खाद्य परिरक्षक

खाद्य परिरक्षक सूक्ष्मजीवों (जैसे यीस्ट), या अन्य सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को अवरूद्ध करता है (हालांकि कुछ तरीके भोजन के लिए सौम्य बैक्टीरिया या कवक को शुरू करके काम करते हैं), और वसा के ऑक्सीकरण की प्रक्रिया को धीमा कर देते हैं जो कि कठोरता का कारण बनता है। खाद्य परिरक्षक में ऐसी प्रक्रियाएं भी सम्मिलित हो सकती हैं जो दृश्य गिरावट को रोकती हैं, जैसे कि भोजन की तैयारी के बाद सेब में एंजाइमैटिक ब्राउनिंग प्रतिक्रिया।

परिरक्षण के सिद्धान्त

नमी को दूर करना-

सूक्ष्मजीवी की वृद्धि नमी की उपस्थिति में ही होती हैं, अतः इनकी वृद्धि को रोकने के लिए नमी को नष्ट करना जरुरी होता है। नमी से फल-सब्जियों को खराब होने से बचाने के लिए उनमें उपलब्ध जल की अधिक मात्रा को निकालकर कम कर देते है। यह कार्य धूप में सुखाकर या कृत्रिम शुष्कीकरण यंत्रों की मदद से संचालित गर्म हवा के कक्षों द्वारा किया जा सकता है। फल-सब्जियों तथा इनके परिरक्षित पदार्थो को शुष्क वातावरण में भण्डारित करना चाहिए। इनमें गीले हाथ नहीं लगाना चाहिए अन्यथा नमी उपलब्ध होने पर इन निर्जलित उत्पादों में पुनः रासायनिक प्रक्रिया आरम्भ होकर ये खराब होने लगते हैं।

वायु रोधक बनाना-

वायु से सुक्ष्म जीवों का संक्रमण फैलता है, अतः परिरक्षित उत्पादों को वायुरोधक डिब्बों, बोतलों आदि मे भरकर पिघले हुए मोम से बन्द किया जाता है। अचार को तो हमेशा तेल में डुबोकर रखना चाहिए। ऐसी व्यवस्थाओं से वायु का प्रवेश नहीं हो पाता तथा जिससे सूक्ष्मजीवों की वृद्धि रुक जाती है।

संक्रमण से सुरक्षा-

फल, सब्जियों एवं उनके उत्पाद मुख्य रूप से सूक्ष्म जीवों के आक्रमण/संक्रमण से खराब हो जाते है, अतः यह आवश्यक है कि उनमें इनका प्रवेश रोक दे। सावधानी से काटने, तोड़ने व सफाई से फल-सब्जियों को बचाया जा सकता है। लाने ले जाने तथा पैकिंग में इनके छिलके पर चोट नहीं लगनी चाहिए। इनके क्षतिग्रस्त होने पर फूफंद व जीवाणु प्रवेश कर इन्हें गला-सड़ा देते है।

प्रशीतन करना तथा शीत-भण्डारों का प्रयोग-

फल व सब्जियां गर्मी की अपेक्षा सर्दी में शीघ्र खराब नहीं होती हैं इसलिए यदि इन्हें 10 डिग्री से.ग्रे. से कम तापमान पर रखा जाए तो जीवाणु आदि सूक्ष्म जीवों की वृद्धि रूक जाती है तथा जैविक परिवर्तन बहुत धीमा पड़ जाता है। अतः इसके लिए घरों में रेफ्रिजरेटर तथा व्यावसायिक स्तर पर ठण्डे गोदामों का प्रयोग करना चाहिए।

परिरक्षण की विधियाँ

परिरक्षण विधियों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है :- 1. अस्थाई 2. स्थाई

1. अस्थाई परिरक्षण

खाद्य परिरक्षण व्यवसाय में एक भाग अस्थाई परिरक्षण पर निर्भर करता है। चाहे यह नियम असंसाधित माल पर हो या उसके संसाधित उत्पाद पर हो, किन्तु अस्थाई परिरक्षण विधि पर निर्मित उत्पादों का उतना स्थिर परिरक्षण सम्भव नहीं होता, जितना कि संसाधित खाद्य-पदार्थो में स्थिर परिरक्षण सम्भव है। अस्थाई परिरक्षण को निम्न भागों में विभाजित किया जा सकता है।

