अम्ल तथा क्षार की विभिन्न संकल्पनाएँ

आरेनियस संकल्पना ( Arhenius Theory )

अम्ल व क्षार की परिभाषा सर्वप्रथम 1887 ई. में आरेनियस ने इस प्रकार दी ‘ जो पदार्थ जलीय विलयन में अपघटित होकर हाइड्रोजन आयन ( H+ ) प्रदान करते है उन्हें अम्ल कहा जाता है। तथा जो पदार्थ जलीय विलयन में अपघटित होकर हाइड्रॉक्सिल आयन देते है, क्षार कहलाते है।

अम्ल के उदाहरण

  • HCL (aq) हाइड्रोक्लोरिक अम्ल ⟶H+(aq) + Cl(aq)
  • HNO3(aq) नाइट्रिक अम्ल ⟶ H+(aq) + NO3(aq)
  • H2SO4(aq) सल्फ्यूरिक अम्ल ⟶ 2H+(aq) + SO24(aq)
  • CH3COOH4(aq) एसीटिक अम्ल ⟶ H+(aq) + CH3COO4(aq)
  • H2CO3(aq) कार्बोनिक अम्ल ⟶ H+(aq) + HCO3(aq)

ये सभी अम्ल प्रवर्ति के होते है क्योंकि जलीय विलयन में H+ आयन देते है । यहाँ मुक्त प्रोटॉन यानि हाइड्रोजन आयन ( H+ ) अत्यधिक क्रियाशील होता है अतः जल से क्रिया करके हाइड्रोनियम आयन ( H3O+ ) (aq) के रूप में रहता है ।

H+ + H2O ⟶ H3O+(aq)

कुछ अम्ल जलीय विलयन में पूर्णतया आयनित हो जाते हैं ऐसे अम्ल को प्रबल अम्ल कहा जाता हैं । जैसे – HCl (हाइड्रोक्लोरिक अम्ल), H2SO4 (सल्फ्यूरिक अम्ल), HNO3 (नाइट्रिक अम्ल) आदि । कुछ अम्ल जलीय विलयन में पूर्णतया आयनित नहीं होते है , अवियोजित अवस्था में भी कुछ मात्रा में उपस्थित होते है। इन्हें दुर्बल अम्ल कहते है । जैसे – CH3COOH (एसीटिक अम्ल) , H2CO3 (कार्बोनिक अम्ल) आदि ।

अम्ल क्षार की ब्रांस्टेड – लोरी संकल्पना ( Bransted Lowry Concept Of Acids And Bases )

अम्लों एवं क्षारों की यह परिभाषा डेनिश रसायनज्ञ जोहान्स ब्रांस्टेड ( 1874 – 1936 ) तथा अंग्रेज रसायनज्ञ थामस एम. लोरी ( 1874 – 1936 ) ने दी । ब्रांस्टेड – लोरी के अनुसार ‘अम्ल प्रोटॉन दाता होते है तथा क्षार प्रोटॉन ग्राही होते है ।’ यहाँ उन्होंने संयुग्मी अम्ल एवं संयुग्मी क्षारक की परिभाषा दी ।

HA अम्ल + B क्षारक ⟶ A संयुग्मी क्षार + HB+ संयुग्मी अम्ल
HA – A को अम्ल संयुग्मी क्षार युग्म तथा ( B – HB+ ) को क्षार – संयुग्मी अम्ल युग्म कहा जाता है ।

उदाहरण

H2O + NH3(aq) अमोनिया ⟶ NH+4(aq) + OH(aq)

यहाँ जल (H2O) प्रोटॉन देता है अतः अम्ल है , यह प्रोटॉन देकर संगत क्षार ( OH ) जिसे कि संयुग्मी क्षार कहते है , में बदल जाता है । अमोनिया ( NH3 ) प्रोटॉन ग्राही है , अतः क्षार है और यह प्रोटॉन लेकर संगत अम्ल ( NH+4 ) अमोनियम आयन जिसे कि संयुग्मी अम्ल भी कहते है , में परिवर्तित हो जाता है। इन ( NH3 – NH+4 ) तथा ( H2O – OH) को संयुग्मी अम्ल – क्षार युग्म कहा जाता है । ये केवल एक प्रोटॉन या H+ आयन की उपस्थिति के अंतर के कारण ही बनते है । एक अन्य उदाहरण हैं –

HCL(aq) + H2O ⟶ Cl(aq) + H3O(aq)

ये संकल्पना अप्रोटिक अम्लों एवं क्षारों जैसे CO2 ( कार्बन डाइऑक्सीड ), SO2 (सल्फर डाइऑक्सइड ) आदि के बारे में कुछ भी साफ़ नहीं बताती है। अतः इलेक्ट्रॉन के आधार पर अम्ल क्षार की नई संकल्पना दी गई ।

अम्ल – क्षार की लुईस संकल्पना ( Lewis Concept Of Acids And Bases )

सन् 1923 में लुईस के अनुसार ‘ अम्ल वे पदार्थ है जो इलैक्ट्रॉन युग्म ग्रहण करते है तथा क्षार वे पदार्थ होते है जो इलेक्ट्रॉन युग्म छोड़ते है ’। अर्थात् इलेक्ट्रॉन युग्म ग्राही अम्ल तथा इलेक्ट्रॉन युग्म दाता क्षार कहलाते है । जैसे –

BF3 बोरॉन ट्राइफ्लोराइड अम्ल + NH3 क्षार → F3B ← NH3

इसके अनुसार लुइस क्षार इलेक्ट्रॉन देते है तथा लुईस अम्ल इलेक्ट्रॉन लेकर यौगिक का निर्माण कर लेते हैं , यहाँ दोनों परस्पर उपसहसंयोजक बंध द्वारा जुड़े हैं ।

इस संकल्पना के अनुसार इलेक्ट्रॉन की कमी वाले यौगिक अम्ल का कार्य करेंगे इन्हें लुईस अम्ल कहा जाता है। साधारणतया धनायन , या वे यौगिक जिनका अष्टक अपूर्ण होता है लुईस अम्ल कहलाते है । उदाहरण – BF3 ( बोरॉन ट्राइफ्लोराइड अम्ल ) , AlCl3 (एलुमिनियम क्लोराइड), Mg+2 (मैग्नीशियम हाईड्रॉक्साइड ), Na+ (सोडियम क्लोराइड) आदि ।

इलेक्ट्रॉन धनी या इलेक्ट्रॉन का एकाकी युग्म रखने वाले यौगिक क्षार का कार्य करते है , इन्हें लुईस क्षार कहते है ।

इस प्रकार अम्ल एवं क्षार केवल H+ या OH युक्त पदार्थ ही नहीं होते है । इन संकल्पनाओं के आधार पर हाइड्रोजन रहित पदार्थों के अम्लीय व क्षारीय गुणों की व्याख्या भी की जा सकती है ।