भारत में ऋतुएँ

भारतीय मौसम विभाग द्वारा भारत की जलवायु को चार ऋतुओं में विभाजित किया गया है-

  1. शीत ऋतु
  2. ग्रीष्म ऋतु
  3. वर्षा ऋतु
  4. शरद ऋतु

शीत ऋतु

इसका काल मध्य दिसम्बर से फरवरी तक माना जाता है। इस समय सूर्य की स्थिती दक्षिणायन हो जाती है। अतः उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित भारत का तापमान कम हो जाता है। इस ऋतु में समताप रेखाएं पूर्व से पश्चिम की ओर प्राय सीधी रहती हैं। 20 डिग्री से. की समताप रेखा भारत के मध्य भाग से गुजरती है। इस ऋतु में भूमध्य सागर से उठने वाला शीतोष्ण चक्रवात ‘पश्चिमी जेट स्ट्रीम’ के सहारे भारत में प्रवेश करता है। इसे ‘पश्चिमी विक्षोभ’ कहते हैं। यह पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश एवं जम्मू-कश्मीर में वर्षा करवाता है। शीतकाल में होने वाली यह वर्षा ‘मावठ’ कहलाती है। यह वर्षा रबी की फसल के लिए उपयोगी है।

ग्रीष्म ऋतु

यह ऋतु मार्च से मई तक रहती है। सूर्य के उत्तरायण में होने से सारे भारत में तापमान बढ़ जाता है। इस ऋतु में उत्तर और उत्तर-पश्चिमी भारत में दिन के समय तेज गर्म एवं शुष्क हवाएं चलती हैं। जो ‘लू’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। इस ऋतु में सूर्य के क्रमशः उत्तरायण होते जाने के कारण अन्तः उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र उत्तर की ओर खिसकने लगता है एवं जुलाई में 25 डिग्री अक्षांश रेखा को पार कर जाता है।

इस ऋतु में स्थलीय शुष्क एवं गर्म पवन जब समुद्री आर्द्र पवनों से मिलती है तो उन जगहों पर प्रचण्ड तूफान की उत्पत्ति होती है। इसे मानसून पूर्व चक्रवात के नाम से जाना जाता है।

भारत में मानसून पूर्व चक्रवात के स्थानीय नाम

नाॅर्वेस्टर – छोटा नागपुर का पठार पर ग्रीष्म काल में चलने वाली पवनें नाॅर्वेस्टर कहलाती है। यह बिहार एवं झारखण्ड राज्य को प्रभावित करती है।

जब नाॅर्वेस्टर पवनें पूर्व की ओर आगे बढ़ कर पश्चिम बंगाल राज्य में पहुंचती है तो इन्हें काल वैशाली कहा जाता है। तथा जब यही पवनें पूर्व की ओर आगे पहुंच कर असम राज्य में पहुंचती है तो यहां 50 सेमी. वर्षा होती है। यह वर्षा चाय की खेती के लिए अत्यंत उपयोगी होती है इसलिए इसे चाय वर्षा या टी. शावर कहा जाता है।

मैंगो शावर – तमिलनाडू, केरल एवम् आन्ध्रप्रदेश राज्यों में मानसुन पूर्व जो वर्षा होती है जिससे यहां की आम की फसलें पकती है वह वर्षा मैंगो शाॅवर कहलाती है।

चैरी ब्लाॅस्म – कर्नाटक राज्य में मानसून पूर्व जो वर्षा होती है जो कि यहां की कहवा की फसल के लिए अत्यधिक उपयोगी होती है चैरी ब्लाॅस्म या फुलों की बौछार कहलाती है।