निरोगावस्था या आरोग्यावस्था –

मानव शरीर की तरह खाद्य-पदार्थो को भी निरोगावस्था में सूक्ष्म जीवों के प्रवेश से बचाया जाए, तो वे भी आरोग्यावसथा में रहेंगे तथा उन्हें सुक्ष्म जीवों के संक्रमण से भी बचाया जा सकता है। जिस खाद्य-पदार्थ को हम खाने के काम में लेते है, उसे पूर्णतया शुद्ध तथा निरोग नहीं समझा जा सकता है क्योंकि वातावरण के द्वारा ही उसमें बहुत से जीव प्रवेश कर जाते है। अतः फल तथा सब्जियों को भी अन्य खाद्य पदार्थां की तरह साफ वातावरण में ही बनाना चाहिए। फल तथा सब्जी तोड़ने वाले तथा इकट्ठा करने वाले व्यक्ति किसी रोग या छूत की बीमारी से पीड़ित नहीं होने चाहिए। वह स्थान जहां फल इकट्ठे किये जाते हैं, साफ एवं शुद्ध होना चाहिए।

न्यून ताप परिरक्षण-

सर्दियों में फल, सब्जियाँ काफी समय तक खराब नहीं होती, क्योंकि सर्दी में तापमान कम होने से सूक्ष्म जीवियों का विकास नहीं हो पाता है। उनके विकास के लिए एक निश्चित तापमान तथा आर्द्रता की आवश्यकता होती है।

फल-सब्जी को तोड़ते ही थोडी देर जल में भिगोकर ठण्डे जल से धोया जाए तो उसकी गर्मी दूर हो जाती है। फलस्वरूप उसकी श्वसन दर में कमी हो जायेगी, साथ ही सूक्ष्मजीवियों की संख्या में भी कमी हो जायेगी। इन्हीं कारणों से होने वाली विकृतियाँ भी रूक जाती है। इसके अलावा शीत प्रदेश के लोग खाद्य पदार्थो (मांस, मछली, फल व सब्जी) का परिरक्षण हिम कोठरियों में रखकर करते थे। लेकिन आगे चलकर हमने प्रशीतियन्त्र (Regregerator), शीत गोदाम (cold storage) आदि का आविष्कार किया और उसमें आहार का संचयन करके परिक्षण करने लगे हैं।

आर्द्रता अपवर्जन परिरक्षण –

सूक्ष्मजीवियों की वृद्धि के लिए एक निश्चित तापमान के साथ-साथ आर्द्रता या नमी की भी जरूरत होती है। इसीलिए सूखे फल और सब्जियों को खुला छोडने पर वातावरण से नमी पाकर वे फफूंदी ग्रस्त हो जाते है, क्योंकि सूखे फल और सब्जियां वायुमण्डल से नमी को सोख लेती हैं, और उस नमी में उन पदार्था में पाई जाने वाली शर्करा भी घुल जाती है जिसको खाकर फफूंद, जीवाणु आदि आसानी से वृद्धि करने लगते है।

आर्द्रता संरक्षण या मोम-लेपन –

गर्मियों में पौधो से अधिक वाष्पीकरण होता ही है। इसे रोकने के लिए कुछ पौधों में प्रकृति द्वारा स्वयमवे मोम-लेपन होता है। वनस्पति वैज्ञानिकों ने भी उसे अपनाया। उद्यान-विशेषज्ञों ने फल तथा सब्जियों पर मोम-लेपन करके सिद्ध कर दिया कि इस क्रिया से अस्थाई परिरक्षण किया जा सकता है। इस क्रिया द्वारा कच्चे फल तथा सब्जियों को मोम-लेपित कागजों में लपेटकर रखने से वे और भी सुरक्षित हो जाते है।

मोम-लेपन में मोम के साथ उचित अनुपात में सूक्ष्मजीवी नाशक दवा मिलाकर बनाई जाती है जो पायसीकरण या इमल्सीकरण द्वारा सम्पन्न करते है। इस प्रकार तैयार किये हुए मोम मिश्रण में फल तथा सब्जियों को एक-एक करके डुबोया जाता है अथवा इस मिश्रण को फल-सब्जियों पर छिडका जाता है। इसके लिए विभिन्न यन्त्र काम में लिये जाते है।

