राजस्थान का इतिहास – गुहिल राजवंश

गुहिल राजवंश को सिसोदिया राजवंश भी कहते है ये राजवंश का अधिकार क्षेत्र मेवाड़ एवम् उसके आस पास। क्षेत्र था। इस राजवंश में राणा संगा, राणा कुम्भा, एवं महाराणा प्रताप जैसे प्रतापी राजा हुए।

नोट: रावल रतनसिंह, सिसोदिया वंश की उत्पन्न होने के पहले का इतिहास है

रावल रतनसिंह के बाद सिसोदिया वंश की शुरुवात हुई। 1316 ई. में अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु हो गई तब सिसोदा गांव के सामान्त हम्मीर ने अगले दस वर्षो में पूरे मेवाड़ पर अधिकार कर लिया और सिसोदा गांव का सामन्त होने के कारण उसने एक नये वंश सिसोदिया वंश की स्थापना की।
उसे “विषमघाटी पंचानन” मेवाड़ का उद्धारक” और रसिक प्रिया ग्रन्थ में “वीरराजा” की संज्ञा दी गयी है। उसके समय ही “नटणी का चबुतरा” बनवाया जो पिछोला झील के तट पर उदयपुर में है।
हम्मीर के पश्चात् खेता और राणा लाखा शासक हुए, राणा लाखा के समय उदयपुर में जावर की खानों की खोज हुई जो चांदी की खाने थी। राणा लाखा के समय में 14 वीं सदी में पिच्छू नाम बनजारे (चिडिमार) ने अपने बैल की स्मृति में उदयपुर में पिछौला झील का निर्माण करवाया।
राणा लाखा के पुत्र कुवंर चूडा का विवाह रणमल राठौड़ की बहन हंसा बाई से तय हुआ किन्तु स्वयं लाखा ने हंसा बाई से विवाह कर लिया। हंसा बाई ने अपने पुत्र को मेवाड का शासक, बनाने की शर्त रखी उसे कुवंर चूडा ने मान लिया। कुवंर ने आजीवन अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा की इसी चूडा को राजस्थान का भीेष्म पितामाह कहा जाता है। राणा लाखा के पश्चात् हंसाबाई से उत्पन्न उसका पुत्र मोकल मेवाड़ का शासक बना। मोकल की हत्या 1433 ई. में उसके चाचा व मेरा नामक व्यक्ति ने की वे मोकल के पुत्र कुम्भा को भी मारना चाहते थें किन्तु मारवाड़ के रणमल राठौड व मेवाड़ के राधव देव सिसोदिया ने कुम्भा को सुरक्षित मेवाड़ का शासक बनाया।

रााणा कुम्भा (1433-1468 ई.)

राणा कुम्भा ने 1433-1468 ई.तक शासन किया। राणा कुम्भा को राजस्थान की स्थापत्य कला का जनक कहा जाता है राणा कुम्भा ने मेवाड़ के 84 दुर्गो में से 32 दुर्ग बनवाएं।
राजनीतिक व सांस्कृतिक दृष्टि कुम्भा का स्थान महत्वपूर्ण है। उन्होंने 1433 में सारंगपुर के युद्ध में मालवा के शासक महमुद खिलजी प्रथम को पराजित किया। इसी विजय के उपलक्ष में 1444 में चित्तौड़ के विजय स्तम्भ का निर्माण करवाया वर्तमान में विजय स्तम्भ राजस्थान पुलिस का प्रतिक चिन्ह है। इसके वास्तुकार राव जैता थे।

