समसूत्री विभाजन (Mitosis division)

समसूत्री विभाजन कोशिका विभाजन को कायिक कोशिका विभाजन (Somatic cell division) भी कहते है क्योंकि यह विभाजन कायिक कोशिकाओं में होता है और दो एकसमान कोशिकाऐ बनती है। समसूत्री विभाजन में हालाँकि कोशिका का विभाजन होता है लेकिन गुणसूत्रों की संख्या समान रहती है। जन्तु कोशिकाओं में समसूत्री विभाजन को सबसे पहले वाल्थर फ्लेमिंग ने 1879 ई. में देखा था और उन्होनें ने ही इसे समसूत्री (Mitosis) नाम दिया था।

समसूत्री विभाजन एक सतत प्रक्रिया है जिसे निम्नलिखित पाँच चरणों में बाँटा जाता है:-

  1. प्रोफेज (Prophase): समसूत्री विभाजन का प्रथम चरण।
  2. मेटाफेज (Metaphase): समसूत्री विभाजन का द्वितीय चरण।
  3. एनाफेज(Anaphase): समसूत्री विभाजन का तृतीय चरण।
  4. टीलोफेज (Telophase): समसूत्री विभाजन का चतुर्थ चरण।
  5. साइटोकाइनेसिस (Cytokinesis): समसूत्री विभाजन का चौथा चरण।

1. प्रोफेज (Prophase)-

  • सभी जन्तु कोशिकाओं और कुछ पादपों (कवक व कुछ शैवाल) की कोशिकाओं में पाया जाता है।
  • तारककेंद्रक (Centriole) खुद की प्रतिलिपि बनाता है और दो नए तारककेंद्रों (Centrioles/Centrosomes) में बंट जाता है, जो कोशिका (ध्रुवों) के विपरीत किनारों की ओर चले जाते हैं।
  • स्पिंडल फाइबर या फाइबरों की श्रृंखला प्रत्येक तारककेंद्र के नजदीक के क्षेत्र से निकलती है और नाभिक (Nucleus) की तरफ बढ़ती है।
  • कवक और कुछ शैवाल को छोड़ दें तो स्पिंडल फाइबर बिना तारककेंद्र की उपस्थिति के विकसित होता है।
  • जिन गुणसूत्रों की प्रतिलिपि बन चुकी है, वे छोटे और मोटे हो जाते हैं।
  • क्रोमैटिड प्रत्येक गुणसूत्र के प्रतिलिपि का आधा होता है जो सेंट्रोमियर (Centromere) से एक दूसरे से जुड़े होते हैं।
  • बाद के प्रोफेज चरण में नाभिक और नाभिकीय झिल्ली विखंडित होने लगती है।

2. मेटाफेज (metaphase)-

  • गुणसूत्र के जोड़े स्वयं को इस प्रकार संरेखित करते हैं कि कोशिका का केंद्र और प्रत्येक सेंट्रोमियर प्रत्येक ध्रुव से एक स्पिंडल फाइबर से जुड़ जाए।
  • सेंट्रोमियर का विभाजन होता है और अलग किए गए क्रोमैटिड स्वतंत्र संतति गुणसूत्र बन जाते हैं।

3. एनाफेज (anaphase)-

  • स्पिंडल फाइबर छोटे होने लगते हैं।
  • ये सहयोगी क्रोमैटिड्स पर बल डालते हैं, जो उन्हें एक दूसरे से अलग खींचता है।
  • स्पिंडल फाइबर लगातार छोटा होता जाता है, क्रोमैटिड्स को विपरीत ध्रुवों पर खींचता जाता है।
  • यह प्रत्येक संतति कोशिका में गुणसूत्रों के एकसमान सेट का पाया जाना सुनिश्चित करता है।

4. टीलोफेज (telophase)

  • गुणसूत्र पतला हो जाता है।
  • नाभकीय आवरण बनता है, अर्थात प्रत्येक नये गुणसूत्र समूह के चारों तरफ नाभिकीय झिल्ली बन जाती है।
  • संतति गुणसूत्र किनारों पर पहुंचते हैं।
  • स्पिंडल फाइबर पूरी तरह से समाप्त हो जाता है।

5. साइटोकाइनेसिस (cytokinesis)

  • नाभिक के विभाजन के बाद, कोशिका द्रव्य विभाजित होना शुरु हो जाता है।
  • मूल वृहद कोशिका दो छोटी एकसमान कोशिकाओं में बंट जाती है और प्रत्येक संतति कोशिका भोजन ग्रहण करती है, विकसित होती है तथा विभजित हो जाती है और यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है।
  • संतति कोशिकाओं के संचरण द्वारा यह चयापचय (Metabolism) की निरंतरता को बनाए रखता है।
  • यह घाव को भरने, क्षतिग्रस्त हिस्सों को फिर से बनाने (जैसे-छिपकली की पूंछ), कोशिकाओं के प्रतिस्थापन (त्वचा की सतह) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन यदि यह प्रक्रिया अनियंत्रित हो गई तो यह ट्यूमर या कैंसर वृद्धि का कारण बन सकती है।

समसूत्री विभाजन में, यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि दो संतति कोशिकाओं में समान संख्या में गुणसूत्र हों और इसलिए इनमें जनक कोशिका के समान गुण ही पाए जाते हैं।

समसूत्री विभाजन का महत्व (Significance of mitosis): 

  • समसूत्री विभाजन द्वारा एक मातृ कोशिका से दो समान संतति कोशिकाओं का निर्माण होता है।
  • समसूत्री विभाजन के परिणामस्वरूप निर्मित सभी संतति कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या समान रहती है।
  • समसूत्री विभाजन के परिणामस्वरूप संतति कोशिकाओं के गुण मातृ कोशिकाओं के समान होते हैं।
  • समसूत्री विभाजन सभी सजीवों में वृद्धि का आधार होता है। सजीवों में घावों का भरना एवं अंगों का पुनरुद्भवन (Regeneration) इसी विभाजन के परिणामस्वरूप संभव होता है।