वायु अपवर्जन क्रिया से-

कुछ खाद्य पदार्थ वायु के सम्पर्क में आने से खुद ही खराब हो जाते है। चाहे वह पदार्थ आर्द्रता-अपवर्जित ही क्यों न हो। विभिन्न तेल, घी, मक्खन आदि वायु के सम्पर्क से विकृतगंधी (Rancidity) बन जाते है, लेकिन केनीकृत या डिब्बाबन्दी (canned) किए हुए तेल, घी आदि विकृतगंधी नहीं होते है। क्योंकि वे वायुरोधी डिब्बों में बन्द कर रखने से कई दिनों तक विकृतगंधी होने से बच सकते है। इसी प्रकार अचार, सूखे तथा निर्जलीकृत (क्मीलकतंजमक) उत्पादों को भी वायु से वंचित रखा जाए तो वे खराब नहीं होंगे।

मृदु प्रतिरोधियों द्वारा –

ऐसे रसायन, जिनका प्रयोग न्यूनतम मात्रा में करने से मानव शरीर को नुक्सान नहीं पहुँचता तथा कुछ खाद्य-पदार्थ जो कि मानव शरीर की वृद्धि के लिए आवश्यक है जैसे- चीनी, तेल, नमक आदि उपयुक्त रसायन तथा खाद्य पदार्थ जो कि सूक्ष्मजीवों की बढ़ोतरी को रोकते हैं या उनका विनाश करते है, वो मृदु प्रतिरोधी कहलाते है। जिस प्रकार डिटोल नये घावों पर काम करता है उसी प्रकार प्रतिरोधी रसायन खाद्यों में काम करते है। इसमें सोडियम बेन्जोयट तथा सल्फर डाई-ऑक्साइड आदि रसायन भी आते हैं। चीनी, नमक, विभिन्न खाद्य तेल सिरका आदि खाद्य पदार्थ इस श्रेणी में आते है। फलों के विभिन्न पेयो चीनी तथा सिरका आदि में से एक या एक से अधक मिलाना उनके परिरक्षण के लिए ही किया जाता है।

पास्चूूरीकरण

अगर खाद्य-पदार्थो को 60 से 80 degree सेन्टीग्रेड तक ताप प्रदान किया जाता है तो वो निष्क्रिय (Inactive) हो जायेंगे जिससे खाद्य-पदाथों के गुणों में कोई बदलाव नहीं होता है। इसी क्रिया को पास्चूूरीकरण कहा जाता है। फल तथा सब्जियों के सूप पास्चूूरीकरण करके ही बाजरों में भेजे जाते है।

2. स्थाई परिरक्षण

असंसाधित या संसाधित (Raw or processed) खाद्य-पदार्थो को ज्यादा दिनों तक सुरक्षित रखने के लिए हम जो तकनीक प्रयोग में लाते है, उसे ही स्थाई परिरक्षण कहते है। इस विधि द्वारा खाद्य-पदार्थो में प्रविष्ट सूक्ष्म जीवों को पूर्णतया नष्ट या निष्क्रिय किया जा सकता है।

उष्मा परिरक्षण

खाद्य पदार्थो में पाये जाने वाले सूक्ष्मजीवों तथा उनके किण्वकों (एन्जाइम) को ताप द्वारा ख़त्म किया जा सकता है। प्रायः सभी सूक्ष्मजीव 65 degree से. (149 deg F) तापमान पर नष्ट हो जाते हैं तथा उनके बीजाणु (Spore) 115 से.(239 F) से अधिक ताप के प्रयोग से ही नष्ट हो पाते है।

सुखाना

इस विधि द्वारा फल तथा सब्जियों के जल को बाहर निकाला जाता है जिससे सूक्ष्म जीव नष्ट या निष्क्रिय हो जाते है। साथ ही सूक्ष्मजीवियों के किण्वकों का भी निष्क्रिय हो जाना स्वाभाविक है। सुखाने से उनका पुनः प्रवेश भी रुक हो जाता है। इस क्रिया को दो विधियों द्वारा क्रियान्वित किया जा सकता है-

