पुष्प

पौधों में पुष्प एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंग है। आकारकीय (Morphological) रूप से पुष्प एक रूपान्तरित प्ररोह (स्तम्भ) है जिस पर गाँठे तथा रूपान्तरित पुष्पी पत्तियाँ लगी हुई होती हैं। पुष्प प्रायः तने या शाखाओं के शीर्ष अथवा पत्ती के अक्ष (Axil) में उत्पन्न होकर प्रजनन (Reproduction) का काम करती है तथा फल एवं बीज का निर्माण करता है।

पुष्प एक डंठल द्वारा तने से जुड़ा होता है। इस डंठल को वृन्त या पेडिसेल (Pedicel) कहा जाता हैं। वृन्त के सिरे पर स्थित चपटे भाग को पुष्पासन या थेलामस (Thalamus) कहा जाता हैं। इसी पुष्पासन पर पुष्प के विविध पुष्पीय भाग (Floral Parts) एक विशेष प्रकार के चक्र (Cycle) में व्यवस्थित होते हैं।

पुष्प के मुख्य भाग एवं उनके कार्य :

पुष्पवृन्त (Pedicle) – यह पुष्प को पौधे से जोड़ने का कार्य करता है।

पुष्पासन (Thallmus) यह पुष्प के अन्य भागों को आधार प्रदान करता है।

बाह्य दलपुंज (Calyx) – यह पुष्प की कलिका अवस्था में आन्तरिक भागों की रक्षा करता है।

दलपुंज (Corolla) – यह परागकण हेतु कीटों एवं पक्षियों को आकर्षित करता है यह पुष्प का रंगीन भाग होता है।

पुंकेसर (नर जननांग) – इसके दो भाग होते हैं – 1. पुतन्तु (Filament), 2. परागकोष (Anther)। परागकोशों में परागकणों का निर्माण होता है। सभी पुंकेसर मिलकर पुमंग (Androecium) का निर्माण करते हैं।

जायांग (Gynoecium), स्त्रीकेसर (मादा जननांग) – यह एक या अनेक अण्डपों (Carple) से बना हुआ होता है। प्रत्येक अण्डप के तीन भाग होते हैं-

  1. अण्डाशय (Ovary) – यह पुष्पासन से लगा चौड़ा एवं फूला हुआ हिस्सा होता है जिसमें अनेक बीजाण्ड (Ovule) होते हैं। निषेचन के बाद अण्डाशय से फल का निर्माण होता है तथा बीजाण्ड से बीज का निर्माण होता है।
  2. वर्तिका (Style) – यह अण्डाशय के ऊपर लम्बा एवं पतला भाग होता है।
  3. वर्तिकाग्र (Stigma) – यह वर्तिका का सबसे ऊपर का चिपचिपा भाग होता है।

परागण (Pollination) – परागकणों का परागकोष से मुक्त होकर उसी जाति के पौधे के जायांग के वर्तिकाग्र तक पहुंचने की क्रिया को परागण कहते हैं।

फल का निर्माण:

फल का निर्माण अण्डाशय (Ovary) से ही होता है। परिपक्व अण्डाशय को ही फल (Fruit) कहते है। परिपक्व अण्डाशय की भित्ति फल-भित्ति (Pericarp) का निर्माण करती है। फल-भित्ति मोटी या पतली भी हो सकती है। मोटी फलभित्ति में प्रायः तीन स्तर होते हैं। बाहरी स्तर को बाह्य फलभित्ति (Epicarp), सबसे अन्दर के स्तर को अन्त:फलभिति (Endocarp) तथा मध्य स्तर को मध्य फलभिति (Mesocarp) कहते हैं।

फल के प्रकार-

फल के मुख्यतः दो प्रकार होते हैं-

1. सत्य फल (True Fruit):

यदि फल के बनने में केवल अण्डाशय ही भाग लेता है, तो उसे सत्य फल कहा जाता हैं। जैसे-आम।

2. असत्य फल (False fruit):

कभी-कभी अण्डाशय के साथ साथ पुष्प के अन्य भाग, जैसे-पुष्पासन, बाह्यदल इत्यादि भी फल बनने में भाग लेते हैं। ऐसे फलों को असत्य फल या कूट फल कहते हैं। जैसे- सेब (Apple) में पुष्पासन (Thalamus) फल बनाने में भाग लेता है।