भारत में मानसून की स्थिति

भारतीय मानसून की उत्पत्ति के सिद्धांत

मानसून की उत्पत्ति संबंधित चार प्रमुख सिद्धांत दिए गए हैं-

  1. तापीय सिद्धांत
  2. विषुवतीय पछुआ पवन सिद्धांत
  3. जेट स्ट्रीम सिद्धांत
  4. एलनिनो सिद्धांत

1. मानसून की उत्पत्ति का तापीय सिद्धांत

इस सिद्धांत के अनुसार मानसूनी पवनों की उत्पत्ति का मुख्य कारण तापीय है। ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की किरणें उत्तरी गोलार्द्ध में लम्बवत पड़ती है। इससे यहां एक वृहत निम्न दाब का निर्माण होता है। इस निम्न दाब के कारण उत्तर-पूर्वी व्यापारिक पवनें अनुपस्थित हो जाती हैं जो कि 5 से 30 डिग्री उत्तरी अक्षाशों के बीच सालभर चलती है।

तापीय विषुवत रेखा उत्तर की ओर खिसक जाती है इस कारण दक्षिणी-पूर्वी व्यापारिक पवनें विषुवत रेखा को पार कर उत्तरी गोलार्द्ध में आ जाती हैं। फेरेल के नियमानुसार उत्तरी गोलार्द्ध में आने पर ये पवन अपनी दाहिनी ओर अर्थात् उत्तर पूर्व की ओर मुड जाती हैं। तथा संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप पर प्रवाहित होने लगती हैं। चूंकि ये पवन लम्बी समुद्री यात्रा कर आ रही होती है अतः जलवाष्प युक्त होती है।

ये दक्षिणी पूर्वी मानसूनी पवन भारतीय उपमहाद्वीप में दो भागों में बंटकर वर्षा ऋतु लाती है। प्रथम, अरब सागर शाखा पश्चिमी घाट के पश्चिमी ढ़ाल पर तथा द्वितीय, बंगाल की खाड़ी शाखा के द्वारा अंडमान निकोबार द्वीप समूह एवं उत्तर-पूर्व भारत में भारी वर्षा होती है।

बंगाल की खाड़ी शाखा उत्तर-पश्चिम भारत के निम्न दाब क्षेत्र की ओर अभिसारित होती है।। पूर्व से पश्चिम की ओर जलवाष्प की कमी के साथ ही वर्षा की मात्रा में भी कमी होती जाती है।

व्यापारिक पवनें

व्यापारिक पवनें 5 डिग्री से 30 डिग्री उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों के बीच चलने वाली पवनें हैं जो 35 डिग्री उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांश(उच्च दाब) से 0 डिग्री अक्षांश(निम्न दाब) के बीच चलती है।

शीत ऋतु में सूर्य की किरणें मकर रेखा पर सीधी पड़ती है। इससे भारत के उत्तर पश्चिमी भाग में, अरब सागर व बंगाल की खाड़ी की तुलना में अधिक ठण्ड होने के कारण उच्च दाब का निर्माण(उत्तर-पश्चिम भारत में) एवं अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी में निम्न दाब निर्माण(ठण्ड कम होने के कारण) होता है। इस कारण मानसूनी पवनें विपरित दिशा(उच्च दाब से निम्न दाब) में बहने लगती हैं। जाड़े की ऋतु में उत्तर पूर्वी व्यापारिक पवनें पुनः चलने लगती हैं। यह उत्तर पूर्वी मानसून लेकर आता है। तथा बंगाल की खाड़ी से जलवाष्प ग्रहण कर तमिलनाडु के तट पर वर्षा करती है।