(i) धूप में सुखाना (ii) निर्जलीकरण करना।

(i) धूप में सुखाना :- खाद्य पदार्थो को धूप में सुखाने की विधि मानव संस्कृति जितनी पुरानी है। इसके अलावा यह क्रिया परिश्रम तथा खर्च रहित भी है। जो हमारे घरों में आदिकाल से शाक-सब्जियों तथा फलों को सुखानें में अपनाई जाती रही है। आलू, कैरी, आम, केला, मदली आदि जरूरत के अनुसार सुखाये जाते रहे है। यदि इन्हें मोमलेपित कागजों में या वायुरोधी डिब्बों में बन्द कर रखा जाए तो बहुत दिनों तक खराब हुए बिना इनका उपयोग किया जा सकता है।

(ii) निर्जलीकरण :-फल व सब्जियों को अंगीठी, स्टोव, बिजली की अंगीठी आदि की सहायता से बन्द वातावरण में एक निश्चित तापमान पर रखकर सुखाने की विधि को निर्जलीकरण कहा जाता है। इस विधि में काम आने वाले यन्त्रों को निर्जलीकरण यंत्र (Dehydrtor) कहा जाता है। इय यन्त्र में सुखाये गये फल तथा सब्जी धूप में सुखाये गये पदार्थो की अपेक्षा अधिक सुन्दर स्वरूप वाले तथा स्वादिष्ट होते है।

ऊष्मा रहित परिरक्षण (Non-heat preservation)

इस प्रयोग में सूक्ष्म जीवों का नाश नहीं होगा, मगर उनके बाहय किण्वक (एक्सो एन्जाइम) ख़त्म हो जाते है। साथ ही वायुमण्डल में पाये जाने वाले सूक्ष्म जीवों का प्रवेश भी रुक जाता है।

(i) शर्करा द्वारा परिरक्षण : लगभग 60 प्रतिशत शर्करा खाद्य तथा पेय पदार्थों में मिलाई जाए तो वे परिरक्षित हो जाते है, क्योंकि सूक्ष्मजीव तथा उनके किण्वक परासरण (Osmosis) क्रिया द्वारा 60 प्रतिशत शर्करा की मात्रा में नष्ट हो जाते है। वहां जल स्वतंत्र रूप से नहीं पाया जायेगा। सूक्ष्मजीवों की वृद्धि के लिए स्वतंत्र जल का होना बहुत आवश्यक है। विभिन फलों के जैम , जैली , मार्मलट , क्रिस्टलीकृत फल, मुरब्बा, फलमिश्री (Fruit Candy) आदि उपर्युक्त निमयों के आधार पर ही बनाये जाते है।

(ii) लवण द्वारा परिरक्षण :- शर्करा परासरण द्वारा खाद्य-पदार्थो के परिसरण के अलावा लवण भी खाद्य-पदार्थो का परिरक्षण का कार्य करता है। लवण, परासरण क्रिया के अलावा एक विष के रूप में भी सूक्ष्मजीवों पर प्रभाव डालकर खाद्य-पदार्थो का परिरक्षण करता है। इसलिए 15 से 20 प्रतिशत लवण की ही जरूरत होती है। अचार का परिरक्षण भी इसी नियम पर ही आधारित है। यहाँ लवण का मतलब खोने योग्य नमक से है।

(iii) तेल द्वारा परिरक्षण :- सभी तेल स्नेहाम्लवर्ग (Fatty Acid) में आते है। यह भी सूक्ष्म जीवों का एक प्रतिरोधक है। शरीर के नये घाव पर तुरन्त तेल लगाया जाता है। घाव पर तेल लगाने से उस पर संक्रमण करने वाले रोगाणुओं का नाश हो साथ ही उनका पुनःप्रवेश भी सम्भव न हो सके। करीब-करीब सभी तेल फफूंद निरोधक भी होते है। अचार में तो तेल, लवण तथा अन्य मसाले आदि मिलाने से वह और परिरक्षित हो जाता है।

(iv) सिरका द्वारा परिरक्षण :- सिरका भी स्नेहाम्ल वर्ग का एक सूक्ष्मजीव प्रतिरोधक है, क्योंकि सिरके मे एसिटिक अम्ल रहता है। यह अम्ल भी फफूंद रोधक है। अगर खाद्य-पदार्थों में 2 से 3 प्रतिशत तक एसिटिक अम्ल मिलाया जावे तो परिरक्षण सम्भव किया जा सकता है तथा यह सिरके के अचार के नाम से जाना जाता है। ये वस्तुये लम्बे समय तक परिरक्षित हो जाती है।