आंधियों के नाम

उत्तर की ओर से आने वाली – उत्तरा, उत्तराद, धरोड, धराऊ

दक्षिण की ओर से आने वाली – लकाऊ

पूर्व की ओर से आने वाली – पूरवईयां, पूरवाई, पूरवा, आगुणी

पश्चिम की ओर से आने वाली – पिछवाई, पच्छऊ, पिछवा, आथूणी।

अन्य

उत्तर-पूर्व के मध्य से – संजेरी

पूर्व-दक्षिण के मध्य से – चीर/चील

दक्षिण-पश्चिम के मध्य से – समंदरी/समुन्द्री

उत्तर-पश्चिम के मध्य से – सूर्या

वर्षा ऋतु

इस ऋतु का समय जून से सितम्बर तक रहता है। इस समय उत्तर पश्चिमी भारत तथा पाकिस्तान में निम्न वायुदाब का क्षेत्र(तापमान अधिक होने के कारण) बन जाता है। अतः उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र उत्तर की ओर खिसकता हुआ शितालिक के पर्वत पाद तक चला जाता है। एवं गंगा के मैदानी क्षेत्र में निम्न दाब बन जाता है इस दाब को भरने के लिए दक्षिणी पूर्वी व्यापारिक पवनें विषुवत रेखा को पार कर दक्षिणी पश्चिमी मानसूनी पवनों के रूप में भारत में प्रवेश करती है। ये दक्षिणी पश्चिमी मानसूनी पवनें दो शाखाओं में विभाजित हो जाती हैं। पहली शाखा अरब सागरीय शाखा भारत के पश्चिमी घाट, पश्चिमी घाट पर्वत, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश, हिमाचल प्रदेश एवं जम्मू-कश्मीर में वर्षा करती है। दूसरी शाखा, बंगाल की खाड़ी शाखा, उत्तर-पूर्वी भारत, पूर्वी भारत एवं उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखण्ड आदि भागों में वर्षा करती है।

गारो, खासी एवं जयन्तिया पहाडि़यां कीपनुमा आकृति में फैली हैं एवं समुद्र की ओर खुली हुई हैं अतः बंगाल की खाड़ी से आने वाली हवाएं यहां फस जाती हैं और अत्यधिक वर्षा करती हैं।

खासी पहाड़ी के दक्षिणी भाग में स्थित ‘मासिनराम’ संसार का सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान है।

शरद ऋतु

शरद ऋतु उष्ण बरसाती मौसम से शुष्क व शीत मौसम के मध्य संक्रमण का काल है। शरद ऋतु का आरंभ सितंबर मध्य में होता है। यह वह समय है जब दक्षिण-पश्चिम मानसून लौटता है- लौटते मानसून के दौरान तापमान व आर्द्रता अधिक होती है जिसे ‘‘अक्टूूबर हीट’’ कहते हैं। मानसून के लौटने पर प्रारंभ में तापमान बढ़ता है परंतु उसके उपरांत तापमान कम होने लगता है। सितंबर मध्य तक मानसूनी पवनें पंजाब तक वर्षा करती हैं। मध्य अक्टूबर तक मध्य भारत में व नवंबर के आरम्भिक सप्ताहों में दक्षिण भारत तक मानसूनी पवनें वर्षा कर पाती हैं और इस प्रकार भारतीय उपमहाद्वीप से मानसून की विदाई नवंबर अंत तक हो जाती है। यह विदाई चरणबद्ध होती है इसीलिए इसे ‘‘लौटता दक्षिण-पश्चिम मानसून’’ कहते हैं।

दैनिक गति/घुर्णन गति

पृथ्वी अपने अक्ष पर 23 1/2 डिग्री झुकी हुई है। यह अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व 1610 किमी./घण्टा की चाल से 23 घण्टे 56 मिनट और 4 सेकण्ड में एक चक्र पुरा करती है। इस गति को घुर्णन गति या दैनिक गति कहते हैं इसी के कारण दिन रात होते हैं।

वार्षिक गति/परिक्रमण गति

पृथ्वी को सूर्य कि परिक्रमा करने में 365 दिन 5 घण्टे 48 मिनट 46 सैकण्ड लगते हैं इसे पृथ्वी की वार्षिक गति या परिक्रमण गति कहते हैं। इसमें लगने वाले समय को सौर वर्ष कहा जाता है। पृथ्वी पर ऋतु परिर्वतन, इसकी अक्ष पर झुके होने के कारण तथा सूर्य के सापेक्ष इसकी स्थिति में परिवर्तन यानि वार्षिक गति के कारण होती है। वार्षिक गति के कारण पृथ्वी पर दिन रात छोटे बड़े होते हैं।

पृथ्वी के परिक्रमण काल में 21 मार्च एवम् 23 सितम्बर को सूर्य की किरणें भूमध्य रेखा पर सीधी पड़ती हैं फलस्वरूप सम्पूर्ण पृथ्वी पर रात-दिन की अवधि बराबर होती है।

विषुव

जब सुर्य की किरणें भुमध्य रेखा प सीधी पड़ती है तो इस स्थिति को विषुव कहा जाता है। वर्ष में दो विषुव होते हैं।

