टेरीडोफाइटा (Pteridophyta)

टेरिडोफ़ाइटा फर्न किस्म के पौधे होते हैं। इनमें कुछ पौधे आज भी पाए जाते हैं, पर एक समय, 35 करोड़ वर्ष पूर्व, डिवोनी युग में इनका बाहुल्य और साम्राज्य था, जैसा इनके फाँसिलों से ज्ञात होता है और ये संसार के हर भाग में फैले हुए थे। कोयले के फॉसिलों में ये विशेषतः रूप से पाए जाते हैं। टेरिडोफाइटा ही कोयला क्षेत्र की उत्पत्ति के कारण हैं। ये कुछ सेंटीमीटर से लेकर 30 मीटर तक ऊँचे होते थे।

लगभग सात करोड़ वर्षों तक पृथ्वीतल पर इनका आधिपत्य रहा था। बाद में जलवायु के परिवर्तन से इनका पतन होना आरंभ हुआ और विशेषत: इनके बड़े-बड़े पेड़ अब बिलकुल लुप्त हो गए हैं। इनका स्थान क्रमश: विवृतबीज (gymnosperm) और आवृतबीज (angiosperm) कोटि के पौधों ने ले लिया है, पर आज भी छोटे कद के कुछ टेरिडोफाइटा पाए जाते हैं।

वनस्पतिज्ञों ने टेरिडोफाइटा को निम्न वर्गों में बांटा हैं –

साइलोफ़िटैलीज़ (Psilophytales) –

इसके फॉसिल मध्य और अध-डिवोनी युग की चट्टानों में पाए जाते हैं। इस वर्ग के पौधों में होर्निया (Hornea), रीमिया (Rhymia) तथा ऐस्टेरोजाइलोन (Asteroxylon) में पत्तियों के समान कुछ बनावटें होती हैं, जिनमें स्टोमैटा (stomata) भी होते थे।

साइलोटैलीज़ (Psylotales) और मेसिप्टेरिस (Tmesipteris) –

साइलोटम उष्ण कटिबंध, उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र और तदाई टापुओं में मिलता है। इसकी ऊंचाई 20 से लेकर 100 सेंमी. तक होती है और नम, या सूखे स्थानों में, छाया में पाया जाता है। मेसिप्टेरिस आस्ट्रेलिया, पूर्व इंडीज और फिलिपाइन के उत्तरी भाग में पाया जाता है। इसकी ऊंचाई पाँच से लेकर 25 सेंमी. तक होती है और बहुधा पेड़ों की शाखाओं पर उगता है। इसमें जड़ें नहीं होतीं, पर पत्तियों के आकार की बनावट शाखाओं पर लगी रहती है। जमीन के अंदर प्रकंद में मूलांग निकलते हैं। तने के ऊपरी भाग में बीजाणुधानी होती है, जिसमें बीजाणु (spores) पैदा होते हैं।

लाइकोपोडिएलीज (Lycopodiales) –

इसको क्लब मॉस भी कहते हैं। इनके केवल दो वंश, एक लाइकोपोडियम (Lycopodium) और सेलाजिनेला (Selaginella) तथा दूसरा फाइलोग्लोसम (Phylloglossum) और आइसोएटीज (Isoetes) हैं। लाइकोपोडियम की 100 जातियाँ मालूम हैं। ये उष्ण कटिबंध तथा उपोष्ण कटिबंध प्रदेशों में होती हैं। सूखे स्थानों में यह नहीं पाया जाता। फाइलोग्लोसम की केवल एक जाति ही आस्ट्रेलिया के कुछ भागों में पाई जाती है। ये जमीन पर फैलनेवाले कम ऊँचाई के पौधे हैं। इनकी पत्तियाँ सरल होती हैं और इनकी कोई शाखाएँ नहीं होतीं। तने या पत्तियों पर बीजाणुधानियाँ होती हैं।