2. मानसून की उत्पति का विषुवतीय पछुआ पवन सिद्धांत

इसका प्रतिपादन फ्लोन के द्वारा किया गया है। इसके अनुसार विषुवतीय पछुआ पवन ही दक्षिण-पश्चिम मानसूनी हवा है। इसकी उत्पत्ति अंतः उष्ण अभिसरण के कारण होती है। अंतः उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र उत्तरी पूर्वी व्यापारिक पवनों एवं दक्षिणी पूर्वी व्यापारिक पवनों का मिलन स्थल अंतर-उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र होता है। यहां दोनों पवनों के मिलने से विषुवतीय पछुआ पवनों की उत्पत्ति होती है। फ्लोन ने मानसून की उत्पत्ति हेतु तापीय प्रभाव को प्रमुख माना है। ग्रीष्म काल में तापीय विषुवत रेखा के उत्तरी खिसकान के कारण अंतः उष्ण अभिसरण विषुवत रेखा के उत्तर में होता है। विषुवतीय पछुआ पवनें अपनी दिशा संशोधित कर भारतीय उपमहाद्वीप पर बने निम्न दाब की ओर प्रवाहित होने लगती है। यह दक्षिण-पश्चिम मानसून को जन्म देती है।

शीत ऋतु में सूर्य के दक्षिणायन होने पर निम्न दाब क्षेत्र, उच्च दाब क्षेत्र में बदल जाता है तथा उत्तरी-पूर्वी व्यापारिक पवनें पुनः गतिशील हो जाती है।

3. जेट स्ट्रीम सिद्धांत

इस सिद्धांत का प्रतिपादन येस्ट द्वारा किया गया है। जेट स्ट्रीम ऊपरी वायुमण्डल(9-18 किमी.) के बीच अति तीव्रगामी वायु प्रवाह प्रणाली है। मध्य भाग में इसकी गति अधिकतम(340 किमी./घंटा) होती है। ये हवाएं पृथ्वी के ऊपर एक आवरण का कार्य करती है। जो निम्न वायुमण्डल के मौसम को प्रभावित करती हैं।

भारत में आने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून का संबंध उष्ण पूर्वी जेट स्ट्रीम से है। यह 8°N से 35°N अक्षांशों के मध्य चलती है। उत्तर पूर्वी मानूसन का संबंध(शीतकालीन मानसून) उपोष्ण पश्चिमी(पछुआ) जेट स्ट्रीम से है। यह 20 डिग्री से 35 डिग्री उत्तरी एवं दक्षिणी दोनों अक्षांशों के मध्य चलती है।

पछुआ(उपोष्ण पश्चिमी) जेट स्ट्रीम द्वारा उत्तर पूर्वी मानसून की उत्पत्ति

शीतकाल में उपोष्ण पश्चिमी(पछुआ) जेट स्ट्रीम संपूर्ण पश्चिमी तथा मध्य एशिया में पश्चिम से पूर्व दिशा में प्रवाहित होती है। तिब्बत का पठार इसके मार्ग में अवरोधक का कार्य करता है एवं इसे दो भागों में बांट देता है। एक शाखा तिब्बत के पठार के उतर से उसके समानान्तर बहने लगती है। दुसरी दक्षिणी शाखा हिमालय के दक्षिण में पूर्व की ओर बहती है।

दक्षिणी शाखा की माध्य स्थिति फरवरी में लगभग 25 डिग्री उत्तरी अक्षांश के ऊपर होती है। इसका दाब स्तर 200 से 300 मिली बार होता है। पश्चिमी विक्षोभ जो भारत में शीत ऋतु में आता है, इसी जेट पवन द्वारा लाया जाता है। रात के तापमान में वृद्धि इन विक्षोभों के आने का सूचक है।

पश्चिमी जेट स्ट्रीम ठण्डी हवा का स्तंभ होता है जो सतह पर हवाओं को धकेलता है। इससे सतह पर उच्च दाब का निर्माण(भारत के उत्तर पश्चिमी भाग में) होता है। ये शुष्क हवाएं बंगाल की खाड़ी(तुलनात्मक रूप से तापमान अधिक होने के कारण निम्न दाब क्षेत्र) की ओर प्रवाहित होती है। इन हवाओं के द्वारा ही शीतकाल में उत्तर प्रदेश एवं बिहार में शीतलहर चलती है। बंगाल की खाड़ी में पहुंचने के बाद ये हवाएं अपने दाहिने मुड जाती हैं और मानसून का रूप ले लेती हैं। जब पवन तमिलनाडु के तट पर पहुंचती हैं तो बंगाल की खाड़ी से ग्रहण किए जलवाष्प की वर्षा तमिलनाडू में करती हैं।

