पौधों में श्वसन

श्वसन एक जैविक प्रक्रिया है जिसमें वसा तथा शर्करा का ऑक्सीकरण किया जाता है तथा ऊर्जा का निष्कासन है। यह ऊर्जा शरीर के अनेक कार्यों को करने में मदद करती है। इस प्रक्रिया में ATP तथा CO2 का निष्कासन होता है। अतः वृहत रूप में श्वसन उन सभी प्रक्रियाओं का सम्मिलित रूप है, जिनके द्वारा शरीर में ऊर्जा उत्पन्न होती है।

श्वसन एक जैविक प्रक्रिया है जिसमें वसा तथा शर्करा का ऑक्सीकरण किया जाता है तथा ऊर्जा का निष्कासन है। यह ऊर्जा शरीर के अनेक कार्यों को करने में मदद करती है। इस प्रक्रिया में ATP तथा CO2 का निष्कासन होता है। अतः वृहत रूप में श्वसन उन सभी प्रक्रियाओं का सम्मिलित रूप है, जिनके द्वारा शरीर में ऊर्जा उत्पन्न होती है।

श्वसन वैसी क्रियाओं के सम्मिलित रूप को कहते हैं जिसमें बाहरी वातावरण से ऑक्सीजन लेकर शरीर की कोशिकाओं में पहुँचाया जाता है, जहाँ इसका प्रयोग कोशिकीय ईंधन (ग्लूकोज) का ऑक्सीकरण कई चरणों में विशिष्ट एन्जाइमों की उपस्थिति में करके जैव ऊर्जा (ATP) उत्पन्न की जाती है तथा इस क्रिया से उत्पन्न कार्बन डाइऑक्साइड को फिर कोशिकाओं से शरीर के बाहर निकाल दिया जाता है।

श्वसन-गैसों का आदान-प्रदान पौधों में शरीर की सतह द्वारा विसरण (Diffusion) क्रिया द्वारा किया जाता है। इसके लिए ऑक्सीजन युक्त वायुमंडल से पत्तियों के रंध्रों (stornatas), पुराने पेड़ों के तनों की कड़ी त्वचा (bark) पर स्थित वातरंध्रों (Lenticels) और अंतर कोशिकीय स्थानों (Intercellular spaces) द्वारा पौधों के अंदर घुसती है। पौधों की जड़ें मृदा के कणों के बीच के स्थानों में स्थित हवा से ऑक्सीजन ग्रहण करती है। जड़ों से निकले मूल रोम (Root hairs) जो एपिडर्मल कोशिकाओं से विकसित होती है, मिट्टी के कणों के बीच फैली रहती है। इन्हीं मूल रोमों की मदद से जड़ें ऑक्सीजन ग्रहण करती हैं तथा कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकाल देते हैं।

पौधों में श्वसन की क्रिया जन्तुओं के श्वसन से अलग होती है-

  • पौधों के हर एक भाग (अर्थात् जड़, तना एवं पत्तियों) में भिन्न-भिन्न श्वसन होता है।
  • जन्तुओं की तरह पौधों में श्वसन गैसों का परिवहन नहीं होता है।
  • पौधों में जन्तुओं की तुलना में श्वसन की गति धीमी हो जाती है।

श्वसन क्रिया में ग्लूकोज अणुओं का ऑक्सीकरण कोशिकाओं के अंदर होता है। इसीलिए इसे कोशिकीय श्वसन कहा जाता हैं। सम्पूर्ण कोशिकीय श्वसन को दो अवस्थाओं में विभाजित किया जाता है –

  1. अवायवीय श्वसन
  2. वायवीय श्वसन

1. अवायवीय श्वसन (Anaerobic respiration):-

यह श्वसन का पहला चरण है, जिसके अंदर ग्लूकोज का आंशिक विखण्डन ऑक्सीजन की मौजूदगी मे नहीं होता है। इस क्रिया द्वारा एक अणु ग्लूकोज से दो अणु पायरुवेट बनाते है। यह प्रक्रिया कोशिका द्रव्य (Cytoplasm) में होती है तथा इसका प्रत्येक चरण विशिष्ट एन्जाइम के द्वारा उत्प्रेरित होता है। इस क्रिया में चूंकि ग्लूकोज अणु का आंशिक विखण्डन होता है, अतः उसमें निहित ऊर्जा का बहुत छोटा भाग ही निकल पाता है। शेष ऊर्जा पायरुवेट (Pyruvate) के बंधनों में ही संचित रह जाती है। पायरुवेट के आगे की स्थिति तीन प्रकार की हो सकती है-

  • पायरुवेट ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में इथेनॉल एवं कार्बन डाइऑक्साइड में बदल जाता है। इस क्रिया को किण्वन (Fermentation) कहते है, जो यीस्ट (Yeast) में होता है।
  • ऑक्सीजन के अभाव में पेशियों में पायरुवेट से लैक्टिक अम्ल बनते है। पेशी कोशिकाओं में अधिक मात्रा में लैक्टिक अम्ल के संचय से दर्द होने लगता है। बहुत ज्यादा चलने या दौड़ने के पश्चात् मांसपेशियों में इसी कारण यह क्रैम्प (Cramp) होती है।
  • ऑक्सीजन की उपस्थिति में पायरुवेट का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है एवं CO2 तथा जल का निर्माण होता है।