सेलाजिनेलेलीज (Selaginellales) –

इनको छोटे क्लब मॉस भी कहते हैं। इसमें केवल एक वंश सेलाजिनेला है, जिसकी 500 जातियाँ समस्त संसार में फैली हुई हैं। ये उष्णकटिबंध प्रदेशों में छाएदार नम स्थानों पर पाई जाती हैं। ठंडे या सूखे स्थानों पर कम जातियाँ पाई गई हैं। ये देखने में सुंदर और कई रंगों में होते हैं तथा पादपगृहों (green houses) की शोभा बढ़ाती हैं। इनमें दो प्रकार की बीजाणुघानियाँ पायी जाती है।

लेपिडोडेंड्रैलीज (Lepidodendrales)-

इनके केवल फॉसिल मिले हैं। पुराजीवकल्प (Paleozoic cra) में इनका बाहुल्य था। संभवत: ये नीचे, गीले स्थानों पर पाए जाते थे और इनकी जड़ें पानी में डूबी रहती थीं। इनकी ऊंचाई नौ से लेकर 12 मीटर तक और एक से लेकर दो मीटर व्यास तक के होते थे। बड़े पेड़ों के अतिरिक्त इनके छोटे छोटे पौधे भी शामिल थे। इनके अनेक पौधों का अब तक अध्ययन किया गया।

प्ल्यूरोमिएलीज (Pleuromealis)-

यह ट्राइऐसिक काल (Triassic) में यूरोप और पूर्व एशिया का पौधा था। यह एक मीटर ऊँचा, 10 सेमी. चौड़ा था और इसके कोई शाखा नहीं होती थी। तने का निचला भाग चार या आठ भागों में विभाजित होकर जड़ों का काम करता था। यह हेटेरोस्पोरस (heterosporus) होता था। पत्तियों के निचले भाग पर, या उसके बराबर में, बीजाणुधानी होती थी।

आइसोएटेलीज (Isoetales) –

इसके पौधे शाकीय होते हैं और पानी में ठंडे जलवायुवाले स्थानों में अधिकता से उगते हैं। कुछ जमीन पर भी उगते हैं। इस श्रेणी के आइसोएटीज की 100 जातियाँ मालूम हैं, जिनमें 50 जातियों में गुच्छे होते हैं। बीजाणुधानी हेटेरोस्पोरस होती है।

हिएनिएलीज (Hyeniales) –

इस जाति के पौधे डिवोनी युग में पाए जाते थे। इनके तने पर युग्मभुजी उपबंध (dichotomous appendages) पत्तियों के समान लगे रहते थे।

फिलिकेलीज (Filicales) –

फिलिकेलीज (Filicales) या फर्न आज भी अस्तित्व में हैं। इनके फॉसिल भी पुराजीवकल्प से पाए जाते हैं। इनकी पत्तियों का आकर तने से बड़ा होता हैं। पत्तियों का अपेक्षया बड़ा होना और अकेले या समूह में पत्तियों पर अनेक बीजाणुधानियों का होना, इनकी विशेषता है। फर्न के लगभग 150 वंश और 6,000 जातियाँ मालूम हैं। कुछ छोटे होते हैं और कुछ पेड़ सदृश हो जाते हैं, पर बहुत बड़े नहीं होते। केवल इनके फॉसिल से ही बड़े पेड़ होने का पता लगता है। कुछ फर्न उत्तरी ध्रुवीय प्रदेशों में पाए जाते हैं, पर जैसे जैसे उष्ण कटिबंधीय प्रदेशों की ओर बढ़ते है, इनकी संख्या बढ़ती जाती है। अधिकांश छाया में उपजते हैं। कुछ जलीय होते हैं, पर कुछ सूखेपन को भी सहन कर सकते हैं। ये समवीजाणु (homosporous) पौधे होते हैं। कहा जाता है, ये पौधे पुराजीवकल्प के थे। पर कुछ ऐसे फॉसिल मिले हैं जिनसे पता चलता है कि ऐसे बीज वाले भी पौधे थे जो अब लुप्त हो गए हैं।