21 मार्च को बसन्त विषुव तथा 23 सितम्बर को शरद विषुव होते हैं

आयन

23 1/20 उत्तरी अक्षांश से 23 1/20 दक्षिणी अक्षांश के मध्य का भु-भाग जहां वर्ष में कभी न कभी सुर्य की किरणें सीधी चमकती है आयन कहलाता है यह दो होते हैं।

उत्तरी आयन(उत्तरायण) – 0 अक्षांश से 23 1/20 उत्तरी अक्षांश के मध्य।

दक्षीण आयन(दक्षिणायन) – 0 अक्षांश से 23 1/20 दक्षिणी अक्षांश के मध्य।

आयनान्त

जहां आयन का अन्त होता है। यह दो होते हैं

उत्तरीआयन का अन्त(उत्तरयणान्त) – 23 1/20 उत्तरी अक्षांश/कर्क रेखा पर 21 जुन को उत्तरी आयन का अन्त होता है।

दक्षिणी आयन का अन्त – 23 1/20 दक्षिणी अक्षांश/मकर रेखा पर 22 दिसम्बर को दक्षिणाअन्त होता है।

पृथ्वी के परिक्रमण काल में 21 जून को कर्क रेखा पर सूर्य की किरणें लम्बवत् रहती है फलस्वरूप उत्तरी गोलार्द्ध में दिन बड़े व रातें छोटी एवम् ग्रीष्म ऋतु होती है जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में सुर्य की किरणें तीरछी पड़ने के कारण दिन छोटे रातें बड़ी व शरद ऋतु होती है।

तथ्य

उत्तरी गोलार्द्ध का सबसे बड़ा दिन – 21 जुन

दक्षिणी गोलार्द्ध की सबसे बड़ी रात – 21 जुन

उत्तरी गोलार्द्ध की सबसे छोटी रात – 21 जुन

दक्षिणी गोलार्द्ध का सबसे छोटा दिन – 21 जुन

पृथ्वी के परिक्रमण काल में 22 दिसम्बर को मकर रेखा पर सुर्य की किरणें लम्बवत् रहती है फलस्वरूप दक्षिण गोलार्द्ध में दिन बड़े, रातें छोटी एवम् ग्रीष्म ऋतु होती है जबकि उत्तरी गोलार्द्ध में सुर्य कि किरणें तीरछी पड़ने के कारण दिन छोटे, रातें बड़ी व शरद ऋतु होती है।

तथ्य

दक्षिणी गोलार्द्ध का सबसे बड़ा दिन – 22 दिसम्बर

उत्तरी गोलार्द्ध की सबसे बड़ी रात – 22 दिसम्बर

दक्षिणी गोलार्द्ध की सबसे छोटी रात – 22 दिसम्बर

उत्तरी गोलार्द्ध का सबसे छोटा दिन – 22 दिसम्बर

कटिबन्ध

कोई भी दो अक्षांश के मध्य का भु-भाग कटिबंध कहलाता है।

गोर

कोई भी दो देशान्तर के मध्य का भु-भाग गोर कहलाता है।

भारत दो कटिबन्धों में स्थित है।

उष्ण कटिबंध और शीतोष्ण कटिबंध

वृष्टि प्रदेश एवं वृष्टि छाया प्रदेश

अल-नीनो – यह एक मर्ग जल धारा है जो कि दक्षिण अमेरिका महाद्विप के पश्चिम में प्रशान्त महासागर में ग्रीष्मकालीन मानसून के दौरान सक्रिय होती है इससे भारतीय मानसून कमजोर पड़ जाता है। और भारत एवम् पड़ौसी देशों में अल्पवृष्टि एवम् सुखा की स्थिति पैदा हो जाती है।

ला-नीनो – यह एक ठण्डी जल धारा है जो कि आस्टेªलिया यह महाद्वीप के उत्तर-पूर्व में अल-नीनों के विपरित उत्पन्न होती है इससे भारतीय मानसून की शक्ति बढ़ जाती है और भारत तथा पड़ौसी देशों में अतिवृष्टि की स्थिति पैदा हो जाती है।

उपसौर और अपसौर

उपसौर – सुर्य और पृथ्वी की बीच न्युन्तम दुरी(1470 लाख किमी.) की घटना 3 जनवरी को होती है उसे उपसौर कहते हैं।

अपसौर – सुर्य और पृथ्वी के बीच की अधिकतम दुरी(1510 लाख किमी.) की घटना जो 4 जुलाई को होती है उसे अपसौर कहते हैं।


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