2. वायवीय श्वसन (Aerobic respiration):-

श्वसन के प्रथम चरण में बना पायरुवेट पूर्ण ऑक्सीकरण करने के लिए माइटोकोण्ड्रिया में चला जाता है। यहाँ ऑक्सीजन की मौजूदगी में पायरुवेट का विखण्डन होता है। तीन कार्बन वाले पायरुवेट अणु विखंडित होकर कार्बन डाइऑक्साइड के तीन अणु बनाते हैं। इसके साथ-साथ जल तथा रासायनिक ऊर्जा भी निकलती है, जो ATP अणुओं में इक्कठी हो जाती है। ATP के विखण्डन से जो ऊर्जा मिलती है, उससे कोशिका के अंदर होने वाली विभिन्न जैव क्रियाएँ संचालित होती हैं।

श्वसन की क्रियाविधि –

ऑक्सी तथा अनॉक्सी श्वसन के 2 चरण होते है। ये चरण निम्नलिखित है –

ग्लाइकोलिसिस (Glycolysis) –

यह कोशिकीय श्वसन की सर्वप्रथम अवस्था होती है जो कोशिका द्रव में पायी जाती है। ग्लाइकोलोसिस में ग्लूकोज के कुछ अंशो का आक्सीकरण होता है, जिसके परिणामस्वरूप ग्लूकोज के एक अणु से पाइरूविक अम्ल के 2 अणु का निर्माण होता हैं तथा कुछ ऊर्जा बाहर निकलती होती है। यह क्रिया कई चरणों में पूरी होती है एवं सभी चरणों में एक विशिष्ठ इन्जाइम उत्प्रेरक का काम करता है। इस क्रिया को EMP पाथवे भी कहते है। इसमें ग्लूकोज में भंडारित ऊर्जा का 4 प्रतिशत भाग बाहर निकलकर एनएडीएच (NADH2) में चली जाती है तथा बाकी की 96 प्रतिशत ऊर्जा पाइरूविक अम्ल में एकत्रित हो जाती है। ग्लाइकोलिसिस की अभिक्रिया कोशिका द्रव्य में पूरी होती है। जबकि क्रेब्स चक्र या साइट्रिक एसिड चक्र माइटोकॉन्ड्रिया के मैट्रिक्स में पूरी होती है।

क्रेब चक्र (krabs cycle) –

क्रेब चक्र का प्रारम्भ सिट्रिक अम्ल के निर्माण होने से होता है। अत: इसे सिट्रिक अम्ल चक्र भी कहा जाता है, इस सम्पूर्ण चक्र में 6-कार्बन वाले सिट्रिक अम्ल में से 2-कार्बन परमाणु CO2 के रूप में बाहर निकलते है तथा ऑक्सेलोएसिटिक अम्ल का निर्माण होता है जो क्रेब चक्र का अन्तिम उत्पाद होता है। यह एसिटाइल CoA से मिलकर चक्र की निरन्तरता को बनाये रखता है।

ऑक्सी-श्वसन में कुल 36 ATP अणु का निर्माण करते है, क्रेब चक्र में ATP अणु बनते है। जिनका उपयोग अनेक कार्यो को करने के लिए ऊर्जा के रूप में किया जाता है। इस चक्र में बहुत सारे ऐसे मध्यवर्ती यौगिकों का भी निर्माण किया जाता है जिनका दूसरे जैव अणुओं के संश्लेषण में प्रयोग किया जाता है।

किण्वन (fermentation) –

किण्वन अधिकतर जीवाणु , कबको, यीस्ट व मांशपेशियों में ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होने वाली वह क्रिया है जिसके अंदर ग्लूकोज के अणु का पूर्ण ऑक्सीकरण नहीं होता है। जिसमे एल्कोहल अथवा कर्बोक्सिलिक अम्ल बनता है तथा CO2 बाहर निकलती है। किण्वन प्रक्रिया में निर्माण होने वाले उत्पाद के आधार पर किण्वन दो भागो में विभाजित किया जा सकता है –

  1. एल्कोहलीय किण्वन
  2. लेक्टिक अम्ल किण्वन

एल्कोहलीय किण्वन – यह क्रिया यीस्ट, उच्च पादपों व कवको में होती है। इस क्रिया के परिणामस्वरूप एथेनोल व CO2 बनते है।

लेक्टिक अम्ल किण्वन – यह क्रिया कुछ जीवाणुओं व मांशपेशियों में पायी जाती है, इस क्रिया में लेक्टिक अम्ल व CO2 बनते है। किण्वन क्रिया में ग्लूकोज के एक अणु से केवल 2 ATP ऊर्जा ही मिल सकती है।

