तत्वों का वर्गीकरण

सन् 1803 ईं. में डाल्टन (Dalton) नामक रसायनज्ञ ने सापेक्ष परमाणु भारों जिसको आजकल परमाणु द्रव्यमानों के रूप में माना जाता है , की एक सारणी को परिभाषित किया था। इस सारणी ने तत्वों के वर्गीकरण के लिए एक महत्वपूर्ण नीव का कार्य किया। तत्वों के वर्गीकरण की दिशा में प्राउट (Prout 1815 ई.), डॉबेराइनर (Dobereiner 1829 ईं.) हैं ड्यूमा (Duma 1853 ईं.), न्यूलैंण्ड (Newland 1864 ई.), लोथर मेयर (Lothar Mayer, 1839 ई.) मेंडेलीफ (Mendeleef, 1869 ई.), बोर (Bohr 1913) आदि वैज्ञानिको का योगदान अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं।

तत्वों को वर्गीकृत करने के सन्दर्भ में किए ‘गए पूर्व प्रयासों का विवरण निम्न है-

धातु तथा अधातु में विभाजन –

शुरुआत में, तत्वों को उनके गुणधर्मों के आधार पर धातु (metal) तथा अधातु (non-metal) में बांटा गया। बाद में कुछ ऐसे तत्वों की खोज हुई, जिनके गुण धातु तथा अधातु दोनों के एक समान थे। तत्वों को ध्त्वान या उपधातु (metalloids) नाम दिया गया। आगे चलकर इस वर्गीकरण को अमान्य मान लिया गया, क्योकि यह तत्वों के मौलिक गुणों पर आधारित नहीं था।

प्राउट की परिकल्पना –

विलियम प्राउट ने 1815 ईं. में यह अनुमान लगाया की कि सभी तत्वों के परमाणु, हाइड्रोजन परमाणुओं के सिर्फ संगठन मात्र हैं तथा सभी तत्वों के परमाणु भार, हाइड्रोजन के परमाणु भार के सरल गुणक होते है, क्यूंकि हाइड्रोजन का परमाणु भार एक मान लिया गया है, अत: नाइट्रोजन के परमाणु भार 14 का मतलब यह है कि नाइट्रोजन का निर्माण एक परमाणु हाइड्रोजन के 14 परमाणुओं से मिलकर हुआ है तथा इस आधार पर किसी तत्व का परमाणु भार हाइड्रोजन के परमाणु भार का सरल गुणक होता है। प्राउट की यह परिकल्पना गलत साबित हुईं, क्योकि कुछ तत्व ऐसे भी थे जिनके परमाणु भार सरल पूर्णांक न होकर दशमलव में थे, जैसे-क्लोरीन का परमाणु भार 35 . 5 हैं।

डॉबेराइनर के त्रिक समूह –

1829 ई० में जर्मन वैज्ञानिक डॉबेराइनर ने करीबन समान गुणधर्म वाले अनेक तत्वों को तीन – तीन के समूहों में उनके परमाणु भार में वृद्धि के क्रमानुसार विभाजित कर दिया तथा यह स्पष्ट किया कि प्रत्येक समूह के बीच वाले तत्व का परमाणु भार प्रथम एवं तृतीय तत्वों के परमाणु भारों के योग का लगभग मध्यमान होता हैँ। यह डॉबेराइनर का त्रिक नियम तथा इस प्रकार के समूह त्रिक (triad) कहलाते है। जैसे – लिथियम (Li), सोडियम (Na) एवं पोटेशियम (K)।

न्यूलैण्ड का अष्टक नियम (Newland’s Law of Octaves) –

सन् 1884 ई० में रसायन न्यूलैण्ड ने यह स्पष्ट किया कि यदि तत्वों को उनके परमाणु भार के बढते हुए क्रम में व्यवस्थित किया जाए तो किसी तत्व से सात तत्व छोड़कर आठवाँ तत्व पहले तत्व से गुणों के समान होता है। यह समानता ठीक उसी प्रकार की होती है, जैसे संगीत में आठवाँ तथा पहला स्वर ध्वनि में समान होते हैं। इसे न्यूलैंण्ड का अष्टक नियम कहा जाता हैं।

Li (लिथ़ियम), Na (सोडियम) तथा K (पोटेशियम) के गुणों में समानता होती है। इसी प्रकार Be (बेरिलियम), Mg (मेग्नीशियन) व Ca (कैल्शियम) के गुणों में , B (बोरोन) व AI (एल्युमिनियम) के गुणों में, C (कार्बन) व Si (सिलिकॉन) के गुणों में, N (नाइट्रोज़न) व P (फास्फोरस) तथा O (ऑक्सीजन) व S (सल्फर) के गुणों में भी समानता पाई जाती है।

यह नियम भी तत्वों के वर्गीकरण के लिए सफल न हो सका, क्योंकि Ca (कैल्शियम) के बाद वाले तत्व इसका पालन नहीं करते।

