मिश्रण एवं योगिक

मिश्रण –

जब दो या दो से अधिक पदार्थ मिलते है तो उनकी मात्रा निश्चित नही होती हैं और न ही उनका अनुपात निश्चित होता है। उनको मिलाने पर मिश्रण प्राप्त होता है। कई यांत्रिक विधियों द्वारा इन अवयवों को पुनः सरल मूल अवयवों में प्राप्त किया जा सकता है। 

मिश्रण के दो प्रकार होते हैं-

  1. समांगी या समांग मिश्रण
  2. असमांगी या असमांग या विषमांग मिश्रण

1. समांग मिश्रण

समांग मिश्रण वे मिश्रण होते हैं जिनमें दो या दो से अधिक तत्व या यौगिक एक दूसरे में इस प्रकार समा जाते हैं कि उनको प्रत्यक्ष रूप से देखा नही जा सकता है। इनमेँ पाये जाने वाले विभिन्न अवयव आपस में समाहित होकर एक ही अंग का निर्माण कर लेते हैं, जिस कारण उनकी अलग-अलग रूपों में पहचान करना मुश्किल हो जाता है। समांग मिश्रण में पाये जाने वाले तत्वों के गुणों का प्रत्येक अंश में एक ही स्वरुप हो जाता है अर्थात् विलयन के प्रत्येक अंश में तत्व की सान्द्रता एक समान हो जाती है।

इसमें अलग अलग तत्वों का भौतिक रूप से विभाजन करना सम्भव नही होता है, जैसे- चीनी और पानी का घोल। इसमें चीनी विलेय पदार्थ होता है और पानी विलायक होता है। जब ये आपस में घुल जाते है तो यह चीनी और पानी का विलयन बन जाता है व घुलने के बाद चीनी के कणों को देखा नही जा सकता। अर्थात् पानी के भीतर चीनी पूरी तरह से घुल कर ये दोनों एक अंग बन जाते है, तो ये समांग मिश्रण कहलाते हैं।

कणों के आकार के आधार पर विलयन को समांगी मिश्रण में शामिल किया जाता है-

विलयन-

इसमें कण आकर में बहुत छोटे-छोटे होते हैं व हल्के होते हैं। इन्हें प्रत्यक्ष आँखों से देखना तो असम्भव है ही व साथ में साधारण माइक्रोस्कोप से भी इन्हें नही देखा जा सकता। विलयन भी तीन प्रकार के होते हैं-

संतृप्त विलयन– इसमें एक निश्चित मात्रा में विलेय एक निश्चित तापमान तक ही विलायक में घुल सकता है। जब तापमान को स्थाई रखा जाए और विलेय की मात्रा को बढ़ाया जाए तो वह घुलना बन्द हो जाता है। इसे ही संतृप्त विलयन कहा जाता हैं।

असंतृप्त विलयन– इसमें विलायक के तापमान को बढ़ा कर उसमे विलेय की मात्रा को भी बढ़ाया जा सकता है और वह घुलनशीलता कायम रखता है। इसमें तापमान स्थाई नही रख सकते। इसे असंतृप्त विलयन कहा जाता हैं।

अतिसंतृप्त विलयन– संतृप्त व असंतृप्त के बाद एक स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि तापमान बढ़ाने के बाद भी उसमें विलेय का घुलना बन्द हो जाता है। इस स्थिति में विलेय व तापमान दोनों को नही बढ़ाया जा सकता है। इसे ही अतिसंतृप्त विलयन कहा जाता हैं।

समांगी मिश्रण के गुण

  • समांगी मिश्रण में टिंडल प्रभाव नहीं दिखाई देते हैं।
  • समांगी मिश्रण में कणों की सीमाओं में अंतर नहीं कर सकते।
  • समांगी मिश्रण में सेंट्रीफ्यूजेस या डेसेंटेशन का उपयोग करके यहां के कण को अलग-अलग नहीं किया जा सकता है।

2. असमांगी मिश्रण

इसे असमांग मिश्रण या विषमांग मिश्रण भी कहा जाता हैं। दो या दो से अधिक तत्वों या द्रव्यों के आपस में मिलने से ये पूरी तरह से आपस में घुलकर इनका एकीकरण नहीं हो पाता हैं, जिस कारण इसके कण प्रत्यक्ष रूप से अलग-अलग दिखाई पड़ते है।

इसमें तत्वों के सान्द्रता में समता नही होती है अर्थात् अलग-अलग अंशों में तत्वों के अवयव समान मात्रा में मौजूद नही होते हैं। किसी स्थान पर ज्यादा होते हैं तथा किसी स्थान पर कम होते है। इनके तत्वों में घुलनशीलता का गुण नही पाया जाता इस कारण इनके कणों को भौतिक रूप से भी पृथक किया जा सकता है।

