पादपों में लैंगिक जनन

पौधे अपने युग्मकों (Gametes) के द्वारा नए पौधे को जन्म देते है, इस क्रिया लैंगिक प्रजनन कहा जाता है। पादपों में भी नर और मादा जनन अंग पाए जाते हैं। पौधों के ये जनन अंग पुष्पों और फलों के अंदर पाए जाने वाले बीजों में पाये जाते हैं। ये लैंगिक प्रजनन पद्धति द्वारा प्रजनन किया करते हैं इसलिए ऐसे पौधों को पुष्पीय पौधे या आवृत्तबीजी (Angiosperms) कहा जाता हैं।

अधिकतर पौधों में ही नर और मादा प्रजनन अंग मौजूद हैं। ऐसे पुष्प नर और मादा युग्मकका निर्माण करके निषेचन की प्रक्रिया को सुनिश्चित करते हैं जिससे पौधे के प्रजनन के लिए नए बीज का निर्माण हो सकें। पादपों में जनन के लिए दो अंग होते हैं –

1. स्त्रीकेसर –

स्त्रीकेसर एक मादा जननांग है जो अण्डप भी कहलाता हैं। यह तीन प्रकार का होता है – अण्डाशय, वर्तिकाग्र, वर्तिका। यह पुष्प के केंद्र में पाया जाता है। वर्तिकाग्र द्वारा परागकणों को ग्रहण कर लेता है तथा वर्तिका से होते हुए ये परागकण अण्डाशय तक पहुँचते हैं।

2. पुंकेसर –

पुंकेसर एक प्रकार का नर जननांग है। इसी में परागकण का निर्माण होता है तथा इसी में ये परिपक्व होते है। पूर्ण परिपक्वता के बाद परागकण का आवरण फट जाता है तथा परागकर बाहर निकल जाते है। परागकण जिस आवरण के द्वारा ढके हुए होते हैं उसे परागकोश कहा जाता हैं। हवा या पानी या जीवों के माध्यम से पादपों तक पहुंच कर उनका निषेचन करते हैं। इसके अलावा पुष्पधर, बाह्यदल व पंखुड़ियाँ पुष्प के अन्य भाग हैं। सभी पुष्प का आकार एक समान नहीं होता है तथा इनकी प्रवृति में भी भिन्नता होती है।

एकलिंगी पुष्प -कुछ पादप या पुष्प ऐसे भी होते हैं, जिनमें नर या मादा जननांग दोनों में से कोई एक ही जननांग पाया जाता है, उन्हें एकलिंगी पुष्प कहते है।

द्विलिंगी पुष्प – ऐसे पादप जिनमें नर जननांग व मादा जननांग दोनों ही पाए जाते हैं, उन्हें द्विलिंगी पुष्प कहा जाता है।

पादपों में लैंगिक प्रजनन की विधियां –

परागण –

जब परागकण पुंकेसर से अंडप के स्टिग्मा में प्रवेश करता है, तो इसे परागण कहा जाता हैं। यह अति आवश्यक होता है क्योंकि परागण के कारण ही नर युग्मक मादा युग्मकों के साथ मिल पाता है। परागण मधुमक्खियों, तितलियों और पक्षियों जैसे कीटों, हवा और पानी के द्वारा होता है।

परागण के 2 प्रकार होते हैं–

स्व–परागण (Self-Pollination) – जब एक पौधे के परागकण उसी पौधे के स्टिग्मा तक ले जाए जाते हैं, तो इसे स्व–परागण (Self-Pollination) कहा जाता हैं।

संकर–परागण (Cross-Pollination) – जब एक पौधे के परागकण को उसी के जैसे दूसरे पौधे के स्टिग्मा तक ले जाया जाता है, तो उसे संकर–परागण (Cross-Pollination) कहा जाता हैं।