उष्ण पूर्वी जेट स्ट्रीम द्वारा दक्षिण पश्चिम मानसून की उत्पत्ति

गर्मी में पश्चिमी जेट स्ट्रीम भारतीय उपमहाद्वीप पर नहीं बहती है। इसका खिसकाव तिब्बत के पठार के उत्तर की ओर हो जाता है। इस समय भारत के ऊपरी वायुमण्डल में उष्ण पूर्वी जेट स्ट्रीम चलती है। उष्ण पूर्वी जेट स्ट्रीम की उत्पत्ति का कारण मध्य एशिया एवं तिब्बत के पठारी भागों के अत्यधिक गर्म होने को माना जाता है।

तिब्बत के पठार से गर्म होकर ऊपर उठने वाली हवाओं में क्षोभमण्डल के मध्य भाग में घड़ी की सुई की दिशा में चक्रिय परिसंचरण प्रारम्भ हो जाता है। यह ऊपर उठती वायु क्षोभ सीमा के पास दो अलग-अलग धाराओं में बंट जाती है। इनमें से एक विषुवत वृत्त की ओर पूर्वी जेट स्ट्रीम के रूप में चलती है तथा दूसरी ध्रुव की ओर पश्चिमी जेट स्ट्रीम के रूप में चलती है।

पूर्वी जेट स्ट्रीम भारत के ऊपरी वायुमण्डल में दक्षिणी पूर्वी दिशा की ओर बहती हुई अरब सागर में नीचे बैठने लगती है। इससे वहां वृहत उच्च दाब का निर्माण होता है। इसके विपरीत भारतीय उप-महाद्वीप के ऊपर जब ये गर्म जेट स्ट्रीम चलती है तो सतह की हवा को ऊपर की ओर खींच लेती है। यहां वृहत निम्न दाब का निर्माण करती है। इस निम्न दाब को भरने के लिए अरब सागर के उच्च भार क्षेत्र से हवाएं उत्तर पूर्व की ओर चलने लगती है। यही दक्षिणी पश्चिमी मानसून पवन हैं।

तथ्य

उष्ण पूर्वी जेट स्ट्रीम के कारण ही भारत में मानसून-पूर्व उष्ण कटिबंधीय चक्रवात आते हैं। इससे भारी वर्षा होती है।

पूर्वी जेट स्ट्रीम न केवल मौसमी है, वरन् अनियमित भी है। जब यह भारत के वृहत क्षेत्र के ऊपर लम्बी अवधि तक चलती है तो बाढ़ की स्थिति बनती है। जब ये हवाएं कमजोर होती हैं तो सूखा आता है।

एलनिनो सिद्धांत

लगभग 3 से 8 वर्षो के अन्तराल पर महासागरों तथा वायुमण्डल में एक विशिष्ट उथल पुथल होती है। इसकी शुरूआत पूर्वी प्रशांत महासागर के पेरू के तट से होती है। पेरू के तट पर हमबोल्ट या पेरू की जलधारा(ठण्डी जलधारा) प्रवाहित होती है। यह जलधारा दक्षिण अमेरिका तट से दुर उत्तर की ओर प्रवाहित होती है। हम्बोल्ट जलधारा की विशेषता शीतल जल का गहराई से ऊपर की ओर आपान है। विषुवत रेखा के पास यह दक्षिण विषुवत रेखा जलधारा के रूप में प्रशांत महासागर के आर पार पश्चिम की ओर मुड़ जाती है।

