श्वसन तंत्र (Respiratory System)

मानव श्वसन में वायु फेफड़ों तक एवं फेफड़ों से बाहर जिस मार्ग से होकर गुजरती हैं उस मार्ग में उपस्थित सभी तंत्रों को श्वसन तंत्र कहते है। वयस्कों में श्वसन दर 18-20 और बच्चों में 44 होती है।
प्रत्येक जीव को जीवित रहने हेतु ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। क्योंकि ऑक्सीजन ही कार्बनिक भोज्य पदार्थों का ऑक्सीकरण या विघटन करके ऊर्जा प्रदान करता है।
भोज्य पदार्थों के ऑक्सीकरण की यही प्रक्रिया ‘श्वसन’ (respiration) कहलाती है। चूंकि इस प्रकार की श्वसन क्रिया फुस्फुसों (Lungs) में ही सम्पन्न होती है। इसलिए इसे फुस्फुस श्वसन (Pulmonary Respiration) भी कहते हैं।

मानव के श्वसन तन्त्र (Respiratory System) को दो भागों में बांटा गया है–

  1. श्वसन पथ (Respiratory Path)
  2. श्वसन अंग (Respiratory organs)

1. श्वसन पथ (Respiratory Path)

यह वायु के आवागमन का पथ है। इसके निम्न भाग हैं-

  1. बाहा नासाछीद्र (External Nares)
  2. नासा मार्ग (Nasal Tract)
  3. ग्रसनी (Parynx)
  4. वायु नाल (Wind Pipe)

1. बाहा नासाछिद्र (External Nasal Pore)

नासाछिद्र की संख्या 2 होती है। ये नासामार्ग के प्रघाण (Vestibule) भाग में खुलते है।

2. नासा मार्ग (Nasal Tract)

नासा मार्ग के तीन भाग होते है  –

  1. प्रघाण (Vestibule)
  2. श्वसन (Respiratory Part)
  3. घ्राण भाग (Olfactory Part )

 प्रघाण (Vestibule)

ये नासामार्ग का सबसे छोटा हिस्सा होता है। यह केरेटिन विहीन स्तरित उपकला (Non keratinized squamous epithelium) से ढका होता है।

श्वसन भाग (Respiratory region)

ये नासामार्ग (Nasal Passage) का मध्य है। जो घ्राण (Olfactory) भाग में खुलता है।

घ्राण भाग (Olfactory region)

यह नासा मार्ग का पश्च ऊपरी भाग है, जो तंत्रिका संवेदी उपकला (Neuro sensory epithelium) से अस्तरित होता है। इस उपकला को घ्राण उपकला (Olfactory epithelium) या शनीडेरियन झिल्ली भी कहते है। इस उपकला के द्वारा गंध का पता लगाया जाता है।

3. ग्रसनी (Pharynx)

ग्रसनी श्वसन तंत्र तथा पाचन तंत्र दोनों का उभयनिष्ट भाग है। इसके तीन भाग होते हैं-

  1. नासा ग्रसनी (Nasopharynx)
  2. मुख ग्रसनी (Oropharynx)
  3. कंठ ग्रसनी (Laryngopharynx)

4. वायु नाल (Wind Pipe)

यह नलिका वायु के फेफड़ों में आवागमन का मुख्य हिस्सा है। यह नलिका दो भागों में विभक्त होती है–

  • लैरिंक्स (Larynx)
  • श्वासनली (Trachea)

कंठ या ध्वनि बॉक्स (Larynx or Sound box)

यह श्वास नली का अग्र रूपांतरित भाग होता है। इसको ध्वनी उत्पादक अंग (Sound producing organ) भी कहा जाता है। यह 9 प्रकार की उपास्थियों से निर्मित होती है इसमें स्वर रज्जू या वोकल कार्ड पाए जाते है जिसमें वायु गुजरने पर इसमें कम्पन होता है जिससे ध्वनि उत्पन्न होती है।

ग्लोटिस (Glottis)

  • लेरिंक्स कंठ में एक छिद्र (slit aperture) के रूप में खुलती है, जिसे ग्लोटिस कहते है। यह ग्रसनी के अधर पर स्थित होता है।
  • वायु लेरिंक्स में ग्लोटिस से ही होकर प्रवेशित है।

