बोर का परमाणु मॉडल

बोर का पूरा नाम था- नील्स हेनरिक डेविड बोर है। इनका जन्म 1885 को डेनमार्क में हुआ। सन् 1913 में बोर द्वारा परमाणु मॉडल पेश किया गया। नील्स बोर द्वारा रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल में कुछ तथ्यों की कमियों का अंदाजा लगाया गया तथा प्लांक के क्वाण्टम सिद्धांत की मदद लेते हुए बोर ने अपना एक मॉडल बनाया किया। यह मॉडल नील्स बोर द्वारा परमाणु के सम्बन्ध में बनाया गया था। इसे रदरफोर्ड-बोर मॉडल भी कहते है, क्योंकि इसका निर्माण रदरफोर्ड के परमाणु मॉडल में कुछ स्थितियों में सुधार व नवीनीकरण करके किया गया था, अतः काफी हद तक रदरफोर्ड के मॉडल के समान था।

बोर के इस मॉडल के अनुसार यह बात सिद्ध की गयी थी कि इलेक्ट्रॉन द्वारा नाभिक के बाहरी ओर लगातार तेज गति से चक्कर लगाये जाते हैं। इसके लिए इलेक्ट्रॉन को ऊर्जा या बल की जरूरत पड़ती है। इसे अपकेंद्रिय बल कहा जाता हैं। जब विद्युत के ऋण आवेश युक्त इलेक्ट्रॉन का नाभिक के चक्कर लगाने से इसमें मौजूद धन आवेश वाले प्रोटॉन के कारण इनके मध्य आकर्षण बल उत्पन्न होता है। यह आकर्षण बल ही इलेक्ट्रॉन को अपकेंद्रिय बल देने में मदद करता है। इसके कारण ही इनमे गति करने की ऊर्जा बनी रहती है। अतः बोर के परमाणु मॉडल के परिणामस्वरूप यह बात स्पष्ट होती है कि इलेक्ट्रॉन को अपकेंद्रिय बल नाभिक में स्थित प्रोटॉन के होने से प्राप्त होता है।

बोर ने अपने मॉडल में इस बात को बी सिद्ध किया कि परमाणु के भीतर मौजूद नाभिक के बाहृ भाग में अलग-अलग स्तर (कक्षा या कक्ष) सृजित हुए होते हैं, जिनमे इलेक्ट्रॉन वृत्ताकार गति करते हैं। इन अलग-अलग स्तरों पर ऊर्जा का स्तर भी भिन्न होता है अर्थात् जो स्तर या कक्ष नाभिक के ज्यादा पास होगा, उसमे उतनी ही काम ऊर्जा होगी। जैसे-जैसे इन कक्षों की स्थिति नाभिक से दूर होती जाती है, वैसे-वैसे इनमे ऊर्जा का स्तर बढ़ता जाता है। परमाणु में किसी कारण से यदि ऊर्जा में बदलाव होता है, तो इलेक्ट्रॉन द्वारा भी कक्षों या ऊर्जा स्तरों में बदलाव होने लगता है। जब परमाणु के भीतर इलेक्ट्रॉन अपने एक ही कक्ष में स्थायी रूप से गतिमान रहता है तो इसे आद्य अवस्था कहते है।

जब ऊर्जा स्तर में बदलाव के कारण इलेक्ट्रॉन एक कक्ष की त्यागकर दूसरे कक्ष में पहुँच जाता है तो इसे इलेक्ट्रॉन की उत्तेजित अवस्था कहा जाता है। इलेक्ट्रॉन द्वारा गति करते वक्त इन कक्षों के कारण ऊर्जा का निर्धारण होता है, जिससे इलेक्ट्रॉन में तीव्रता पैदा होती है। इसी वजह से विकिरण को उत्सर्जित नही कर पाते। इस बिंदु ने रदरफोर्ड के मॉडल की कमी को दूर कर दिया, क्योंकि यहाँ यह बात सिद्ध हुई कि विकिरण का उत्सर्जन न होने के कारण इलेक्ट्रॉन नाभिक के भीतर नही गिर सकते।

कमियाँ-

  • परमाणु में इलेक्ट्रॉन द्वारा गतिशील रहने के दौरान उनमे मौजूद ऊर्जा का स्तर कम व ज्यादा होता है। इससे इलेक्ट्रॉन द्वारा अपने कक्षों में भी बदलाव किया जाता है। इस कारण स्पेक्ट्रम रेखाओं का सृजन होता है।
  • चुम्बकीय प्रभाव वाले क्षेत्र में इन स्पेक्ट्रम रेखाओं में विभाजित होता है, इससे पड़ने वाला प्रभाव “ज़ीमान प्रभाव” कहलाता है।
  • विद्युत प्रभावी क्षेत्र में स्पेक्ट्रम रेखाओं में विभाजन होने की क्रिया से पड़ने वाले प्रभाव को “स्टॉर्क प्रभाव” कहते हैं।
  • बोर द्वारा प्रस्तुत किये गए मॉडल में ज़ीमान प्रभाव व स्टॉर्क प्रभाव दोनों का स्पष्टीकरण नही किया गया।

निष्कर्ष-

बोर द्वारा अपना परमाणु मॉडल प्रस्तुत होने से पहले ही परमाणु की संरचना के सम्बन्ध में बहुत से तथ्य सिद्ध हो चुके थे, जैसे- परमाणु का विभाजन नही किया जा सकता, परमाणु के केन्द्र में नाभिक (केन्द्रक) पाया जाता है व परमाणु कई छोटे-छोटे कणों से मिलकर बनता है। इनमे से कुछ धनावेशित, ऋणावेशित व उदासीन प्रकृति के होते हैं।

बोर द्वारा रदरफोर्ड के मॉडल को उच्च स्तर पर ले जाकर उसमे नई खोजों के तथ्यों को जोड़ा गया व परमाणु सरंचना सम्बन्धी कुछ नियमों से ज्ञात करवाया गया। कुछ कमियों के अलावा बोर का मॉडल काफी सफल रहा।