग बुरी तरह से धोखा खाते हैं।
सस्ता रोवे बार-बार, महँगा रोवे एक बार -> बार-बार सस्ती चीज की मरम्मत करानी पड़ती है, परन्तु महंगी चीज खरीदने पर ऐसा नहीं करना पड़ता
साँप का बच्चा सपोलिया -> शत्रु का पुत्र शत्रु ही होता है।
साँप निकल गया, लकीर पीटने से क्या लाभ -> यदि आदमी अवसर पर चूक जाए तो बाद में उसे पछताना पड़ता है।
सात पाँच की लाकड़ी, एक जने का बोझ -> एकता में बहुत शक्ति होती है।
सावन के अंधे को हरा-ही-हरा सूझता है -> अमीर या सुखी व्यक्ति समझता है कि सब लोग आनन्द में हैं।
सावन सूखा न भादों हरा -> सदा एक ही दशा में रहने वाला
सिर मुंड़ाते ही ओले पड़े -> किसी कार्य का श्रीगणेश करते ही उसमें विघ्न पड़ना
सुनिए सबकी, कीजिए मन की -> बातें तो सबकी सुन लेनी चाहिए, पर जो अच्छा लगे, उसी के अनुसार काम करना चाहिए।
सुबह का भूला शाम को घर आ जाए, तो उसे भूला नहीं कहते -> यदि कोई व्यक्ति शुरू में गलती करे और बाद में सुधर जाए तो उसकी गलती क्षमा योग्य होती है।
सूरा सो पूरा -> बहादुर या साहसी लोग सब कुछ कर सकते हैं।
सेर को सवा सेर -> बहुत बुद्धिमान या बलवान को उससे भी बुद्धिमान या बलवान आदमी मिल जाता है।
सैंया भए कोतवाल अब डर काहे का -> जब किसी का कोई मित्र या संबंधी उच्च पद पर हो तो उससे लाभ मिलने की संभावना होती है।
सोने पे सुहागा -> किसी वस्तु या व्यक्ति का और बेहतर होना
सोवेगा तो खोवेगा, जागेगा सो पावेगा -> जो मनुष्य आलसी होता है, उसको कुछ नहीं मिलता, और जो परिश्रमी होता है, उसे सब कुछ मिलता है।
सौ कपूतों से एक सपूत भला -> अनेक कुपुत्रों से एक सुपुत्र अच्छा होता है।
स्वर्ग से गिरा तो खजूर में अटका -> एक विपत्ति से छूटकर दूसरी विपत्ति में फंसना
समय पाय तरवर फले, केतो सींचो नीर -> समय आने पर ही सब काम पूरे होते हैं, उससे पहले नहीं
सब दिन रहत न एक समाना -> हमेशा एक-सी स्थिति नहीं रहती
सहज पके सो मीठा होय -> जो काम धीरे-धीरे होता है वह संतोषप्रद और पक्का होता है
सब धन बाईस पसेरी -> अच्छे-बुरे सबको एक समझना
सारी रामायण सुन गये, सीता किसकी जोय (जोरू) -> सारी बात सुन जाने पर साधारण सी बात का भी ज्ञान न होना
होनहार बिरवान के होत चीकने पात -> होनहार के लक्षण पहले से ही दिखायी पड़ने लगते है।
हाथी के दाँत खाने के और दिखाने के और -> कहना कुछ और करना कुछ और
हँसी में खंसी -> हँसी-दिल्लगी की बात करते-करते लड़ाई-झगड़े की नौबत आना
हज्जाम के आगे सबका सिर झुकता है -> अपने स्वार्थ के लिए सबको सिर झुकाना पड़ता है।
हड़ लगे न फिटकरी, रंग चोखा ही आवे -> बिना खर्च किए काम बन जाना
हनते को हनिए, दोष-पाप नहिं गनिए -> यदि कोई व्यक्ति ख़ाहमखाँ आपको या दूसरे को मारता है, तो उसको मारना पाप नहीं है।
हमने क्या घास खोदी है? -> जो मनुष्य स्वयं को बड़ा बुद्धिमान समझता है, वह दूसरों से ऐसा कहता है।
हर कैसे, जैसे को तैसे -> जो जैसा कर्म करता है, उसको वैसा ही फल मिलता है।
हराम की कमाई, हराम में गँवाई -> चोरी, डाका आदि की कमाई का फजूल खर्च हो जाना
हलक से निकली, खलक में पड़ी -> मुँह से निकली बात सारे संसार में फैल जाती है।
हांडी का एक ही चावल देखते हैं -> किसी परिवार या देश के एक या दो व्यक्ति देखने से ही पता चल जाता है कि शेष लोग कैसे होंगे।
हाथ कंगन को आरसी क्या -> जो वस्तु सामने हो उसे सिद्ध करने के लिए प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती
हाथ से मारे, भात से न मारे -> किसी को चाहे हाथ से मार लो, परन्तु किसी की रोजी-रोटी नहीं मारनी चाहिए
हाथी फिर बाजार, कुत्ते भूकें हजार -> बड़े या महान लोग छोटों की शिकायत की परवाह नहीं करते
हारिल की लकड़ी, पकड़ी सो पकड़ी -> हठी मनुष्य कभी अपना हठ नहीं छोड़ता
हिम्मत-ए-मरदां, मदद-ए-खुदा -> जो मनुष्य साहसी और परिश्रमी होते हैं, उनकी सहायता ईश्वर करते हैं।
हथेली पर सरसों नहीं जमती -> हर काम में समय लगता है, कहते ही काम नहीं हो जाता
हम प्याला, हम निवाला -> घनिष्ठ मित्र
हल्दी/हर्र लगे ना फिटकरी, रंग चोखा ही आवे -> बिना कुछ खर्च किए अधिक धन कमा लेना
हाथी के पाँव में सबका पाँव -> बड़ों के साथ बहुतों का गुजारा हो जाता है
हीरे की परख जौहरी जाने -> गुणी व्यक्ति का मूल्य, गुणवान व्यक्ति ही समझता है
हँसुए के ब्याह में खुरपे का गीत -> बेमौका
हंसा थे सो उड़ गये, कागा भये दीवान -> नीच का सम्मान)


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