1. विजय स्तम्भ
2. कीर्ति स्तम्भ
3. कुम्भ श्याम मंदिर (मीरा मंदिर)
4. कुंभलगढ दुर्ग (राजसंमद)
5. मचाना दुर्ग (सिरोही)
6. बसंती दुर्ग (सिरोही)
7. अचलगढ़दुर्ग (माऊट आबू)
राणा कुंभा संगीत के विद्वान थे। उन्हे ” अभिन्व भत्र्ताचार्य” भी कहा जाता हैं कुंभा ने “संगीतराज ” “रसिकप्रिय” “नृत्य” “रतन कोष” व “सूढ प्रबंध” ग्रन्थों की रचना की थी। रसिका प्रिया गीत गोविन्द पर टीका है। राणा कुंभा के दरबार में प्रसिद्ध शिल्पकार मण्डन था। जिसने “रूप मण्डन” “प्रसाद मण्डन” “वास्तुमण्डन” “रूपावतार मण्डन” ग्रन्थों की रचना की। रूपावतार मण्डन (मूर्ति निर्माण प्रकरण) इसमें मूर्ति निर्माण की जानकारी मिलती है। मण्डन के भाई नाथा ने “वस्तुमंजरी” पुस्तक की रचना की मण्डन के पुत्र गोविन्द ने “उद्धार घौरिणी” “द्वार दीपिक” व कुंभा के दरबारी कवि कान्ह जी व्यास ने “एकलिंग में ग्रंथ लिखा। 1468 ई. कुंभलगढ़ दुर्ग में राणा कुंभा के पुत्र ऊदा (उदयकरण) ने अपने पिता की हत्या कर दी। उदयकरण को पितृहंता कहा जाता है।

रााणा सांगा (1509-1528ई.)

कुम्भा की मृत्यु के पश्चात उसके पुत्र रायमल ने ऊदा को मेवाड़ से भगा दिया एवं स्वयं शासक बना। रायमल का बडा पुत्र पृथ्वीराज सिसोदिया तेज धावक था। अतः उसे उडना राजकुमार कहा जाता था। 1509 ई में रायमल का पुत्र संग्राम सिंह मेवाड का शासक बना।

1509 ई. में जब राणा सांगा का राज्यभिषेक हुआ। तब दिल्ली का शासक सिकन्दर लोदी था। 1505 में उसने आगरा की स्थापना करवाई। 1517 में उसकी मृत्यु के उपरान्त इसका पुत्र इब्राहिम लोदी शासक बना। उसने मेवाड़ पर दो बार आक्रमण किया।

1.खातोली का युद्ध (बूंदी) 1518
2.बारी (धौलपुर) का युद्ध
दोनो युद्धो में इब्राहिम लोदी की पराजय हुई।

1518 से 1526 ई. तक के मध्य राणा सांगाा अपने चरमोत्कर्ष पर था। 1519 में राणा सांगा ने गागरोन के युद्ध में मालवा के शासक महमूद खिल्ली द्वितीय को पराजित किया।

पानीपत का प्रथम युद्ध (21 अप्रेल 1526)

मुगल शासक बाबर एवं पठान शासक इब्राहिम लोदी के मध्य हुए इस युद्ध में बाबर की विजय हुई और उसने भारत में मुगल वंश की नीव डाली।

1527 में बाबर व रााणा सांगा के मध्य दो बार युद्ध हुआ-

बयाना का युद्ध

1 फरवरी 1527 को हुए इस युद्ध में राणा सांगा विजयी हुए। और नगल सेना को आत्म समर्पण करना पड़ा।

खानवा का युद्ध

17 मार्च 1527 को हुए इस भयंकर युद्ध को बाबर ने इस युद्ध को जेहाद (धर्मयुद्ध) का नाम दिया। इस युद्ध में बाबर की विजय हुई। बाबर ने गाजी (विश्वविजेता) की उपाधी धारण की। इस युद्ध में पहली बार तोपों का प्रयोग हुआ।

राणा सांगा की मृत्यु
1528 ई. में राणा सांगा को किसी सामन्त ने जहर दे दिया परिणामस्वरूप सांगा की मृत्यु हो गई। सांगा का अन्तिम संस्कार भीलवाडा के माडलगढ़ नामक स्थान पर किया गया जहां सांगा की समाधी /छतरी है।
राणा सांगा के शरीर पर 80 से अधिक धाव थे कर्नल जेम्स टाॅड ने राणा सांगा को मानव शरीर का खण्डहर (सैनिक भग्नावेश) कहा है।

उदयसिंह (1522 – 1572 ई.)

