पाचन तंत्र (Digestive System)

पाचन वह प्रक्रिया है, जिसमें जटिल कार्बनिक पदार्थों (Complex organic material) को जल अपघटनीय एंजाइमों के द्वारा सरल कार्बनिक पदार्थों में बदला जाता है।

पाचन के प्रकार

यह दो प्रकार का होता है-

  1. अन्तःकोशिकीय पाचन (Intracellular digestion)
  2. बाह्य कोशिकीय पाचन (Extracellular digestion)

अन्तःकोशिकीय पाचन (Intracellular digestion)

जब पाचन की प्रक्रिया कोशिका केभीतर होती है, तो इसे अन्तःकोशिकीय पाचन (Intracellular digestion) कहते है। यह निम्न श्रेणी के जीवों में सम्पन्न होती है। जैसे अमीबा, पैरामिशियम, स्पंज आदि।

बाह्य कोशिकीय पाचन (Extracellular digestion)

जब पाचन की प्रक्रिया कोशिका के बाहर होती है, तो इसे बाह्य कोशिकीय पाचन (Extracellular digestion) कहते है। यह उच्च श्रेणी के जीवों में पूरी होती है। जैसे एनेलिडा, मोलस्का, कोर्डेटा।

कुछ जीवों में दोनों प्रकार का पाचन (Intracelluar and Extracellular) पाया जाता है। जैसे सीलेन्ट्रेटा (Coelenterata), मुक्तजीवी प्लेटिहेल्मिनथिज (Platyhelminthes)।

मानव पाचन तंत्र (Human Digestive System):-

पाचन तंत्र (Digestive System) के दो भाग होते हैं-

  1. आहारनाल (Alimentary canal)
  2. सहायक पाचक ग्रंथियाँ (Assecosry Digestive glands)

आहारनाल (Alimentary canal) :-

यह मुख से प्रारम्भ होकर गुदा तक फैली रहती है। इसमें निम्न अंग (Organs) होते है-

  1. मुख एवं मुख गुहा (Mouth and Buccal cavity)
  2. ग्रसनी (Pharynx)
  3. ग्रसिका या ग्रास नली (Oesophagus or Esophagus)
  4. आमाशय (Stomach)
  5. छोटी आंत (Small Intestine)
  6. बड़ी आंत (Large Intestine)
  7. गुदा (Anus)

मुख एवं मुख गुहा (Mouth and Buccal cavity)

मुख होठों से घिरा हुआ छेद होता है। जो मुख गुहा में खुलता है। होठ ओरबीक्युलेरिस-ओरिस पेशियों का बना होता है।

मुखगुहा (Buccal cavity)

मुखगुहा पृष्ठ सतह पर दो प्रकार के तालू , अधर सतह पर गले तथा दोनों ओर गाल की पेशियों से घिरा रहता है। इसमें दांत तथा जीभ स्थित होती हैं।

दांत (Teeth)

मानव द्विबारदंती होता है। मानव में चार प्रकार के दांत (Teeth) पाए जाते हैं-

  1. कृंतक (Incisor)
  2. रदनक (Canine)
  3. अग्र-चर्वणक (Pre-molar)
  4. चर्वणक (Molar)

कृंतक (Incisor)

ये भोजन का काटने (Bite) का कार्य करते है। शाकाहारी जीवों (herbivorous) में अधिक विकसित होते है। मानव में इनकी संख्याँ 8 होती है।

रदनक (Canine)

ये चीरने-फाड़ने का काम करते है। मांसाहारी जीवों (carnivorous) में अधिक विकसित होते है। मानव में इनकी संख्याँ 4 होती है।

अग्र-चर्वणक (Pre-molar)

ये भोजन को चबाने (Chewing) का काम करते है। मानव में इनकी संख्याँ 8 होती है।

चर्वणक (Molar)

ये भी भोजन को चबाने का (Chewing) कार्य करते है। मानव में इनकी संख्याँ 12 होती है। अंतिम चर्वणक (Last Molar) दांत को अकल दाढ़ (wisdom tooth) कहते है।

