पादप परिवर्धन

बीज अंकुरण से जरावस्था के मध्य होने वाले बदलाव को सामूहिक रूप से परिवर्धन कहा जाता है। एक पादप कोशिका के विकासात्मक प्रक्रम का अनुक्रम पौधे पर्यावरण के प्रभाव के कारण जीवन के अनेक चरणों में चित्र आरेख के अनुसार अलग अलग पथो का अनुसरण करते है, ताकि विभिन्न प्रकार की संरचनाओ का गठन कर सके। पौधों की इस घटना को सुघट्यता (प्लास्टीसिटी) कहा जाता है।

उदाहरण – कपास, धनिया आदि पादपों में पत्तियों का आकार किशोरावस्था व परिपक्व अवस्था में अलग-अलग होता है अर्थात प्रवस्था के अनुसार संरचना बदलती रहती है। विषमपर्णता सुघट्यता का एक उत्तम उदाहरण है।

परिवर्धन को प्रभावित करने वाले कारक

पौधों में परिवर्धन आन्तरिक व बाहरी कारको से नियंत्रित किया जाता है।

  • आन्तरिक कारक जैसे-आनुवांशिकता, कोशिकीय कारक, पादप वृद्धि नियामक रसायन आदि परिवर्धन को प्रभावित करने वाले कारक होते है।
  • बाह्य कारक जैसे- प्रकाश, ताप, जल, ऑक्सीजन, पोषक तत्वों की उपलब्धता आदि पौधों के परिवर्धन को प्रभावित करने वाले कारक होते है।

पादप वृद्धि नियामक :

पादप वृद्धि नियामक विविध रासायनिक संगठनो वाले साधारण व लघु अणु होते है, जैसे –

  1. इन्डोल समिक्षण – इंडोल -3 एसिटिक अम्ल (IAA)
  2. एडिनिन व्युत्पन्न -फरफ्यूराइल एमिनो काइटिन, केरॉटिनॉइड
  3. वसा अम्लों के व्युत्पन्न – एसिटिक एसिड (ABA)
  4. टर्पिन – जिवबेरेलिक एसिड (GA)
  5. गैसीय – एनिलिन (C2H4)

पादप वृद्धि नियामक को पादप हार्मोन भी कहा जाता है, इनको पौधे में क्रियाशीलता के आधार पर दो समूहों में विभाजित जा सकता है –

1. पादप वृद्धि हार्मोन :

ऐसे पादप वृद्धि नियामक जो पादप की वृद्धि को बढ़ाते है, पादप वृद्धि हार्मोन कहलाते है। जैसे – कोशिका विभाजन, कोशिका प्रसार, प्रतिमान संरचना, पुष्पन, फलीकरण, बीज निर्माण आदि को प्रेरित करते है। उदाहरण – ऑक्सिन, जिवबेरेलिस, साइटोकाइनिन इत्यादि।

2. पादप वृद्धि निरोधक हार्मोन :

ऐसे पादप हार्मोन जो पादप वृद्धि को अवरुद्ध करते है, पादप वृद्धि निरोधक हार्मोन कहलाते है। जैसे – पत्तियों का पीला पड़ जाना, पुष्पों व फलो का झड़ना, कोशिका विभाजन धीमा होना आदि क्रियाओं को प्रेरित करते है। उदाहरण – एसिसिक अम्ल इत्यादि।

पादप वृद्धि नियामकों का कार्यिकीय शरीर क्रियात्मक प्रभाव –

1. ऑक्सिन (auxins) –

ऑक्सिन शब्द की उत्पत्ति ग्रीक भाषा के auxins शब्द से हुई है जिसका अर्थ है – to grow । इन्हें सबसे पहले मानव मूत्र से अलग किया गया था। इन्डोल एसिटिक अम्ल व इसके समान गुण वाले सभी प्राकृतिक व कृत्रिम संश्लेषित पदार्थ को ऑक्सिन कहा जाता है।

ऑक्सिन के कार्यिकीय प्रभाव :

  • शीर्षस्थ प्रभावित – शीर्षस्थ कलिका की मौजूदगी में पाशर्व कलिकाओं की वृद्धि रुक जाती है, इसे शीर्षस्थ प्रभावित कहा जाता है। ऑक्सिन हार्मोन शीर्षस्थ प्रभाव प्रदर्शित करता है।
  • खरपतवार का उन्मूलन2,4 D (2,4 dichlaro phenory acetic acid) नामक ऑक्सिन का उपयोग खरपतवार को नष्ट करने में किया जाता है।
  • अनिषेक फलन को बढ़ावा -विभिन्न पादपों में ऑक्सिन हार्मोन अनिषेक फलन को बढ़ावा देता है जैसे – टमाटर, संतरा, निम्बू, केला इत्यादि।
  • ऑक्सिन फसलों के गिरने को रोकता है।
  • अपरिपक्व फलो को झड़ने से रोकता है।
  • ऑक्सिन पर्वो का लघुकरण करता है।
  • यह उत्तक संवर्धन में सहायक होता है।

2. जिवबेरेलिंस (gibberellins) –

याबुता तथा हायाशी ने इसे कवको से प्राप्त कर इसे जिवबेरेलींन नाम दिया। विभिन्न कवकों एवं उच्च पादपों में अब तक सौ से अधिक प्रकार के जिवबेरेलिन मिल चुके। इनको GA1 , GA2 , GA3 ………….. GA100 आदि नामो से जाना जाता है।

जिवबेरेलिंस के कार्यिकीय प्रभाव :