महाराणा सांगा के निधन के बाद रतन सिंह द्वितीय को नया शासक नियुक्त किया गया रत्न सिंह ने 1531 में शासन किया था। राणा विक्रमादित्य सिंह के शासनकाल के दौरान तुर्की के सुल्तान गुजरात के बहादुर शाह ने चित्तौड़गढ़ पर 1534 में हमला कर दिया था इस कारण उदयसिंह को बूंदी भेज दिया था ताकि उदयसिंह सुरक्षित रह सके।
इस युद्ध में रानी कर्णावती के नेतृत्व में राजपूत वीरांगनाओं ने जोहर किया जो मेवाड़ का दूसरा साका कहलाता है।
1539 में बनवीर ने विक्रमादित्य का गला घोंटकर हत्या कर दी थी और उसके बाद उन्होंने उदयसिंह को भी मारने का प्रयास किया लेकिन उदयसिंह की धाय पन्ना ने उदयसिंह को बचाने के लिए अपने पुत्र चन्दन का बलिदान दे दिया था इस कारण उदयसिंह ज़िंदा रह सके थे ,पन्ना धाय ने यह जानकारी किसी को नहीं दी थी कि बनवीर ने जिसको मारा है वो उदयसिंह नहीं बल्कि उनका पुत्र चन्दन था। इसके बाद पन्ना धाय बूंदी में रहने लगी। लेकिन उदयसिंह को आने जाने और मिलने की अनुमति नहीं दी। उदयसिंह को खुफिया तरीक से कुम्भलगढ़ में 2 सालों तक रहना पड़ा था।

इसके बाद 1540 में कुम्भलगढ़ में उदयसिंह का राजतिलक किया गया और मेवाड़ का राणा बनाया गया।

आरम्भ में उदयसिंह ने श्शेरशाह सूरी की अधीनता स्वीकार की किन्तु 1545 में कलिंजर आक्रमण के समय उक्का नामक विस्फोटक पदार्थ से शेरशाह की मृत्यु हो गई तब उदयसिंह ने अपनी स्वतंत्रता स्थापित की।

उदयपुर की स्थापना -1559 ई
मुगलों के बार बार आक्रमणों से बचने के लिए उदयसिंह ने उदयपुर नगर को बसाया एवं उसे मेवाड़ की राजधानी बनाया। वहां उन्होंने उदयसागर झील का निर्माण करवाया।

अकबर ने 1567-68 में चित्तौड़ पर आक्रमण किया इस युद्ध में उदयसिंह के सेनानायक जयमल व पन्ना ने उदयसिंह को गोगुदा की पहाडियों में भेज दिया। मुगल व मेवाड़ सेना में घमासान युद्ध हुआ। जयमल के घायल होने पर वे अपने भतीजे के कन्धों पर बैठकर दोनों हाथों से वीरतापूर्वक लडे़ और अन्त में वीरगति को प्राप्त हुए।
युद्ध के अंत में राजपूत वीरांगनाओं ने जोहर किया जो चित्तौड़ का तीसरा साका कहलाता है।

इस युद्ध में अकबर ने 30 हजार युद्ध बन्दियों को मरवा दिया अकबर के जीवन में यह एक धब्बा माना जाता है। अकबर कलंक को धोने के लिए जयमल व पन्ना की पाषाण मूर्ति आगरा के दुर्ग के बाहर स्थापित करवाई।

उदयसिंह की मृत्यु

1572 में गोगुदा की पहाडियों में उदयसिंह का निधन हो गया। तथा उनके पुत्र जगमाल को राजा घोषित किया गया परन्तु कुछ समय पश्चात दरबारियों की समझबूझ से जगमाल को सिंहासन से उतारकर महाराणा प्रताप जो की उदयसिंह के बड़े बेटे थे उन्हें राजा बनाया गया।

महाराणा प्रताप (1540-1597 ई.)