जीभ (Tongue)

यह पेशीय संरचना है। जो एक संवेदी अंग (sensory organ) भी है। इस पर स्वाद का पता लगाने के लिए रस-कलिकाएँ होती है। जो चार प्रकार की होती हैं-

  1. फिलीफॉर्म पैपिला
  2. फॉलिऐट पैपिला
  3. फंजीफॉर्म पैपिला
  4. वेलेट पैपिला।

जीभ का पिछला भाग हायोइड अस्थि (Hyoid bone) से जुड़ा रहता है। तथा फ्रेनुलम लिंगुअल के द्वारा यह मुख गुहा की फर्श से जुड़ी रहती है।

ग्रसनी (Pharynx)

यह श्वसन मार्ग तथा पाचन मार्ग का उभयनिष्ट है। ग्रसनी (Pharynx) तीन भागों में विभेदित होता है –

  1. नासा ग्रसनी (Nasopharynx)
  2. मुख ग्रसनी (Oropharynx)
  3. कंठ ग्रसनी (Laryngo pharynx)

ग्रसनी ग्रसिका में खुलती है।

ग्रसिका या ग्रास नली (Oesophagus or Esophagus)

यह आमाशय तथा ग्रसनी को जोडती है। यह डायफ्राम को क्रास करते हुए आमाशय के अंदर खुलती है। इसमें क्रमानुकुंचन (Peristalsis) द्वारा भोजन आमाशय तक जाता है।

आमाशय (Stomach)

यह मनुष्य के शरीर में बायीं (Left) तरफ होता है। इसके तीन भाग होते हैं-

  1. जठरागम (Cardiac)
  2. फंडस या काय (Fundic/Body)
  3. जठरनिर्गम (Pyloric)

आमाशय की भित्ति में जठर ग्रंथि (Gastric Glands) पायी जाती है।

छोटी आंत (Small Intestine)

यह सबसे लम्बी तथा नलिकाकार (Tubular) संरचना है। इसके तीन भाग होते हैं-

  1. ग्रहणी या ड्यूडीनम (Duodenum): यह C – आकर की होती है। आमाशय (stomach) इसमें खुलता है।
  2. अग्र क्षुद्रान्त्र या जेजुनम (Jejunum): यह ग्रहणी (Duodenum) तथा पश्च क्षुद्रान्त्र (Ileum) के बिच का भाग है।
  3. पश्च क्षुद्रान्त्र या इलियम (Ileum): यह आहारनाल का सबसे बड़ा भाग है। जो बड़ी आंत (Large Intestine) के अन्धनाल में खुलता है।

बड़ी आंत (Large Intestine)

इसका व्यास छोटी आंत से बड़ा होने के कारण इसको बड़ी आंत कहते है। इसका व्यास 4-6 cm होता है।

इसके तीन भाग होते हैं-

  1. अन्धनाल (Caecum)
  2. वृहदांत्र (Colon)
  3. मलाशय (Rectum)

अन्धनाल (Caecum)

छोटी आंत का पश्च क्षुद्रान्त्र अन्धनाल (Caecum) में खुलता है। इसमें कोई पाचन नहीं होता लेकिन पशुओं के अन्धनाल में सेल्यूलोज का पाचन करने वाले एंजाइम पाए जाते है।

पश्च क्षुद्रान्त्र तथा अन्धनाल के जुड़ने वाले स्थान पर अंगुलीनुमा उभार पाया जाता है, जिसे कृमिरुपी परीशेषिका (Vermiform Appendix) कहते है। जो मनुष्य में एक अवशेषी अंग है।

वृहदांत्र (Colon)

यह बड़ी आंत (Large Intestine) का सबसे बड़ा भाग है। इसके चार भाग होते हैं-

1. आरोही वृहदांत्र (Ascending Colon)

2. अनुप्रस्थ वृहदांत्र (Transverse Colon)

