कुषाण राजवंश (78 ई. पू. से 44 ई. पु.)

  • स्थापना – 25 ई. पू.
  • संस्थापक – कुजुल कडफ़ाइसिस
  • शासनकाल – 78 ई. पू. से 44 ई. पु.

भारत में पार्थियाईओ के बाद कुषाण वंश  भारत में प्रवेश किया जिनको यूची और तोखरी भी कहते थे। यूची कबीला 5 किलो में बटा हुआ था। कुषाण उन्हीं में से एक कुल के थे।

उत्तरी मध्य एशिया के हरित मैदानों के खानाबदोश लोग थे और चीन के पड़ोस में रहते थे। किसानों ने पहले बैक्ट्रिया और उत्तरी अफगानिस्तान पर अधिकार किया और वहां से सबको को भगाया धीरे-धीरे और वे काबुल घाटी की ओर बढ़े और हिंदूकुश पार करके गंधार पर अधिकार किया और वहां यूनानीयों और पर्थियइयो को अपदस्थ कर सता जमाई।

अंततः कुषाण वंश ने  निचली सिंधु घाटी तथा गंगा के मैदान के अधिकतर हिस्से पर भी कब्ज़ा कर लिया उनका समराज आम उदारिया से गंगा तक मध्य एशिया के खुरासान से उत्तर प्रदेश के वाराणसी तक फैल गया।

कुषाणों ने पूर्व सोवियत गणराज्य में शामिल मद्धेशिया का अच्छा खासा भाग, ईरान का हिस्सा ,अफगानिस्तान का कुछ अंश लगभग पूरा पाकिस्तान और लगभग समूचा उत्तर भारत इन सारे विभागों को अपने शासन के साए में कर दिया।

इनमें नौ नौ प्रकार के लोगों और संस्कृतियों के आपस में घुल मिल जाने के विलक्षण अवसर आया और इन सम्मेलन की प्रक्रिया ने ऐसी संस्कृति को जन्म दिया जो आज के 9 देशों तक फैली हुई है।

कुषाण वंश के संस्थापक 

कुषाण के दो राजवंश हैं जो एक के बाद एक आएं थे पहले राजवंश की स्थापना कैडसिस नामक सरदारों के घरानों ने की थी। इस घराने का शासन 50 ईसवी से 28 वर्षों तक चला था। इसमें दो राजा हुए पहला राजा कैडसिस प्रथम था  जिसने हिंदू कुश के दक्षिण में सिक्के चलाए उसने रोमन सिक्कों की नकल करके तांबा के सिक्के ढलवाए।

दूसरा राजा था जिसने बड़ी संख्या में स्वर्ण मुद्राएं जारी की और अपना राज्य सिंधु नदी के पूर्व में फैला के बाद आया,  इस वंश के राजाओं ने उत्तरी भारत और निचली सिंधु घाटी में अपना प्रभुत्व फैलाया आरंभिक कुषाण राजाओं ने बड़ी संख्या में स्वर्ण मुद्रा जारी कि उनकी स्वर्ण मुद्रा धातु की शुद्धता में गुप्त शासकों की स्वर्ण मुद्राओं से कहीं अधिक थी।

उनकी स्वर्ण मुद्राएं तो मुख्यता सिंधु के पश्चिम में ही मिली है पर उनके अभिलेख ना केवल पश्चिम उत्तर भारत और सिंधु में ही बल्कि मथुरा, श्रवास्ती, कौशांबी, और वाराणसी तक दिखे मिले।

कुषाण वंश की राजधानी

मैदानों में काफी भागों को भी अपने अधिकार में किया मथुरा में जो किसान के सिक्के अभिलेख संरचना और मूर्तियां प्राप्त हुई हैं उनसे प्रकट होता है कि मथुरा भारत में किसानों की वित्तीय राजधानी थी पहली राजधानी आधुनिक पाकिस्तान में अवस्थित पुरुष पुर, पेशावर में थी।

कनिष्क का साम्राज्य

दूसरी शताब्दी (78 ईसा पूर्व से 44 ई.) में कुषाण वंंश के भारत का एक महान सम्राट था जिसका नाम कनिष्क  था । यह अपने राजनैतिक,सैन्य एवं आध्यात्मिक उपलब्धियों तथा कौशल के लिए बिख्यात था ।

कनिष्क ने एक मठ और विशाल स्तूप बनवाया। इस स्तूप को देखकर विदेशी यात्री आश्चर्यचकित रह जाते थे, कुषाण ससक कनिष्क सर्वाधिक विख्यात  शासक था। लगता है कि उसने भारत की सीमाओं के बाहर चीनियों से हार खानी पड़ी लेकिन इतिहास में दो कारणों से उसका नाम है पहला उसने 78 ईसवी में एक शक सवंत  चलाया। और इसे  भारत सरकार द्वारा प्रयोग में लाया जाता है।

दूसरा उसने बौद्ध धर्म का  मुक्त हिर्दय संपोषण किया। उसने कश्मीर में बौद्धों का सम्मेलन आयोजित किया जिसमें बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय को अंतिम रूप दिया गया। कनिष्क कला और संस्कृत साहित्य का भी महान संरछ्क  था। कनिष्क के उतराधिकारी पचिमोतर भारत पर लगभग 230 ई तक राज करते रहे। उनमे से कुछ तो शुद्ध भारतीय नाम धारण कर लिया जैसे वासुदेव।

कुषाण वंश का पतन

ईरान में उठ खड़ी हुई सासनी शक्ति ईशा की तीसरी सदी के मध्य में अफगानिस्तान और सिंधु के पश्चिम क्षेत्र से छीन कर अपने कब्जे में कर लिए और भारत में कुषाण राजवाड़े लगभग 100 वर्षों तक रहे। लगता है कि कुषाण का अधिकार काबुल घटि, कपिशा और  बैक्ट्रिया में ईसा की तीसरी – चौथी सदी में कायम रहा।