(v) किण्वनीकरण द्वारा परिरक्षण :- सूक्ष्मजीव तथा किण्वकी की प्रतिक्रिया से कार्बोहाइट्रेट का अपघटन (decompostion) अर्थात् सुयंक्त पदाथों का विघटन हो जाता है। इस क्रिया को ही किण्वन क्रिया कहा जाता है।

(vi) हिमीकरण द्वारा परिरक्षण :- संसाधित तथा असंसाधित खाद-पदार्थो के जलांश को, हिमकारी (By freezer) यन्त्रों द्वारा हिमतुल्य बनाकर रेफ्रिजरेटरों में रखा जाए तो अधिक काल तक उनका परिरक्षण सम्भव है। इस विधि को ही हिमिकरण कहा जाता है। फल तथा सब्जियों में प्रायः 60 से 70 प्रतिशत जल की मात्रा होती है। शेष जैव व अजैव पदार्थ होते है। इस पदार्थ का कुछ भाग जल में तथा कुछ परमाणु के रूप में रहता है। फल तथा सब्जियों में पाये जाने वाला जल जल्दी हिमीकृत हो जाता है। उत्पादों को उचित रूप में बन्द करके 32 से. (9 एफ) में रखा जाना चाहिए। न्यून ताप से रसायन क्रिया या सूक्ष्मजीवों की वृद्धि नहीं होती। हिमीकरण-परिरक्षण इसी नियम पर आधारित है।

प्रमुख खाद्य परिरक्षक

नमक –

  • रासायनिक नाम – सोडियम क्लोराइड
  • सूत्र – NaCl
  • उपयोग – आचार, चटनी आदि को संरक्षित रखने के लिए

शक्कर –

  • रासायनिक नाम – सुक्रोज़ 
  • सूत्र – C12H22O11
  • उपयोग – फलों के संरक्षण में , मुरब्बा के संरक्षण में आदि।

सोडियम बेंजोएट –

  • रासायनिक नाम – सोडियम बेंजोएट
  • सूत्र – C7H5NaO2
  • उपयोग – फलो के रस, स्कवैश, जैम, जैली, तथा शीतल पेय आहार को संरक्षित रखने में, खाने में मौजूद यीस्ट, बैक्टीरिया और फफूंद को खत्म करने में 

सार्बेट –

  • रासायनिक नाम – Potassium (2E,4E)-hexa-2,4-dienoate
  • सूत्र – C6H7KO2
  • उपयोग – दूध एवं पनीर से बनी खाद्य सामग्री को संरक्षित करने में

पेराबीन्स –

  • रासायनिक नाम – मिथाइल पेराबेन
  • सूत्र – CH3(C6H4(OH)COO
  • उपयोग – टमाटर की चटनी एवं सॉस के परिरक्षण में

प्रोपिओनेट –

  • रासायनिक नाम – प्रोपिओनिक अम्ल
  • सूत्र –  C₃H₆O₂
  • उपयोग – पापड़, बेकरी बिस्कुट आदि को संरक्षित करने में

बेंज़ोइक अम्ल –

  • रासायनिक नाम – बेंज़ोइक एसिड
  • सूत्र – C6H5 COOH
  • उपयोग – चटनियों, अचार, मुरब्बे, फल फूलों के रस, शरबत आदि तथा डिब्बे और बोतलों में बंद परिरक्षित आहारों को सड़ने, किण्वन और खराब होने से बचाने के लिए

पोटेशियम एसीटेट-

  • रासायनिक नाम – पोटेशियम एसीटेट
  • सूत्र – CH3CO2K
  • उपयोग – खाद्य योजक के रूप में

लाइ –

  • रासायनिक नाम – सोडियम हाइड्रोक्साइड
  • सूत्र – NaOH
  • उपयोग – खाद्य पदार्थों में मौजूद वसा को सापोनीकृत करके उसके स्वाद और संरचना को बदल कर भोजन को संरक्षित करने में तथा सेंचुरी एग्स के लिए आधुनिक व्यंजनों के लिए।