नेत्र (eye)

आँख जीवधारियों का वह अंग है जो प्रकाश के प्रति संवेदनशील होता है। यह प्रकाश को संसूचित करके उसे तंत्रिका (तन्त्रिका) कोशिकाओ द्वारा विद्युत-रासायनिक संवेदों में परिवर्तित कर देता है। उच्चस्तरीय जंतुओं (जन्तुओं) की आँखें एक जटिल प्रकाशीय तंत्र (तन्त्र) की तरह होती हैं जो आसपास के वातावरण से प्रकाश इक्कठा करता है।

मध्यपट के द्वारा आँख में प्रवेश करने वाले प्रकाश की तीव्रता का नियंत्रण (नियन्त्रण) करता है तथा इस प्रकाश को लेंसों की सहायता से सही स्थान पर केंद्रित (केन्द्रित) करता है (जिससे प्रतिबिंब (प्रतिबिम्ब) बनता है) , इस प्रतिबिंब (प्रतिबिम्ब) को विद्युत संकेतों में बदलता है। इन संकेतों को तंत्रिका (तन्त्रिका) कोशिकाओ के माध्यम से मस्तिष्क को भेजता है। आँखो का रंग और वर्णन आँखें काली, नीली, भूरी, हरी और लाल रंग की भी हो सकती है।

संरचना

आंखे के विभिन्न भाग इस प्रकार है-

1. श्वेतपटल-

मानव आँख की अपारदर्शी, रेशेदार, सुरक्षात्मक बाहरी परत को श्वेतपटल अथवा स्क्लीरा (Sclera) कहा जाता हैं जो मुख्ततः कोलेजन और कुछ प्रत्यास्थ फाइबर से बनी होती है। इसे आँखा का श्वेत भाग भी कहा जाता है। मानव सहित विभिन्न जानवरों में यह भाग पूर्णतः सफेद होता है जिसमें एकदम अलग रंग में रंगीन परितारिका होती है परन्तु कुछ स्तनधारियों में स्क्लीरा का अन्य भाग भी परितारिका के रंग का ही होता है जिससे श्वेतपटल दिखाई नहीं देता। भ्रूण के विकास में श्वेतपटल का निर्माण तंत्रिका शिखा से होता है।

2. रक्तक-

रुधिर लाल कपड़ा या वस्त्र, लाल रंग का घोड़ा, केसर, दुपहिया का फूल, कुंकुम, लाल सहिजन श्वेत पटल के भीतरी पृष्ठ से लगी हुई परत काले रंग के उसकी एक पतली झिल्ली होती है जिसे श्वेत पत्र कहते हैं। यह कार्निया से भीतर आए प्रकाश का अवशोषण करती है।

3. दृष्टि पटल –

कशेरुकी जीवों में दृष्टिपटल, आंख के भीतर एक प्रकाश-संवेदी ऊतक पर्त को कहते हैं। आंख की प्रणाली एक लेंस की मदद से इस पटल पर सामने का दृष्य प्रकाश रूप में उतारती है और ये पटल लगभग एक फिल्म कैमरा की भांति उसे रासायनिक एवं विद्युत अभिक्रियाओं की एक श्रेणी के द्वारा तंत्रिकाओं को भेजता है। ये मस्तिष्क के दृष्टि केन्द्रों को दृष्टि तंत्रिकाओं द्वारा भेज दिये जाते हैं।

रेटिना की रचना 10 स्तरों से मिलकर होती है

4. नेत्रश्‍लेष्मला-

पलकों की आंतरिक सतह और नेत्रगोलक के अग्रभाग को, कॉर्निया क्षेत्र छोड़कर, एक पतली श्लेष्मिक झिल्ली ढकती है, जिसे कजंक्टाइवा या नेत्रश्‍लेष्मला कहते हैं।

5. स्वच्छमण्डल –

आंखों का वह पारदर्शी भाग होता है जिस पर बाहरी प्रकाश पड़ता है और उसका प्रत्यावर्तन होता है। यह आंख का लगभग दो-तिहाई भाग होता है, जिसमें बाहरी आंख का रंगीन भाग, पुतली और लेंस का प्रकाश देने वाला भाग होते हैं। कॉर्निया में कोई रक्त वाहिका नहीं होती बल्कि इसमें तंत्रिकाओं का एक जाल बना होता है। इसको पोषण देने वाले द्रव्य वही होते हैं, जो आंसू और आंख के अन्य पारदर्शी द्रव का निर्माण करते हैं। प्रायः कॉर्निया की तुलना लेंस से की जाती है, किन्तु इनमें लेंस से काफी अंतर होता है। एक लेंस केवल प्रकाश को अपने पर गिरने के बाद फैलाने या सिकोड़ने का काम करता है जबकि कॉर्निया का कार्य इससे कहीं व्यापक होता है।