श्वसन क्रिया को प्रभावित करने वाले कारक:

श्वसन क्रिया को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं-

1. प्रकाश (Light) –

श्वसन कार्य रात्रि में भी निरंतर चलता रहता है। इसके लिए प्रकाश की उपस्थिति आवश्यक नहीं है, किन्तु प्रकाश में प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया होने के कारण शर्कराओं का संश्लेषण होता है जिससे उनकी सान्द्रता बढ़ जाती है और श्वसन-प्रयुक्त पदार्थों (respiratory substrates) की मात्रा अत्यधिक होने से श्वसन दर बढ़ जाती है। अत: प्रकाश श्वसन को परोक्ष रूप से प्रभावित करता है।

2. कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) –

पर्यावरण में कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की सान्द्रता सामान्य रूप से ज्यादा होने पर श्वसन दर में कमी आ जाती है तथा बीजों का अंकुरण एवं वृद्धि दर कम हो जाते हैं। हीथ (Heath, 1950) ने सिद्ध किया कि कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) से पत्ती पर उपस्थित रन्ध्र (stomata) बन्द हो जाते हैं। इससे ऑक्सीजन (O2) पत्ती में प्रवेश नहीं करती जिससे श्वसन दर में कमी आ जाती है।

2. ऑक्सीजन (Oxygen) –

ऑक्सीजन (O2) की उपस्थिति तथा अनुपस्थिति पर श्वसन को 2 भागो में बांटा जाता है – ऑक्सी-श्वसन (aerobic respiration) तथा अनॉक्सी-श्वसन (anaerobic respiration)। वायु में 20.8% ऑक्सीजन (O2) पायी जाती है। पर्यावरण में ऑक्सीजन (O2) की मात्रा को एक निर्धारित सीमा में घटाने या बढ़ाने पर भी श्वसन क्रिया की दर पर कोई असर नहीं होता। वायु में ऑक्सीजन (O2) की मात्रा को लगभग 2% तक कम करने पर श्वसन क्रिया की दर में बहुत कमी आ जाती है। ऑक्सीजन की सान्द्रता ज्यादा कम हो जाने पर अनॉक्सी-श्वसन के कारण एथिल ऐल्कोहॉल (ethyl alcohol) और कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का निष्कासन अधिक मात्रा में होता हैं।

4. तापक्रम (Temperature) –

श्वसन क्रिया को प्रभावित करने वाले कारकों में तापक्रम सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। 0 से 30°C तक तापक्रम बढ़ने पर श्वसन क्रिया की दर में निरंतर वृद्धि होती रहती है। श्वसन क्रिया की सर्वाधिक दर 30°C पर होती है। 30°C से उच्च तापक्रमों पर शुरुआत में श्वसन दर में वृद्धि होती है, परन्तु शीघ्र ही दर घटती है। और तापक्रम जितना अधिक होगा उतनी ही अधिक प्रारम्भ में दर में वृद्धि होगी और उतनी ही शीघ्र तथा अधिक समय के साथ दर में कमी आती रहेगी। सम्भवतः ऐसा इसलिए होता है कि श्वसन क्रिया में कार्य करने वाले विकर (enzymes) ज्यादा तापक्रम पर विकृत (denatured) हो जाते हैं। 0°C से कम तापक्रम पर श्वसन दर बहुत कम हो जाती है इसीलिए फलों एवं बीजों को कम तापक्रम पर संरक्षित किया जाता है।

5. जल (Water) –

श्वसन की दर में भी कमी जल की कमी होने से आ जाती है। सूखे बीजों में (प्रायः 8% से 12% जल होता है) श्वसन बहुत कम होता है और बीज द्वारा जल का अन्तःशोषण (imbibition) करने पर श्वसन की दर में वृद्धि हो जाती है। गेहूँ के बीजों में जल की मात्रा 16% से 17% बढ़ने पर श्वसन दर में बहुत ज्यादा वृद्धि हो जाती है। यद्यपि जिन ऊतकों में पहले से ही जल की मात्रा ज्यादा होती है, उनमे जल की मात्रा के घटाने-बढ़ाने से श्वसन दर में ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता। बीज का जीवनकाल जल की मात्रा कम रहने से बढ़ता है। श्वसन विकरों (enzymes) के कार्य में जल आवश्यक होता है।

श्वसन गुणांक (Respiratory Quotient):-

श्वसन क्रिया में मुक्त हुई CO2 तथा अवशोषित की गयी CO2 के अनुपात को श्वसन गुणांक (RQ) कहते हैं।

श्वसन गुणांक (RQ) = निष्कासित CO2 का आयतन/अवशोषित O2 का आयतन।

शर्करा के लिए श्वसन गुणांक का मान 1 होता है। वसा या प्रोटीन के लिए श्वसन गुणांक का मान 1 से कम होता है। श्वसन गुणांक (RQ) का मापन गैनोंग श्वसनमापी (Ganong’s respirometer) द्वारा किया जाता है।