इस मिश्रण में भी अलग-अलग द्रव्य की अवस्थाएँ होती है। ठोस, द्रव या गैस किसी भी रूप में हो सकती है। उदाहरण के लिए, पानी में कोई भी चिकना द्रव जैसे तेल मिलाने से वह उसमें पूरी तरह से घुल नही पाता है तथा सतह पर तैरने लगता है।

कणों के आकार के आधार पर निलम्बन व कोलॉइड को असमांगी मिश्रण में शामिल किया जाता है-

निलम्बन-

इसमें कण अधिक भारी होते हैं और बड़े होते हैं। इस कारण ये कण अधिक समय तक हलचल में न रहकर धीरे-धीरे सतह पर जम जाते हैं। ये साफ़ दिखाई देते हैं। जैसे- हवा में उड़ती हुई धूल।

कोलॉइड-

इसके कण आकर में अधिक बड़े नही होते हैं। इन्हें माइक्रोस्कोप की सहायता से ही देखा जा सकता है क्योंकि इन्हें प्रत्यक्ष आँखों से स्पष्ट नही देखा जा सकता है। जैसे- धुंआ, धुंध।

मिश्रण में पाये जाने वाले द्रव्यों की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं के आधार पर उनके तत्वों में पृथक्करण की विधियाँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं। जैसे-
किसी विलायक में अघुलनशील प्रकृति का ठोस द्रव्य मिलने पर उसे निस्पंदन विधि द्वारा अलग-अलग किया जाता है अर्थात् छानकर अलग किया जाता है। जैसे- जल में रेत का मिलना। किसी द्रव पदार्थ में ठोस के मिलने पर जो विलयन बनता है तो उसमे वाष्पीकरण या आसवन विधि द्वारा पृथक्करण किया जाता है।

असमांगी मिश्रण के गुण

  • विषमांगी मिश्रण में घटक कण समान रूप से उपस्थित होते हैं।
  • विषमांगी मिश्रण में अवयवों को आसानी से पहचाना जा सकता हैं।
  • विषमांगी मिश्रण के कणों का आकार एक नैनोमीटर और 1 माइक्रोमीटर के बीच होता है।
  • विषमांगी मिश्रण में टिंडल प्रभाव दिखाई देते हैं।

योगिक

जब भिन्न तत्त्वों के दो या दो से अधिक परमाणु एक निश्चित अनुपात में संयोजित होते हैं, तब रासायनिक यौगिक का एक अणु प्राप्त होता है। किसी रासायनिक यौगिक के घटकों को भौतिक विधियों द्वारा सरल पदार्थों में अलग नहीं किया जा सकता है। उन्हें अलग करने के लिए रासायनिक विधियों का प्रयोग करना पड़ता है। जल, अमोनिया, कार्बन डाइऑक्साइड, चीनी आदि यौगिकों के कुछ उदाहरण हैं।

यौगिकों का वर्गीकरण –

यौगिकों को मुख्यतः 2 भागो में विभाजित किया गया है –

  1. कार्बनिक योगिक
  2. अकार्बनिक योगिक

1. कार्बनिक योगिक –

कार्बन के रासायनिक यौगिकों को कार्बनिक यौगिक (organic compounds) कहते हैं। प्रकृति में इनकी संख्या 10 लाख से भी अधिक है। जीवन पद्धति में कार्बनिक यौगिकों की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका है। इनमें हाइड्रोजन भी रहता है। ऐतिहासिक तथा परम्परागत कारणों से कार्बन के कुछ यौगिकों को कार्बनिक यौगिकों की श्रेणी में नहीं रखा जाता है। इनमें कार्बनडाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड प्रमुख हैं। सभी जैव अणु जैसे कार्बोहाइड्रेट, अमीनो अम्ल, प्रोटीन, आरएनए तथा डीएनए कार्बनिक यौगिक ही हैं।

2. अकार्बनिक योगिक –

प्रांगार को छोड़कर शेष सभी तत्वों और उनके योगिकों की मीमांसा करना अकार्बनिक रसायन (Inorganic chemistry) का क्षेत्र है। बोरॉन, सिलिकन, जर्मेनियम आदि तत्व भी लगभग उसी प्रकार के विविध यौगिक का निर्माण करते हैं, जैसे कार्बन। पर इस पार्थिव सृष्टि में उनका उतना महत्व नहीं है जितना कार्बन यौगिकों का, इसलिए कार्बनिक रसायन का अन्य तत्वों से अलग रासायनिक क्षेत्र मान लिया गया है। मनुष्य एवं वनस्पतियों का जीवन कार्बन यौगिकों के चक्र पर निर्भर करता है, अत: कार्बनिक यौगिकों को एक अलग उपांग में रखना कुछ अनुचित नहीं है। यह कार्बन ही है जो पृथ्वी पर पाए जाने वाले सामान्य ताप (0° से 40°) पर अनेक स्थायी समावयवी यौगिक दे सकता है।

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