कॉर्निया वास्तव में प्रकाश को नेत्रगोलक (आंख की पुतली) में प्रवेश देता है। इसका उत्तल भाग इस प्रकाश को आगे पुतली और लेंस में भेजता है। इस तरह यह दृष्टि में अत्यंत सहायक होता है। कॉर्निया का गुंबदाकार रूप ही यह तय करता है कि किसी व्यक्ति की आंख में दूरदृष्टि दोष है या निकट दृष्टि दोष। देखने के समय बाहरी लेंसों का प्रयोग बिंब को आंख के लेंस पर केन्द्रित करना होता है। इससे कॉर्निया में बदलाव आ सकता है। ऐसे में कॉर्निया के पास एक कृत्रिम कांटेक्ट लेंस स्थापित कर इसकी मोटाई को बढ़ाकर एक नया केंद्र बिंदु (फोकल प्वाइंट) बना दिया जाता है। कुछ आधुनिक कांटेक्ट लेंस कॉर्निया को दोबारा इसके वास्तविक आकार में लाने के लिए दबाव का प्रयोग करते हैं। यह प्रक्रिया तब तक चलती है, जब तक अस्पष्टता नहीं जाती।

6. परितारिका –

मानव तथा अधिकांश स्तनधारियों एवं पक्षियों की आँख के अंदर की एक पतली वृत्ताकार संरचना है जिसका काम आँख के तारे (pupil) के व्यास को नियंत्रण करना होता है। इस प्रकार आइरिस, रेटिना पर पहुँचने वाले प्रकाश की मात्रा का नियंत्रण करती है। आँख का रंग परितारिका के रंग से ही परिभाषित होता है।

7. पुतली –

आयरिश के पीछे एक छिद्र होता है जिसे पुतली या नेत्र का तारा कहा जाता है। यह आंख पर प्रकाश पड़ने पर संवेदन को दर्शाती है। अन्धकार में यह आंख के लेंस को स्वत: ही बड़ा कर देती है और अधिक प्रकाश में यह लेंस को सिकोड़ने/छोटा करने का कार्य करती है।

8. पूर्वकाल कक्ष –

पूर्वकाल कक्ष कॉर्निया और परितारिका के मध्य स्थित होता है। यह वह स्थान है जहां जलीय हास्य स्थित है, आंख के पूर्वकाल के भाग के आसपास के ऊतकों को ऑक्सीजन, प्रोटीन और ग्लूकोज को पोषण देने के लिए उत्तरदायी है।

9. नेत्रोद –

नेत्रोद (Aqueous Humour) एक तरल पदार्थ है, जो आँख के अग्रखंड (anterior segment) में भरा होता है। यह रक्तनालिकाओं से निकल कर लेंस को चारों ओर से आच्छादित रखता हुआ, पुतली द्वारा होकर अग्रखंड में आता है और फिर अग्रखंड के कोण से इसका बहिष्करण रक्त में होता रहता है। नेत्र के अंदर यह एक विशेष दबाव पर होता है और इस प्रकार यह आँख की गोलाकार आकृति को स्थायी रूप में रखने में सहायता प्रदान करता है। साथ ही आँख के उन भीतरी अंगों को जिनमें रक्त नलिकाएँ नहीं जातीं, जैसे लैंस, कारनिआ आदि को, यह पोषण पहुँचाता है तथा उनके मल पदार्थ को निकालने में सहायता करता है।

यह आवश्यक है कि सदैव नए नेत्रोद का निस्सरण होता रहे और अग्रखंड के कोण से बाहर निकलता रहे। यदि किसी कारणवश नेत्रोद का निर्माण अधिक मात्रा में हो, अथवा उत्सर्ग में बाधा पड़े, तो नेत्रांतरिक दबाव (intraocular pressure) अधिक हो जाता है, जिससे एक बीमारी ग्लॉकोमा (glauacoma) हो जाती है।

10. नेत्रकाचाभ द्रव –

नेत्रकाचाभ द्रव एक पारदर्शी, बेरंग, पतला जन जो लेंस और रेटिना के बीच आंख में अंतरिक्ष भरने का कार्य करता है। सिलिअरी शरीर के गैर-वर्णक भाग में कोशिकाओं द्वारा उत्पादित होते है, भ्रूण मिसेनच्यमे कोशिकाओं से व्युत्पन्न होते है, जन्म के बाद। नेत्रकाचाभ द्रव रेटिना के साथ संपर्क रखता है जो रंजित के खिलाफ यह दबाकर रखने में सहायता करता है।

11. रोमक पिंड

रोमक पिण्ड (सिलिअरी बॉडी) आंख का एक हिस्सा होता है। इसमें सिलिअरी मांसपेशी, जो लेंस के आकार का नियंत्रण करती है, और सिलिअरी एपिथेलियम, जो जलीय ह्युमर पैदा करती है। जलीय ह्युमर रोमक पिण्ड के गैर-रंजित हिस्से में पैदा होता है। रोमक पिण्ड असित-पटल (uvea) का भाग है। असित-पटल, ऊतक की वह परत है जो आंख के ऊतकों को ऑक्सीजन और पोषक तत्व पहुंचाती है। रोमक पिण्ड दंतुर सीमा (आईरो सेराटा) से आइरिस की जड़ में मिलती है।