एलनिनो के आने के साथ ही ठण्डे पानी का गहराई से ऊपर आना बंद हो जाता है एवं ठण्डे पानी का प्रतिस्थापन पश्चिम से आने वाले गर्म जल से हो जाता है। अब पेरू की ठण्डी जलधारा का तापमान बढ़ जाता है। इसके गर्म जल के प्रभाव से प्रथमतः दक्षिणी विषुवतीय मर्ग जलधारा का तापमान बढ़ जाता है। चूंकि दक्षिणी विषुवतीय गर्म जलधारा पूर्व से पश्चिम की ओर जाती है अतः सम्पूर्ण मध्य प्रशांत का जल गर्म हो जाता है तथा वहां निम्न दाब का निर्माण होता है।। जब कभी इस निम्न दाब का विस्तार हिन्द महासागर के पूर्वी-मध्यवर्ती क्षेत्र तक होता है तो यह भारतीय मानसून की दिशा को संशोधित कर देती है। इस निम्न दाब की तुलना में भारतीय उपमहाद्वीप के स्थलीय भाग पर बना निम्न दाब(ग्रीष्म ऋतु में) तुलनात्मक रूप से कम होता है। अतः अरब सागर के उच्च दाब क्षेत्र से हवाओं का प्रवाह दक्षिण-पूर्वी हिन्दमहासागर की ओर होने लगता है। इससे भारतीय उपमहाद्वीप में सूखे की स्थिति बनती है। इसके विपरीत लब एलनिनो धारा का प्रभाव मध्यवर्ती प्रशांत तक सीमित रहता है दो दक्षिणी पश्चिमी मानसून पवनों का मार्ग बाधित नहीं होता तथा भारत में भरपूर वर्षा होती है।

दक्षिण-पश्चिम मानसून

सामान्यतः भारत में मानसून का समय जून से सितम्बर तक रहता है। इस समय उत्तर-पश्चिमी भारत तथा पाकिस्तान में निम्न वायुदाब का क्षेत्र बन जाता है। अतः उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र उत्तर की ओर खिसकता हुआ शिवालिक के पर्वत पाद तक चला जाता है। इसके कारण भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर सिंधु-गंगा मैदान में एक लम्बाकार निम्न दाबीय मेखला का निर्माण होता है। जिसे मानसून गर्त कहते हैं। इस निम्न दाब को भरने के लिए दक्षिणी गोलार्द्ध में चलने वाली दक्षिणी पूर्वी वाणिज्यिक पवन विषुवत रेखा को पार कर पूर्व की ओर मुड जाती है(फेरेल के नियमानुसार) तथा दक्षिणी-पश्चिमी मानसूनी पवन का रूप ले लेती है।

भारत में दक्षिणी-पश्चिमी मानसून की उत्पत्ति का संबंध ‘उष्ण पूर्वी जेट स्ट्रीम’ से है। दक्षिण पश्चिमी मानसून भारत में सर्वप्रथम अंडमान एवं निकोबार तट पर 25 मई को पहुंचता है। फिर 1 जून को चेन्नई एवं तिरूअनन्तपुरम तक पहुंचता है। 5 से 10 जून के बीच कोलकाता एवं मुंबई को छुता है। 10 से 15 जून के बीच पटना, अहमदाबाद, नागपुर तक पहुंचता है। 15 जून के बाद लखनऊ, दिल्ली, जयपुर जैसे शहरों में पहुंचता है।
प्रायद्वीपीय भारत में दस्तक देने के बाद दक्षिण-पश्चिम मानसून दो शाखाओं में बंट जाता है।

  1. अरब सागरीय शाखा
  2. बंगाल की खाड़ी शाखा

भारतीय दक्षिणी पश्चिमी मानसून की अरब सागरीय शाखा

दक्षिणी पश्चिमी मानसून की यह शाखा पश्चिमी घाट की उच्च भूमि में लगभग समकोण पर दस्तक देती है। अरब सागर शाखा द्वारा भारत के पश्चिमी तट, पश्चिमी घाट पर्वत, महाराष्ट्र, गुजरात एवं मध्यप्रदेश के कुछ हिस्सों में वर्षा होती है।

अरब सागर शाखा द्वारा भारत के पश्चिमी घाट पर्वत के पश्चिमी ढ़ाल पर तटीय तटीय भाग की तुलना में अधिक वर्षा होती है। उदाहरणस्वरूप महाबलेश्वर में 650 सेमी. वर्षा होती है। जबकि मुंबई में मात्र 190 सेमी. वर्षा होती है। पश्चिमी घाट पर्वत के पूर्वी भाग में वर्षा की मात्रा काफी कम होती है क्योंकि यह वृष्टिछाया प्रदेश है। पुणे में मात्र 60 सेमी. वर्षा होती है।