एपिग्लोटिस (Epiglottis)

यह ग्लोटिस पर पाया जाने वाला झिल्लीनुमा ढक्कन है जो भोजन को निगलते समय ग्लोटिस छिद्र को ढक लेता है। यह प्रत्यास्थ उपास्थि (Elastic Cartilage) का बना होता है।

कंठ की कार्टिलेज (Cartilage of the larynx)

कंठ का निर्माण उपास्थि (Cartilage) के 9 टुकड़े द्वारा हैं। जो निम्न है-

  •  थाइरोइड उपास्थि – इसे एडम का एप्पल (Adam’s Apple) भी कहते है।
  • क्रिकॉयड उपास्थि
  • ऐरिटीनॉइडस
  • सैंटोरिनी की उपास्थि
  • क्युनिफॉर्म उपास्थि

वाक् तन्तु (Vocal cord)

लेरिंक्स श्वसन मार्ग के साथ ध्वनी पैदा करने का काम भी करता है।   इसमें ध्वनि उत्पादन के लिए वाक् तन्तु (Vocal cord) पाए जाते हैं। जो झिल्लीनुमा होती है।

श्वास नली (Trachea)

  • श्वास नली (Trachea) C आकार में उपास्थिमय छल्लों (Cartilage Ring) से बनी नलिका है। यह वक्षीय गुहा में जाकर दो शाखाओं दांयी एंव बांयी में बंट जाती है, जिन्हें श्वसनी (Bronchi) कहते हैं। श्वास नली में कूटस्तरित पक्ष्माभी स्तम्भाकार उपकला (Pseudo Stratified Ciliated Columnar Epithelium) पायी जाती है।
  • प्रत्येक श्वसनी फेफड़ों में जाकर छोटी-छोटी नलिकाओं में विभक्त हो जाती है, जिन्हें क्रमशः द्वितीयक श्वसनी (Secondary Bronchi), तृतीयक श्वसनी (Tertiary Bronchi) कहते है।
  • तृतीयक श्वसनी (Tertiary Bronchi) छोटी-छोटी नलिकाओं शाखित नलिकाओं में विभक्त होती है। जिनको श्वसनिकाएँ (bronchioles) कहते हैं।
  • इन श्वसनिकाओं के अंतिम सिरे कुपिका (Alveoli) में खुलते है।

श्वसन अंग (Respiratory organs)

फेफड़े या फुफ्फुस (Lungs)

फेफड़े फुफ्फुसीय गुहा (Pleural Cavities) में स्थित होते है। ये संख्या में दो, शंकुवाकार, गुलाबी ठोस तथा स्पंजी होते है।

फुफ्फुसीय गुहा (Pleural cavity) में लसिका भरी रहती है, जिसे फुफ्फुसीय द्रव (Pleural fluid) कहते हैं। जो ग्लाइकोप्रोटीन है तथा प्लुरा द्वारा स्त्रावित किया जाता है।

प्रत्येक फुफ्फुसीय गुहा (Pleural cavity) के चारों ओर से फुफ्फुसावरण (Pleural Membrane or Pleura) घेरे रहता है। इस फुफ्फुसावरण (Pleural Membrane) के दो भाग होते है।

  1. Parietal Pleura देह भीति से लगा हुआ आवरण।
  2. Visceral Pleura फेफड़ों से लगा आवरण।

दोनों फेफडों के बीच मिडिया स्टीनम नामक अवकाश होता है।

कुपिका (Alveoli)

  • श्वसनिकाएँ (bronchioles) के अंतिम सिरे प्रत्येक फेफड़ों में जाकर गुब्बारेनुमा संरचना बना लेती है, जिनको कुपिका (Alveoli) कहा जाता है। मानव के फेफड़ों में लगभग 30-35 करोड़ कुपिकाएँ (Alveoli) पाई जाती है।
  • कुपिकाएँ फुफ्फुस की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई (Structural and functional unit) होती है।
  • कुपिकाओं की पतली भित्ति शल्की उपकला (Squamous Epithelium) की बनी होती है। कुपिकाओं की भित्ति में सूक्ष्म छिद्र (Micro pore) पाये जाते हैं। इन्हें “कुहन के रन्ध्र (Pores of Kuhn)” कहते हैं।