3. अवरोही वृहदांत्र (Descending Colon)

4. सिग्मोइड वृहदांत्र (Sigmoid Colon)

मलाशय (Rectum)

सिग्मोइड वृहदांत्र (Sigmoid colon) मलाशय में खुलती है। जिसमें मल इक्कठा रहता है। इसका अंतिम भाग गुदानाल (Anal canal) कहलाता है। यह गुदा (Anus) द्वारा बाहर की तरफ खुलता है।

गुदा (Anus)

यह एक छिद्र है जिसके द्वारा मल को त्यागा जाता है। इनमें अवरोधनी पेशियाँ (sphinctor muscle) होती है। जिनके द्वारा गुदा छिद्र के बंद होने अथवा खुलने का नियंत्रण होता है।

इसमें भीतर की तरफ अनैच्छिक अवरोधनी (involuntary sphinctor) तथा बाहर की तरफ ऐच्छिक अवरोधनी (voluntary spinctor) होती है।

सहायक पाचक ग्रंथियाँ-

लार ग्रंथि (Salivary Gland)

ये मुख गुहा में खुलती है इनकी उत्पत्ति एक्टोडर्म (Ectoderm) से होती है। मानव में इनकी संख्या तीन जोड़ी होती है। जो निम्न हैं-

1. कर्णपूर्व लार ग्रंथि (Parotide Gland):- यह कानों के आगे की ओर होती है।

2. अधोजम्भ लार ग्रंथि (Sub-Maxillary or Sub-Mandibular Gland):- Maxilla तथा Mandibul जबड़े (जम्भ) को कहा जाता है। यह जबड़े के नीचे स्थित होती है।

3. अधोजिह्वा लार ग्रंथि (Sub-Lingual Gland):- Lingual शब्द जीभ (जिह्वा) के लिए उपयोग में लिया जाता है। यह जीभ के नीचे स्थित होती है। मानव में तीनो प्रकार की लार ग्रंथियों द्वारा प्रतिदिन 1-1.5 लिटर लार (Saliva) स्रावित होती है।

लार (Saliva)

यह लारग्रंथि द्वारा स्रावित रस है। लार का pH 6.8 होता है। लार में पानी, लवण, श्लेष्मा (mucin), लाइसोजाइम (lysozyme), एमिलेज या टाइलिन (Amylase/Ptyalin) तथा thyocyanate  होता है।

मुखगुहा में लार मिले हुए भोजन को बोलस (Bolus) कहा जाता है।

जठर ग्रंथि (Gastric Glands)

यह आमाशय की भित्ति (Wall) में पायी जाती है। इसमें निम्न प्रकार को कोशिकाएँ होती हैं –

1. गॉब्लेट कोशिका (Goblet cell) :- ये श्लेष्मा (Mucous) का स्त्राव करती है। यह आमाशय की भित्ति को HCl से बचाता है।

2.अम्लजन कोशिका (Oxyntic cell) :- ये केवल फंडस भाग में स्थित होती है। ये HCI स्त्रावित करती है।  इनको parietal cells भी कहते है।

3. मुख्य कोशिका (Chief Cells) :-  ये कोशिकाएँ निष्क्रिय पाचन एंजाइम (digestive enzyme) का स्त्रवण करती है, जिन्हें जाइमोजन्स कहते है। जैसे पेप्सिन तथा रेनिन।

यकृत (Liver)

यह शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है इसकी उत्पत्ति एन्ड़ोडर्म से होती है। यकृत (Liver) का वयस्क मनुष्य में भार लगभग 1.2-1.5 किलोग्राम होता है।

पित्ताशय (Gall Bladder)

यह हरे रंग की थैली है। जो यकृत पर पायी जाती है। इनमें पित (Bile) जमा तथा सांद्रित होता है। पित (Bile) का ग्रहणी में स्राव भी पित्ताशय (Gall Bladder) ही करता है। यह चूहे, ऊंट तथा घोड़े में अनुपस्थित होता है।