लोथर मेयर वक्र –

1869 ई. में लोथर मेयर ने तत्वों के भारों तथा परमाणु आयतनों (atomic volumes) के बीच एक लेखाचित्र बनाया, जिसे लोथर मेयर वक्र कहा जाता हैं। इस वक्र के अनुसार तत्वों के गुण सामान्यत: उनके परमाणु भारों के आवर्त फलन हैं। इस वक्र पर समान गुण वाले तत्वों ने एक ही स्थिति में स्थान प्राप्त किया। उदाहरण –

  • शीर्ष पर प्रबल विद्युत् धनी तत्व क्षार धातु उपस्थित हैं।
  • आरोही भाग पर प्रबल विद्युत् ऋणी तत्व हैलोजेन उपस्थित हैं।
  • अवरोही भाग पर क्षारीय मृदा तत्व मौजूद हैं।
  • अष्टम समूह के तत्व वक्र के निचले भाग पर स्थित हैं।

मेंडलीफ की आवर्त सारणी तथा आवर्त नियम :

प्रोफेसर डिमिट्री इवानोविच मेंडलीफ (Dmitri Ivanovich Mendeleef) एक रूसी वैज्ञानिक ने तत्वों के परमाणु द्रव्यमानों तथा उनके भौतिक व रासायनिक गुपाधर्मो के बीच एक सम्बन्ध का भली भांति अध्ययन किया गया उनके काल में कुल 63 तत्व ज्ञात थे। मेंडलीफ ने उस समय ज्ञात तत्वों को उनके समान परमाणु द्रव्यमानों के आधार पर व्यवस्थित किया।

दूसरे शब्दों में, मेण्डलीफ ने तत्वों के उनके द्वारा निर्मित यौगिकों के सूत्र में समानताओं के आधार पर व्यवस्थित किया (उदाहरण – आक्साइड, हाइड्राइड आदि)। यह प्रेक्षित किया गया कि अधिकार तत्वों को उनके बढते हुए परमाणु द्रव्यमानों (जो उस समय परमाणु भार कहलाते थे) के क्रम में आवर्त सारणी मेँ रखा जाए तथा यह पाया गया कि आवर्ती पुनरावृति अथवा आवर्तिता प्रदर्शित होती है अर्थात प्रत्येक आठवें तत्व के गुणधर्म प्रथम तत्व के गुण धर्म के समान होते है।

तत्वों के भौतिक एवं रासायनिक गुणधर्म उनके परमाणु भारों ( परमाणु द्र्व्यमानो) के आवर्ती फलन होते हैं। इस आवर्त सारणी में उर्ध्वाधर स्तम्भ (समूह) तथा क्षैतिज कतारें (आवर्त) होती थी। मैण्डेलीफ की सारणी में यद्यपि सभी तत्वों को उनके बढ़ते हुए परमाणु द्रव्यमानों के क्रम में व्यवस्थित किया गया परन्तु कुछ तत्वों के युग्मों को उनके परमाणु द्रव्यमानों के व्युत्क्रम में व्यवस्थित किया गया। उदाहरण – कोबाल्ट (परमाणु द्रव्यमान 58.98) तथा निकिल (58. 7) टेल्यूरियम (127. 6) और आयोडीन 126.90)।

आवर्त सारणी मेँ इस व्युत्क्रमण को तत्व के रासायनिक गुणधर्मों की उस समूह के तत्वों के साथ समानताओं के कारण किया गया जिसमें उस तत्व को व्यवस्थित किया गया था। उदाहरण – टेल्यूरियम (Te) को आयोडीन से पहले रखा गया, जबकि Te का उच्च परमाणु द्रव्यमान हैं। ऐसा करने का कारण यह था की आयोडीन के गुणधर्म ब्रोमीन के गुणधर्म के समान है, न कि सेलेनियम (Se) के गुणधर्म के समान। इस सारणी में छोड़े गए खाली स्थानों को भरने के लिए भविष्य में खोजे जाने वाले तत्वों के गुणधर्मों की भविष्यवाणी उसने तत्वों की आवर्त सारणी में स्थिति के आधार पर की थी।

मेण्डलीफ की आवर्त सारणी की विशेषताएं –

  • प्रत्येक आवर्त में तत्व अपने बढ़ते परमाणु भारों के क्रम में रखा गया हैं।
  • एक ही समूह के सभी तत्वों के गुणधर्म एक समान होते हैं।
  • प्रत्येक आवर्त में बाएँ से दाएँ चलने पर तत्वों की ऋण – विद्युत् संयोजकता कम हो जाती है, जबकि धन-विद्युत संयोज़कता बढती जाती है।
  • तत्व का परमाणु भार उसका मौलिक गुण है।
  • कम परमाणु भार वाले तत्व ( जैसे- H (हाइट्रोजन), C (कार्बन), O (ऑक्सीजन), N (नाइट्रोजन) ) अपेक्षाकृत प्रकृति मेँ ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं।
  • सारणी में खाली स्थानों के तत्वों के गुणधर्मों को पहले ही बताया जा सकता है।
  • आवर्त सारणी में कुछ तत्व ऐसे स्थानो पर रखे गए थे जिसके अनुसार उनके गुण नहीं थे इन तत्वों के परमाणु द्रव्यमानों में संशोधन हुआ तथा तब इन्हें सारणी में तर्कसंगत स्थान प्राप्त हुआ।