अरब सागर शाखा राजस्थान से गुजरती हुई हिमालय से टकराती है तथा जम्मू कश्मीर एवं हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय ढ़ालों पर वर्षा करती है। राजस्थान से गुजरने के बावजूद इस मानसूनी शाखा द्वारा यहां वर्षा नहीं हो पाती इसके दो प्रमुख कारण हैं-

अरावली पर्वतमाला की दिशा का इन मानसूनी पवनों के प्रवाह की दिशा के समानान्तर होना।

सिंध प्रदेश(पाकिस्तान) से आने वाली गर्म एवं शुष्क हवाएं मानसूनी पवनों की सापेक्षिक आर्द्रता को कम कर देती है। जिससे वायु संतृप्त नहीं हो पाती।

अरब सागरीय शाखा का वृष्टिछाया क्षेत्र

पश्चिमी घाट पार करने के पश्चात् वर्षा लाने वाली वायु धाराएं पूर्वी ढ़लानों पर ऊपर की ओर चली जाती हैं जहां वे रूद्धोष्म प्रक्रिया के कारण गर्म हो जाती हैं। इसके फलस्वरूप वृष्टिछाया क्षेत्र का निर्माण होता है। पहाड़ की ऊंचाई जितनी अधिक होगी, उतना ही अधिक वृष्टिछाया क्षेत्र का निर्माण होगा।

दक्षिणी पश्चिमी मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखा

मानसून की यह शाखा श्रीलंका से इंडोनेशिया द्वीप समूहों के सुमात्रा द्वीप तक सक्रिय रहती है। बंगाल की खाड़ी शाखा दो धाराओं में आगे बढ़ती है। इस शाखा की उत्तरी धारा मेघालय में स्थित खासी पहाडि़यों में दस्तक देती है तथा इसकी दूसरी धारा निम्न दबाब द्रोणी के पूर्वी छोर पर बायीं ओर मुड जाती है। यहां से यह हवा की धारा हिमालय की दिशा के साथ-साथ दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पश्चिम दिशा में बढ़ती है। यह धारा उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में वर्षा करती है।

उत्तर मैदानी क्षेत्र में मानसूनी वर्षा को पश्चिम से बहने वाले चक्रवाती गर्त या पश्चिमी हवाओं से ओर अधिक बल मिलता है। मैदानी इलाकों में पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण में वर्षा की तीव्रता में कमी आती है। पश्चिम में वर्षा में कमी का कारण नमी के स्त्रोत से दूरी बढ़ना है। दूसरी ओर उत्तर से दक्षिण में वर्षा की तीव्रता में कमी की वजह नमी के स्त्रोत का पर्वतों से दूरी का बढ़ना है।

अरब सागरीय शाखा एवं बंगाल की खाड़ी शाखा दोनों शाखाएं छोटानागपुर के पठार में मिलती हैं।

अरब सागरीय मानसून शाखा, बंगाल की खाड़ी शाखा से अधिक शक्तिशाली है। इसके दो प्रमुख कारण हैं –

  1. अरब सागर बंगाल की खाड़ी से आकार में बड़ा है।
  2. अरब सागर की अधिकांश शाखा भारत में पड़ती है जबकि बंगाल की खाड़ी शाखा से म्यांमार, मलेशिया और थाइलैण्ड तक चली जाती है।

दक्षिण पश्चिम मानसून अवधि के दौरान भारत का पूर्वी तटीय मैदान(विशेष रूप से तमिलनाडु) तुलनात्मक रूप से शुष्क रहता है। क्योंकि यह मानसूनी पवनों के समानान्तर स्थित है और साथ ही यह अरब सागरीय शाखा के वृष्टिछाया क्षेत्र में पड़ता है।