महाराणा प्रताप की माता का नाम जयवन्ता बाई था। जो की उदयसिंह की पहली पत्नी थी। 1572 में मेवाड़ी सामंतों ने प्रताप का गोगुन्दा में राज्याभिषेक कर दिया। इसके पश्यात प्रताप ने कुम्भलगढ़ को राजधानी बनाया था शासन करने लगा।

उस समय दिल्ली सल्तनत की बादशाहत अकबर के हाथों में थी। प्रताप को अधीनता स्वीकार करने के किये अकबर ने 4 बार प्रयास किया।
1. जलाल खां
2. मानसिंह
3. भगवंत दास
4. टोडरमल
अकबर के सभी प्रयास असफल हुए।

हल्दीघाटी युद्ध

अंत में मेवाड़ पर अधिकार स्थापित करने के उद्देश्य से अकबर ने मानसिंह के नेतृत्व में एक विशाल सेना युद्ध के लिए मेवाड़ भेजी। और 18 जून 1576 को युद्ध का बिगुल बज उठा। इसी युद्ध को हम आज हल्दी घाटी का युद्ध के नाम से जानते है। राज-प्रशस्ति के अनुसार इस युद्ध में प्रताप की जीत हुई। एवं अन्य विदेशी इतिहासकरों के अनुसार इस युद्ध में अकबर की जीत हुई पर अकबर प्रताप को नहीं मार सका।
कर्नल जेम्स टॉड ने हल्दीघाटी युद्ध को मेवाड़ की थर्मोपॉली कहा है
अबुल फज़ल ने इस युद्ध को खमनौर का युद्ध
बदांयूनी ने गोगुन्दा का युद्ध कहा है।

हल्दीघाटी युद्ध के बाद राणा प्रताप में अपनी शक्ति को पुनः संगठित किया। और पुनः गोगुन्दा पर अधिकार कर लिया।

कुम्भलगढ़ का युद्ध

अकबर ने 15 अक्टूबर 1577 को शाहबाज़ खां जके नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी। जिसने कुम्भलगढ़ पर अधिकार कर लिया। पर राणा प्रताप वह से सुरक्षित निकलने में कामयाब रहे। यहाँ निकल कर राणा प्रताप चूलिया ग्राम में पहुंचे जहाँ उनकी भेंट भामाशाह से हुई। भामाशाह ने उन्हें आर्थिक सहायता प्रदान की और बहुत सारा धन दिया। जब शाहबाज़ खां प्रताप का पता लगाने में असमर्थ रहा तो वह पुनः दिल्ली लौट गया। उसके जाते ही प्रताप ने वापस गोगुन्दा पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार राणा ने छापा मार युद्दों से अकबर की नक् में दम कर दिया।

दिवेर का युद्ध

राणा को हारने और मेवाड़ पर अधिपत्य ज़माने के किये ये अकबर की अंतिम कोशिश थी। अकबर ने 5 दिसंबर 1584 को जगन्नाथ कछवाहा के नेतृत्व में विशाल सेना भेजी। पर वे भी राणा को पकड़ने में असफल साबित हुए। प्रताप को मुग़ल सेना की खबर मिलते ही वे पहाड़ों में चले गए। और मुग़ल सेना को खली हाथ लौटना पड़ा। इसके बाद राणा प्रताप ने चावंड को अपनी राजधानी बनाया। 19 जनवरी 1597 को महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गयी। चावंड के निकट बंदोली गाँव में उनका अंतिम संस्कार किया गया तथा वहां एक छतरी का निर्माण किया गया।

इस प्रकार अकबर का राणा प्रताप पर अधिकार करने का सपना अभी पूरा नहीं हो सका।


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