आर्य समाज (1875)

  • स्थापना –   1875 में
  • संथापक – स्वामी दयानन्द सरस्वती।
  • उद्देश्य – पाश्चात्य प्रभावों की प्रतिक्रिया स्वरूप हिंदू धर्म में सुधार करना।

आर्य समाज उन्नीसवीं शताब्दी का भारतीय इतिहास और साहित्य में महत्त्वपूर्ण स्थान है। इतना व्यापक और सूक्ष्म परिवर्तन मध्ययुग में इस्लाम धर्म के सम्पर्क के फलस्वरूप भी न हुआ था। एक ओर तो भारतवर्ष उन्नीसवीं शताब्दी में एक सुदूर स्थित पाश्चात्य जाति का दास बना और दूसरी ओर पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान तथा वैज्ञानिक आविष्कारों से लाभ उठाकर उसने नवीन चेतना प्राप्त की और मध्ययुगीन एवं अनेक पौराणिक कुरीतियों, कुप्रथाओं तथा परम्पराओं से बद्ध जीवन का आलस्य छोड़कर स्फूर्ति प्राप्त की।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि यह स्फूर्ति और चेतना, राजनीतिक एवं आर्थिक दासत्व की परिस्थिति में, पूर्व और पश्चिम के बीच संघर्ष के रूप में अर्थात् भारतीय आध्यात्मिकता और पाश्चात्य भौतिकता के संघर्ष के रूप में, अभिव्यक्त हुई। राजनीतिक और आर्थिक चेतना उसी चेतना का अशंमात्र थी। यही पूर्व और पश्चिम का संघर्ष था, जिसने राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द , स्वामी रामतीर्थ, लोकमान्य तिलक, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, योगी अरविन्द और महात्मा गांधी को जन्म दिया।

आर्य समाज की स्थापना

दयानंद सरस्वती ने संभवत: 7 या 10 अप्रैल सन्‌ 1875 ई. को बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की। इसका उद्देश्य वैदिक धर्म को पुनः शुद्ध रूप से स्थापित करने का प्रयास, भारत को धार्मिक, सामाजिक व राजनीतिक रूप से एक सूत्र में बांधने का प्रयत्न, पाश्यात्य प्रभाव को समाप्त करना आदि था। 1824 ई. में गुजरात के मौरवी नामक स्थान पर पैदा हुए स्वामी दयानंद को बचपन में ‘मूलशंकर’ के नाम से जाना जाता था।

21 वर्ष की अवस्था में मूलशंकर ने गृह त्याग कर घुमक्कड़ों का जीवन स्वीकार किया। 24 वर्ष की अवस्था में उनकी मुलाकात दण्डी स्वामी पूर्णानंद से हुई। इन्हीं से सन्न्यास की दीक्षा लेकर मूलशंकर ने दण्ड धारण किया। दीक्षा प्रदान करने के बाद दण्डी स्वामी पूर्णानंद ने मूलशंकर का नाम ‘स्वामी दयानन्द सरस्वती’ रखा। ज्ञान की खोज में भटकने के बाद 1861 ई. में स्वामी ने दयानंद को वेंदों की दार्शनिक व्याख्या का परिचय कराया। दयानन्द ने इन्हें गुरु बना लिया। वेदों और भारतीय दर्शन के गहन अध्ययन के बाद स्वामी जी ने यह निष्कर्ष निकाला कि आर्य श्रेष्ठ हैं, वेद ही ईश्वरी ज्ञान है तथा भारत भूमि ही श्रेष्ठ है।

आर्य समाज का प्रचार-प्रसार

आर्य समाज महासम्मेलन, मथुरा स्वामी जी ने अपने उपदेशों का प्रचार आगरा से प्रारम्भ किया तथा झूठे धर्मों का खण्डन करने के लिए ‘पाखण्ड खण्डनी पताका’ लहराई। इन्होंने अपने उपदेशों में मूर्तिपूजा, बहुदेववाद, अवतारवाद, पशुबलि, श्राद्ध, जंत्र, तंत्र-मंत्र, झूठे कर्मकाण्ड आदि की आलोचना की। स्वामी दयानंद जी ने वेदों को ईश्वरीय ज्ञान मानते हुए ‘पुनः वेदों की ओर चलो का नारा दिया।’

वैदिक सिद्धान्त स्वामी दयानन्द के वैदिक सिद्धान्त को संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है-‘वेद’ शब्द का अर्थ ज्ञान है। यह ईश्वर का ज्ञान है इसलिए पवित्र एवं पूर्ण है। ईश्वर का सिद्धान्त दो प्रकार से व्यक्त किया गया है- चार वेदों के रूप में, जो चार ऋषियों (अग्नि, वायु, सूर्य एवं अगिंरा) को सृष्टि के आरम्भ में अवगत हुए। प्रकृति या विश्व के रूप में, जो वेदविहित सिद्धान्तों के अनुसार उत्पन्न हुआ। वैदिक साहित्य-ग्रन्थ एवं प्रकृति-ग्रन्थ से यहाँ साम्य प्रकट होता है। स्वामी दयानन्द कहते हैं, ‘मैं वेदों को स्वत: प्रमाणित सत्य मानता हूँ। ये संशयरहित हैं एवं दूसरे किसी अधिकारी ग्रन्थ पर निर्भर नहीं रहते। ये प्रकृति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो ईश्वर का साम्राज्य है।