पित्त रस (Bile juice)

पित्तरस (Bile) एक हल्के पीले-हरे रंग का तरल है। इसमें कोई पाचक एंजाइम नहीं होता। यह वसा का पायसीकरण (Emulsification) करता है।

पित्त रस में निम्न रसायन होते हैं-

  • अकार्बनिक लवण (Inorganic Salts) जैसे Bicarbomates, Chlorides, Carbonates तथा sodium, potassium, calcium के फॉस्फेट
  • कार्बनिक लवण (Organic salts) जैसे Sodium taurocolate तथा sodium Glycolate
  • पित्त वर्णक (Bile pigments) जैसे Bilirubin (पिला), Biliverdin (हरा)
  • वसीय पदार्थ (Fatty substance) जैसे Cholestrol, Lecithin तथा Phospholipids

कभी-कभी किसी विकार के कारण पित्ताशय को काट कर हटा दिया जाता है जो कोलेसायस्टेकटोमी (Choleysestectomy) कहलाता है।

अग्न्याशय (Pancreas)

अग्नाशय ग्रहणी के C आकर के भाग में स्थित होती है। इसका अंतिम सिरा प्लीहा को छूता है। यह बहि: स्त्रावी (Exocrine) और अत:स्त्रावी (Endocrine), दोनों ही ग्रन्थियों की तरह कार्य करती है। इसलिए इसे मिश्रित ग्रंथि (Mixed gland) भी कहते है।

यह यकृत के बाद शरीर की दूसरी सबसे बड़ी ग्रंथि है। इसके द्वारा बहि: स्त्रावी ग्रंथि (Exocrine Gland) के रूप में अग्न्याशयी रस (Pancreatic juice) का स्राव होता है।

आंत्र ग्रंथि (Intestinal Gland)

यह छोटी आंत की भित्ति के म्युकोसा झिल्ली में गॉब्लेट तथा ब्रूस बॉर्डर की कोशिकाएँ पाई जाती है। ये इसके द्वारा आंत्ररस (Intestinal juice) स्रावित होता है। जिसे सक्कस एंटेरिकस कहते है।

भोजन के पाचन की क्रियाविधि (Mechanism of Digestion of Food)

मानव में भोजन के पाचन की शुरुआत मुख गुहा से हो जाती है। भोजन का पाचन मुख गुहा से छोटी आंत्र तक होता है। विभिन्न प्रकार के एंजाइम भोजन के घटकों को उनके छोटे एवं सरल कार्बनिक इकाइयों में बदल देते है। बड़ी आंत में भोजन का कोई पाचन नहीं होता।

अपचित पदार्थ का निष्कासन तथा मल (Removal of  undigested food and stool/ Feces)

मलाशय में मल एकत्र होता है, और निश्चित समय पर मलाशय की भित्तियों से संवेग (impulses) उत्पन्न होते है। जो सवेदी तंत्रिका के माध्यम से मेरुरुज्जू (spinal cord) तक जाते हैं,  वहाँ से संवेग प्रेरक तंत्रिका द्वारा मलाशय में पहुँचते है। और गुदा की अवरोधिनी पेशियों (sphincter Muscle)  में विस्तार कर देते जिससे मलत्याग (defecation) की इच्छा होती है जब मस्तिष्क के द्वारा भेजे गये संवेग से अवरोधिनी पेशियां (sphincter muscle) ढीली होती है तो मलत्याग होता है।

भोजन के पाचन तथा अवशोषण के पश्चात्‌ अपशिष्ट आंत्र में बच जाता है,  मल  (stool/ Feces) कहलाता है। मल में भोजन का अपच्य भाग, आंत्र की श्लेष्मल झिल्ली के टुकड़े, जीवाणुओं आदि उपस्थित होते है। मल का पिला रंग पित्त वर्णक बिलीरुबिन तथा बिलीवरडीन (Bilirubin and biliverdin) के कारण होता है।