सिक्ख विद्रोह (1675)

  • समय – 1675
  • आधार –  यह विद्रोह धार्मिक पृष्ठभूमि पर आधारित था। 

औरंगजेब के विरूद्ध बगावत करने वालों में सिक्ख अंतिम थे। यग औरंगजेब के काल का धार्मिक कारणों से होने वाला एक मात्र विद्रोह था।

औरंगजेब के खिलाफ सिक्खों का विद्रोह प्रत्यक्ष रूप से 1675 ई. में गुरू तेग बहादुर को प्राणदंड दिये जाने के बाद शुरू हुआ।

गुरू तेग बहादुर की मृत्यु के बाद गुरू गोविंद सिंह ने औरंगजेब की धर्मांध नीतियों का लगातार विरोध किया। उन्होंने मखोवल या आनंदपुर में अपना मुख्यालय बनाया।

गुरू गोवंद सिंह ने अपनी मृत्यु से पहले ही गुरू की गद्दी को समाप्त कर दिया था। और सिक्खों को एक कट्टर संप्रदाय बनाने में सफलता प्राप्त की।

गुरू गोविंद सिंह ने पूरक ग्रंथ को संकलित किया जिसका नाम दसवें बादशाह का ग्रंथ रखा गया।

औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके पुत्र बहादुर शाह प्रथम ने सिंहासन पर अधिकार करने के लिए अपने भाइयों के खिलाफ गुरू गोवंद सिंह से सहायता माँगी। जिसके कारण वे दक्षिण गये और वहाँ पर गोदावरी नदी के किनारे नादिर नामक स्थान पर एक अफगान ने छुरा मारकर घायल कर दिया।

दो माह बाद उन्होंने अपना अंत समय निकट जानकर अपने शरीर को 7 अक्टूंबर, 1708ई. को चिता को सौंप दिया।

1704ई. में गुरू गोविंद सिंह ने औरंगजेब के पास जफरनामा भेजा था।

इस प्रकार औरंगजेब की धर्मांध एवं अदूरदर्शिता पूर्ण नीति ने सिक्खों के एक धार्मिक संप्रदाय को एक लङाकू एवं सैनिक संप्रदाय के रूप में बदल दिया।

कश्मीर के पुराने प्रशासक सैफ खाँ को पुलों के निर्माणकर्त्ता के रूप में याद किया जाता है।

इस प्रकार अपनी अदूरदर्शिता पूर्ण नीतियों के खिलाफ हुये विद्रोहों तथा दक्कनी राज्यों एवं मराठों का दमन करते हुये 3 मार्च 1707ई. को अहमदनगर के पास औरंगजेब की दुखद मृत्यु हो गई।

औरंगजेब के शव को दौलताबाद से 4 किमी. दूर स्थित फकीर बुरहानुद्दीन (शेख जैन-उल-हक) की कब्र के अहाते में दफना दिया गया।