‘ वैदिक साहित्य के आर्य सिद्धान्त को यहाँ संक्षेप में दिया जाता है- वेद ईश्वर द्वारा व्यक्त किये गये हैं जैसा कि प्रकृति के उनके सम्बन्ध से प्रमाणित है। वेद ही केवल ईश्वर द्वारा व्यक्त किये गये हैं क्योंकि दूसरे ग्रन्थ प्रकृति के साथ यह सम्बन्ध नहीं दर्शाते। वे विज्ञान एवं मनुष्य के सभी धर्मों के मूल स्रोत हैं।

आर्य समाज के कर्तव्यों में से सिद्धान्त दो महत्त्वपूर्ण हैं:- भारत को (भूले हुए) वैदिक पथ पर पुन: चलाना और वैदिक शिक्षाओं को सम्पूर्ण विश्व में प्रसारित करना। आर्य समाज का अर्थ स्वामी दयानन्द ने अपने सिद्धान्तों को व्यावहारिकता देने, अपने धर्म को फैलाने तथा भारत व विश्व को जाग्रत करने के लिए जिस संस्था की स्थापना की उसे ‘आर्य समाज’ कहते हैं। ‘आर्य’ का अर्थ है भद्र एवं ‘समाज’ का अर्थ है सभा। अत: आर्य समाज का अर्थ है ‘भद्रजनों का समाज‘ या ‘भद्रसभा‘। आर्य प्राचीन भारत का प्रेमपूर्ण एवं धार्मिक नाम है जो भद्र पुरुषों के लिए प्रयोग में आता था। स्वामी जी ने देशभक्ति की भावना जगाने के लिए यह नाम चुना। यह धार्मिक से भी अधिक सामाजिक एवं राजनीतिक महत्त्व रखता है इस प्रकार यह अन्य धार्मिक एवं सुधारवादी संस्थाओं से भिन्नता रखता है, जैसे –ब्रह्मसमाज (ईश्वर का समाज), प्रार्थना समाज आदि ।

समाज का विभाजन

स्वामी दयानन्द की मृत्यु से अब तक की घटनाओं में समाज का दो दलों में बँटना एक मुख्य परिवर्तन है। इस विभाजन के दो कारण थे: भोजन में मांस के उपयोग पर मतभेद और उच्च शिक्षा के सम्बन्ध में उचित नीति सम्बन्धी मतभेद। पहले कारण से उत्पन्न हुए दो वर्ग ‘मांसभक्षी दल‘ एवं ‘शाकाहारी दल’ कहलाते है तथा दूसरे कारण से उत्पन्न दो दल ‘कॉलेज पार्टी’ एवं ‘महात्मा पार्टी‘ (प्राचीन पद्धति पर चलने वाले) कहलाते हैं। ये मतभेद एक और भी गहरा मतभेद उपस्थित करते हैं जिसका सम्बन्ध स्वामी दयानन्द की शिक्षाओं की मान्यता के परिणाम से है। इस दृष्टि से कॉलेज पार्टी अधिक आधुनिक और उदार है, जबकि महात्मा पार्टी का दृष्टिकोण अधिक प्राचीनतावादी है। कॉलेज पार्टी ने लाहौर में स्थापना की, जबकि महात्मा पार्टी ने हरिद्वार में ‘गुरुकुल‘ स्थापित किया, जिसमें प्राचीन सिद्धान्तों तथा आदर्शों पर विशेष बल दिया जाता रहा है।

समाज के प्रकार

आर्य समाज महासम्मेलन, मथुरा संघटन की दृष्टि से इसमें तीन प्रकार के समाज हैं— स्थानीय समाज, प्रान्तीय समाज, सार्वदेशिक समाज।

सदस्यता की नियमावली

  • स्थानीय समाज की सदस्यता के लिए निम्नलिखित नियमावली है- आर्य समाज के दस नियमों में विश्वास।
  • वेद की स्वामी दयानन्द द्वारा की हुई व्याख्यादि में विश्वास।
  • सदस्य की आयु कम से कम 18 वर्ष होनी चाहिए।
  • द्विजों के लिए विशेष दीक्षा संस्कार की आवश्यकता नहीं है किन्तु ईसाई तथा मुसलमानों के लिए एक शुद्धि संस्कार की व्यवस्था है।

स्थानीय सदस्य

स्थानीय सदस्य दो प्रकार के हैं-

  1. प्रथम, जिन्हें मत देने का अधिकार नहीं, अर्थात् अस्थायी सदस्य।
  2. द्वितीय, जिन्हें मत देने का अधिकार प्राप्त है, जो स्थायी सदस्य होते हैं। अस्थायित्व काल एक वर्ष का होता है। सहानुभूति दर्शाने वालों की भी एक अलग श्रेणी है।

