वन अधिकार अधिनियम 2006

  1. स्थापना – 2006
  2. उद्देश्य – ऐसे वनवासियों के वन भूमि पर अधिकार और कब्ज़े को सुनिश्चित करना है, जो कई पीढ़ियों से जंगलों में रह रहे हैं, लेकिन इनके अधिकार दर्ज नहीं किये जा सके।

भारत का ‘वन अधिकार अधिनियम’ वनवासी समुदायों को आजीविका के साथ-साथ वनों के संरक्षण के लिये वनों का उपयोग, प्रबंधन और संचालन/नियंत्रण का अधिकार प्रदान करता है। हालाँकि इस अधिनियम के कार्यान्वयन में व्याप्त कमियाँ अभी भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है।

वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन में व्याप्त कमियों के प्रमुख कारण –

  • राजनीतिक प्रतिबद्धता का अभाव।
  • जनजातीय मामलों के विभाग के पास पर्याप्त मानव और वित्तीय संसाधनों की कमी, जो कि FRA के कार्यान्वयन के लिये नोडल एजेंसी है।
  • वन विभाग में नौकरशाही के बीच आतंरिक गतिरोध भी एक बड़ी समस्या है, जो विभिन्न स्तरों पर निर्णयों को प्रभावित करती है।
  • ज़िला और उप-प्रभाग स्तर की समितियों का खराब कामकाज या उनकी निष्क्रियता भी एक बड़ी चुनौती रही है, गौरतलब है कि ये समितियाँ ही ग्राम सभाओं द्वारा प्रस्तुत आवेदनों की समीक्षा करती हैं।
  • इस अधिनियम को पारित हुए लगभग डेढ़ दशक  बीत चुका है परंतु अभी तक ‘केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ द्वारा FRA के तहत मात्र 4 करोड़ हेक्टेयर (लगभग 13%) भूमि को ही चिह्नित किया गया है।  
  • FRA संबधित समुदायों के लिये उनके वन अधिकारों को प्रदान करने में देरी और उसके कारण बढ़ती भू-असुरक्षा की वजह से  इन समुदायों की सुभेद्यता में वृद्धि होगी जो इस महामारी के दौरान तथा इसके बाद भी वनों पर आश्रित समुदायों की आजीविका एवं  खाद्य असुरक्षा को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा। 

वनों पर आश्रित समुदायों के समक्ष अन्य चुनौतियाँ: 

  • सामाजिक अवसंरचना का अभाव: जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और कुपोषण, मलेरिया, कुष्ठ रोग, आदि बीमारियों तथा स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं की व्यापकता ने COVID-19 जैसी किसी भी बड़ी महामारी से निपटने की क्षमता को बड़े पैमाने पर सीमित कर दिया है।
  • देश के सभी राज्यों में जनजातीय और वनवासी समुदायों के बीच सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की पहुँच में कई प्रकार की कमियाँ देखने को मिली हैं।
  • कई रिपोर्टों में देश के विभिन्न आदिवासी क्षेत्रों से भुखमरी की बात भी सामने आई है, गौरतलब है कि ऐसे समुदाय सामाजिक-आर्थिक योजनाओं का अधिकांश लाभ प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। 

लघु वनोत्पाद से संबंधित मुद्दे:

  • मात्र लघु वनोत्पाद का स्वामित्त्व प्रदान करने से आदिवासियों की आजीविका में कोई बड़ा सुधार नहीं होगा, गौरतलब है कि वन विभाग द्वारा किये जाने वाले वृक्षारोपण में व्यापक विविधता के अभाव के कारण लघु वन उत्पादों (तेंदू पत्ता को छोड़कर) के समग्र उत्पादन में भारी गिरावट देखने को मिली है।  
  • इसके अतिरिक्त अधिकांश लघु वनोत्पाद अभी भी ‘राष्ट्रीयकृत’ ही हैं, जिसका अर्थ है कि इन उत्पादों को केवल सरकारी एजेंसियों को ही बेचा जा सकता है।   

विशेषतः सुभेद्य जनजातीय समूह

  • देश के सुदूर हिस्सों में रह रहे ‘विशेषतः सुभेद्य जनजातीय समूह’ (PVTG) की उत्तरजीविता भी एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा रहा है। 
  • PVTG गहरे/घने वनों के प्रमुख संरक्षणकर्त्ता रहे हैं और उन्होंने सदियों से वनों की जैव विविधता का प्रबंधन किया है। 
  • घने वन संसाधनों, जैव विविधता, प्रकृति, वन्य  जीवन को जोड़ने वाला एक जटिल पारिस्थितिकी तंत्र है 
  • इस पारिस्थितिकी तंत्र को तोड़ने से समुदायों का निर्वासन और उनके बीच अलगाव बढ़ जाएगा जिसका प्रतिकूल प्रभाव वनों पर भी देखने को मिलेगा। 

पर्यावरण प्रभाव आकलन संबंधी कानूनों का विलय :   

  • आदिवासी समुदायों की चुनौतियों में वृद्धि के बीच आत्मनिर्भर भारत पहल के तहत अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिये पर्यावरण से जुड़े कानूनों और नियमों में ढील दिये जाने के प्रयासों ने इन समुदायों के असंतोष को और बढ़ा दिया है। 
  • एक अनुमान के अनुसार, वर्ष 2008 से वर्ष 2019 के बीच लगभग 3.9 लाख हेक्टेयर वन भूमि को अन्य विभागों को स्थानांतरित कर दिया गया। 
  • हाल ही में सरकार द्वारा पर्यावरण प्रभाव आंकलन (EIA) में कुछ छूट दिये जाने और कोयला क्षेत्र में निजी संस्थाओं के प्रवेश से संबंधित मानदंडों के उदारीकरण ने जनजातीय समूहों के गुस्से को बढ़ा दिया है।