उत्तरी पूर्वी मानसून या मानसून की वापसी

सितम्बर के अंत तक उत्तर-पश्चिम में बना निम्न दबाब कमजोर होने लगता है और अन्ततः वह विषुवत रेखीय प्रदेश की तरफ चला जाता है। चक्रवाती अवस्थाओं के स्थान पर प्रति चक्रवाती अवस्थाएं आ जाती हैं। परिणामस्वरूप, हवाएं उत्तरी क्षेत्र से दूर बहना शुरू कर देती हैं। उसी समय विषुवत रेखा के दक्षिण में सूर्य आगे बढ़ता नजर आता है। अन्तः ऊष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र भी विषुवत रेखा की ओर आगे बढ़ता है। इस समय भारतीय उपमहाद्वीप में हवाएं उत्तर पूर्व से दक्षिणी पश्चिमी दिशा में बहती हैं। यह स्थिति अक्टूबर से मध्य दिसम्बर तक लगातार बनी रहती है। जिसे मानसून की वापसी या फिर उत्तर पूर्व मानसून कहते हैं। दिसम्बर के अंत तक, मानसून पूरी तरह से भारत से जा चुका होता है।

बंगाल की खाड़ी के ऊपर से वापस जा रहा मानसून, मार्ग में आर्द्रता नमी ग्रहण कर लेता है जिससे अक्टूबर-नवम्बर में पूर्वी या तटीय उड़ीसा, तमिलनाडु और कर्नाटक के कुछ हिस्से में वर्षा होती है। अक्टूबर में बंगाल की खाड़ी में निम्न दबाब बनता है, जो दक्षिण की ओर बढ़ जाता है और नवम्बर में उड़सा और तमिलनाडु तट के बीच फंस जाने से भारी वर्षा होती है।

मानसून में रूकावट

वर्षा ऋतु में, जुलाई और अगस्त महीने में कुछ ऐसा समय होता है जब मानसून कमजोर पड़ जाता है। बादलों का बनना कम हो जाता है और विशेष रूप से हिमालयी पट्टी और दक्षिण पूर्व प्रायद्वीप के ऊपर वर्षा होनी बंद हो जाती है। इसे मानसून में रूकावट के नाम से जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि ये रूकावटें तिब्बत के पठार की कम ऊंचाई की वजह से आती है। इससे मानसून गर्त उत्तर की ओर मुड़ जाता है।
इस अवधि में जहां पूरे देश को बिना वर्षा के ही संतोष करना पड़ता है तब उप-हिमालयी प्रदेशों एवं हिमालय के दक्षिणी ढ़लानों में भारी वर्षा होती है।

पश्चिमी विक्षोभ

आमतौर पर जब आकाश साफ रहता है परन्तु पश्चिम दिशा से हवाओं के आने से अच्छे मौसम के दौर में विध्न पड़ जाता है। ये पश्चिमी हवाएं भूमध्य सागर से आती हैं और इराक, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान को पार करने के पश्चात् भारत में प्रवेश करती हैं।

ये हवाएं राजस्थान, पंजाब और हरियाणा में तीव्र गति से बहती हैं। ये उप-हिमालयी पट्टी के आसपास पूर्व की ओर मुड़ जाती हैं। और सीधे अरूणाचल प्रदेश तक पहुंच जाती हैं। जिससे गंगा के मैदानी इलाकों में हल्की वर्षा और हिमालयी पट्टी में हिमवर्षा होती है।

यह घटना मुख्य रूप से शीत ऋतु में होती है क्योंकि इस समय उत्तर पश्चिम भारत में एक क्षीण उच्च दाब का निर्माण होता है। इसी समय भारत पर ‘पश्चिमी जेट स्ट्रीम’ का प्रभाव होता है जो भूमध्य सागर से उठने वाले शीतोष्ण चक्रवात को भारत में लाती है। इसे ही ‘पश्चिमी विक्षोभ’ कहते हैं। इससे मुख्य रूप से प्रभावित राज्य – पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश एवं जम्मू कश्मीर हैं। इससे होने वाली वर्षा रबी की फसल के लिए बहुत उपयोगी है यह वर्षा ‘मावठ’ नाम से जानी जाती है।


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