  • यह पर्व दीर्घन में मदद करता है।
  • बिजान्कुरण में सहायता करता है।
  • प्रसुप्ति भंग कर बीजों को सक्रीय करता है।
  • यह पुष्पन को प्रेरित करता है।
  • अनिषेक फलन में ऑक्सिन से अधिक उपयोगी है।

3. साइटोकाइनिंस (Cytokinins) –

लिथम व मिलर ने इस हार्मोन को मक्का से विमुक्त कर जिएटिन नाम रखा, बाद में लिथम में इसको साइटोकाइनिनन नाम दिया।

साइटोकाइनिंस के कार्यिकीय प्रभाव :

  • यह कोशिका विभाजन को प्रेरित करता है।
  • यह कोशिकाओं के दीर्घन को प्रेरित करता है।
  • यह कोशिका विभेदन में सहायता करता है।
  • यह शीर्षस्थ प्रभाव को कम करने में मदद है।
  • साइटोकाइनिन जीर्णता को स्थिगित करने में सक्षम है।

4. एथीलिन (ethylene) –

एथीलिन (इथाइलिन) एक प्रकार का प्राकृतिक गैसीय हार्मोन है। पौधों के लगभग सभी भागों में एथीलिन पाया जाता है।

एथीलिन के कार्यिकीय प्रभाव :

  • वृद्धि पर प्रभाव : यह लम्बाई में हो रही वृद्धि को रोककर मोटाई में वृद्धि करता है।
  • विलगन : यह जरावस्था, पत्तियों, फलो व पुष्पों के विलगन को तेज करता है।
  • पुष्पन पर प्रभाव : आम, अनानास आदि में पुष्पन को प्रेरित करता है परन्तु अधिकांश पादपों में पुष्पन को संदमित करता है।
  • लिंग परिवर्तन प्रभाव : यह मादा पुष्पों की संख्या में वृद्धि करता है, जबकि नर पुष्पों में कमी करता है।
  • यह फलो को पकाने में सहायता करता है।

5. एसिटिक अम्ल (abscisic acid) –

यह एक पादप की वृद्धि को अवरुद्ध करने वाला हार्मोन होता है।

कार्यिकी प्रभाव :

  • यह अनेक पादपों में जीर्णता को प्रेरित करता है।
  • यह रंध्रो को बंद करने में प्रभावी होता है।
  • कोशिका विभाजन एवं कोशिका परिवर्धन को अवरुद्ध करता है।
  • यह पत्तियों के विलगन को बढ़ावा देता है।
  • यह कलियों व बीजों की प्रसुता को बनाए रखता है।

दीप्तिकालिता (photoperiodism)

पुष्पन पर दीप्तकालिता के प्रभाव का अध्ययन सर्वप्रथम 1920 में दो अमेरिकी वैज्ञानिक गार्नर एलार्ड के द्वारा किया गया। उनके अनुसार पुष्पन को प्रभावित करने वाला क्रांतिक कारक प्रकाश काल की अवधि है।

दिन की वह लम्बाई जो पौधों में पुष्पन के लिए अनुकूल हो तथा दिन की आपेक्षिक लम्बाई अथवा आपेक्षिक दीप्तिकाल के प्रति पौधे की अनुक्रिया को दीप्तिकालिता कहा जाता है।

प्रकाश तथा अंधकार की अवधियों के अंतरालो के प्रति पौधों की अनुक्रिया को दीप्तिकालिता कहा जाता है।

दीप्तिकालिता अनुक्रिया के आधार पर पौधो के तीन प्रकार होते है –

1. अल्प दीप्तिकाली पादप / लघु दिवस पादप (short days plant – SDP) :

ऐसे पौधे जो एक निश्चित क्रान्तिक दीप्तिकाल से कम अवधि में प्रकाश उपलब्ध होने पर पुष्पन किया करते है। ऐसे पादपों को लघु दिवस पादप कहा जाता है। उदाहरण – डहेलिया आदि।

2. दीर्घ दीप्तिकाली पादप / दीर्घ दिवस पादप (long days plant – LDP) :

ऐसे पादप जिनमें पुष्पन के लिए क्रांतिक दीप्तिकाल से दीर्घ अवधि का दीप्तिकाल आवश्यक होता है, उन पादपों को दीर्घ दिवस पादप कहते है। उदाहरण – पालक, मूली, चुकंदर आदि।

3. दिवस उदासीन पादप :

वे पौधे जो लगभग सभी संभव दीप्तिकालो में पुष्पीकरण कर सकते है, ऐसे पादप दिवस उदासीन पादप कहलाते है। उदाहरण – टमाटर, ककड़ी व अन्य कुकर बिटेसी कुल के पादप।

बसंतीकरण (vernalization) :

कुछ पौधों में पुष्पन गुणात्मक व मात्रात्मक तौर पर कम तापक्रम में अनावृत होने पर आधारित होता है। इस विशेषता को ही बसंतीकरण कहा जाता है।

दूसरे शब्दों में – द्रुतशीतन उपचार द्वारा पुष्पन की योग्यता के उपार्जन को वसंतीकरण कहा जाता है। यदि पानी सोखे हुए बीजों या नावोद्भिद को निम्न ताप पर उपचारित किया जाता है तो इसके प्रभाव से उनकी वृद्धि त्वरित / तीव्र हो जाती है तथा उनमें पुष्पन भी तीव्र होने लगता है। वसंतीकरण का अध्ययन गेहूँ, चावल व कपास में किया गया है।