परागण में कीट सहायता करते हैं। जब कोई कीट एक पौधे के परागण पर बैठता है तो उसका परागकण उसके शरीर से चिपक जाता है। तथा जब यह कीट उड़कर किसी दूसरे पौधे पर जा कर बैठ जाता है, तब परागकण एक जगह से दूसरी जगह पहुँच जाते हैं और दूसरे पौधे के स्टिग्मा से चिपक जाते हैं। इस प्रकार कीट संकर-परागण (Cross-Pollination) में सहायता करते हैं। हवा भी संकर-परागण (Cross-Pollination) में सहायक होती है।

निषेचन –

निषेचन में, बीजाणु में मौजूद मादा युग्मकों से परागकणों में मौजूद नर युग्मक मिलते हैं। जब परागकण स्टिग्मा पर गिरकर फट जाते हैं तथा खुलकर विकसित पराग नली में चले जाते हैं। यह पराग नली वर्तिका से होकर अंडाशय की तरफ बढ़ती है और बीजाणु में प्रवेश करती है। नर युग्मक पराग नली में जाते हैं। पराग नली का ऊपरी सिरा फटता है, तथा बीजाणु में खुल जाता है जिससे नर युग्मक बाहर निकल आते हैं। बीजाणु में, नर युग्मक मादा युग्मक के केंद्रक से मिलते हैं और निषेचित अंडे का निर्माण होता हैं। इस निषेचित अंडे को युग्मनज (Zygote) कहा जाता है।

फलों और बीजों का बनना

बीजाणु में, निषेचित अंडे का विभाजन अनेक बार होता है तथा भ्रूण का निर्माण करता है। बीजाणु के चारो तरफ कठोर परत का निर्माण है और धीरे-धीरे इसका बीज में विकास हो जाता है। पुष्प का अंडाशय विकसित होकर फल का रूप धारण कर लेता है, जिसके भीतर बीज पाए हैं। फूलों के अन्य हिस्से (जैसे बाह्यदल, पुंकेसर, स्टिग्मा और वर्तिका) सूखकर निचे गिर जाते हैं। फूलों की जगह फल ले लेते हैं। बीजों की रक्षा फल करते हैं। कुछ फल मुलायम और रसीले होते हैं, जबकि कुछ सूखे और कठोर होते हैं।

बीज एक पौधे की प्रजनन इकाई होता है। इस बीज से ही नए पौधे का विकास हो सकता हैं, क्योंकि बीज अपने भीतर नवीन पौधे और उसके लिए भोजन ग्रहण करके रखता है। बीज में नवीन पौधे का हिस्सा, जो पत्तियों का रूप लेता है, उसे प्लूम्यूल (Plumule) कहा जाता है। जड़ों के रूप में विकसित होने वाले हिस्से को मूलांकुर (Radicle) कहा जाता है। शिशु पौधे के लिए भोजन संरक्षित करके रखने वाले बीज के हिस्से को बीजपत्र (Cotyledon) कहा जाता हैं। बीज के भीतर रहने वाला शिशु पौधा निष्क्रिय अवस्था में रहता है। जब हम उसे उपयुक्त वातावरण जैसे (पानी, हवा, रोशनी आदि) देते हैं, तभी उसका अंकुरण होता है और एक नये पौधे का निर्माण होता है। उदाहरण – मक्का, गेहूं, चना, सेम आदि।

बीजों का अंकुरण

पौधे से मिला बीज निष्क्रिए एवं सूखी अवस्था में रहता है। जब उन्हें पानी, हवा, मिट्टी आदि प्राप्त होती है, तभी उनका विकास नए पौधो के रूप में होना शुरू होता है। एक बीज के विकास की शुरुआत को बीजों का अंकुरण कहा जाता है।

बीजों का अंकुरण होना तब शुरु होता है, जब बीज पानी को सोखता है, फूलता है और बीजावरण (Seed Coat) को तोड़कर फट जाता है। पानी की मदद से बीजों में एंजाइम कार्य करना आरम्भ करते हैं। एंजाइम संचयित भोजन को पचने का काम हैं और उसे घुलने योग्य बना देते हैं। घुलनशील भोजन की मदद से मूलांकुर (Radicle) और प्लूम्यूल (Plumule)का विकास होता है।