स्थानीय समाज के पदाधिकारी

स्थानीय समाज के निम्नांकित पदाधिकारी होते हैं—

  • सभापति उपसभापति मंत्री कोषाध्यक्ष पुस्तकालयाध्यक्ष।
  • ये सभी स्थायी सदस्यों द्वारा उनमें से ही चुने जाते हैं।

प्रान्तीय समाज

प्रान्तीय समाज के पदाधिकारी इन्हीं समाजों के प्रतिनिधि एवं भेजे हुए सदस्य होते हैं। स्थानीय समाज के प्रत्येक बीस सदस्य के पीछे एक सदस्य को प्रान्तीय समाज में प्रतिनिधित्व करने का अधिकार है। इस प्रकार इसका गठन प्रतिनिधिमूलक है।

पूजा पद्धति

साप्ताहिक धार्मिक सत्संग प्रत्येक रविवार को प्रात: होता है, क्योंकि सरकारी कर्मचारी इस दिन छुट्टी पर होते हैं। यह सत्संग तीन या चार घण्टे का होता है। भाषण करने वाले के ठीक सामने पूजास्थान में वैदिक अग्निकुण्ड रहता है। धार्मिक पूजा हवन के साथ प्रारम्भ होती है। साथ ही वैदिक मन्त्रों का पाठ होता है। पश्चात् प्रार्थना होती है। फिर दयानन्द-साहित्य का प्रवचन होता है, जिसका अन्त समाज गान से होता है। इसमें स्थायी पुरोहित या आचार्य नहीं होता। योग्य सदस्य अपने क्रम से प्रधान-वक्ता या पूजा-संचालक का स्थान ग्रहण करते हैं।

कार्यप्रणाली

आर्य समाज दूसरे प्रचारवादी धर्मों के समान भाषण, शिक्षा, समाचार, पत्र आदि की सहायता से अपना मत-प्रचार करता है। दो प्रकार के शिक्षक है-

प्रथम वेतनभोगी और

द्वितीय, अवैतनिक।

अवैतनिक में स्थानीय वकील, अध्यापक, व्यापारी, डाक्टर आदि लोग होते हैं। जबकि वेतनभोगी सम्पूर्ण समय देने वाले शास्त्रज्ञ और विद्वान् प्रचारक होते हैं। पहला दल शिक्षा पर ज़ोर देता है। दूसरा दल उपदेश और संस्कार पर बल देता है। आर्य समाज का प्रत्येक संगठन कुछ हाईस्कूल, गुरुकुल, अनाथालय आदि की व्यवस्था करता है। यह मुख्यत: उत्तर भारतीय धार्मिक आन्दोलन है यद्यपि इसके कुछ केन्द्र दक्षिण भारत में भी हैं। बर्मा तथा पूर्वी अफ्रीका, मॉरीशस, फीजी आदि में भी इसकी शाखाएँ है जो वहाँ बसे हुए भारतीयों के बीच कार्य करती हैं। आर्य समाज का केन्द्र एवं धार्मिक राजधानी लाहौर में थी, यद्यपि अजमेर में स्वामी दयानन्द की निर्वाणस्थली एवं वैदिक-यन्त्रालय (प्रेस) होने से वह लाहौर का प्रतिद्वन्द्वी था। लाहौर के पाकिस्तान में चले जाने के पश्चात् आर्य समाज का मुख्य केन्द्र आजकल दिल्ली है।

सुधारवादी एवं लोकप्रिय संस्था

यह उत्तर भारत की सबसे मूल सुधारवादी एवं लोकप्रिय संस्था है। स्त्रीशिक्षा, हरिजनसेवा, अश्पृश्यता-निवारण एवं दूसरे सुधारों में यह प्रगतिशील है। वेदों को सभी धर्म का मूल आधार एवं विश्व के विज्ञान का स्रोत बताते हुए, यह देशभक्ति को भी स्थापित करता है। इसके सदस्यों में से अनेक ऐसे हैं जो वास्तविक देश हितैषी एवं देशप्रेमी है।

शिक्षा तथा सामाजिक सुधार द्वारा यह भारत का खोया हुआ पूर्व-गौरव लाना चाहता है। लगभग पिछले बीस-पच्चीस वर्षों से आर्यसमाज का साहित्य पर प्रभाव एक प्रकार से नगण्य है। वास्तव में आर्यसमाज एक ऐसा आन्दोलन था, जिसने देश की एक ऐतिहासिक आवश्यकता पूरी की। शिक्षा, समाजसुधार, धर्मसुधार आदि क्षेत्रों में उसके द्वारा प्रचलित लगभग सभी बातें देश द्वारा स्वीकृत हो जाने के फलस्वरूप उसकी गतिशीलता समाप्त हो गयी।