फरैजी आन्दोलन (1820-1858 ई.)

  1. समय – 1820
  2. नेता –  दादू मीर
  3. फरेजी लोग –  फरैजी लोग शरीयतुल्ला द्वारा चलाये गए संप्रदाय के अनुयायी थे।
  • यह आंदोलन बंगाल में हुआ। इसके नेता दादू मीर थे।
  • फरैजी लोग शरीयतुल्ला द्वारा चलाये गए संप्रदाय के अनुयायी थे।
  • मोहम्मद मोहसिन (दादू मीर) ने जमींदारों की जबरदस्ती वसूली का प्रतिरोध करने के लिए किसानों को संगठित किया। यह अंग्रेजों एवं जमीदारों के विरूद्ध किसान आन्दोलन था।
  • दादू मीर ने नारा दिया – समस्त भूमि का मालिक खुदा है
  • इस आन्दोलन को वहाबी आन्दोलन का सहयोग प्राप्त था।
  • फ़रायजी विद्रोह की शुरुआत 1838 ई. में हुई थी। बंगाल के फ़रीदपुर का यह सम्प्रदाय ‘शरीयतुल्ला‘ द्वारा अनेमोदित विचारों से प्रभावित था।
  • ये लोग सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक परिवर्तन का प्रतिपादन करते थे। शरीयतुल्ला के पुत्र ‘दादूमियाँ’ के नेतृत्व में अंग्रेज़ों के विरुद्ध इस विद्रोह की योजना बनाई गई।
  • साथ ही ज़मींदारों के अत्याचार के विरुद्ध भी इस विद्रोह को अंजाम दिया गया था।
  • यह विद्रोह 1838 ई. से 1857 ई. तक चलता रहा। कालान्तर में इस सम्प्रदाय के अनेक समर्थक ‘वहाबी आंदोलन’ में सम्मिलित हो गये।

कारण

  • फराजी आंदोलन का मुख्य उद्येश्य इस्लाम धर्म में सुधार करना था। इसे ‘फराइदी आंदोलन’ के नाम से भी जाना जाता था जिसकी शुरुआत पूर्वी बंगाल में ‘हाजी शरियतुल्लाह’ के द्वारा की गई थी।
  • हाजी शरियतुल्लाह का मुख्य उद्येश्य इस्लाम धर्म के लोगों को सामाजिक भेदभाव एवं शोषण से बचाना था। परंतु शरियतुल्लाह की मृत्यु के पश्चात सन् 1840 ई० में इस आंदोलन का नेतृत्व उनके पुत्र दूदू मियाँ के द्वारा संभालने पर इस आंदोलन ने क्रांतिकारी रूप अख्तियार कर लिया।
  • दूदू मिंया ने गांव से लेकर प्रांतीय स्तर तक प्रत्येक स्तर पर एक प्रमुख नियुक्त किया। इस आंदोलन में ऐसे क्रांतिकारियों का दल तैयार किया गया जिन्होंने हिन्दू जमींदारों एवं अंग्रेजों के विरूद्ध संघर्ष किया।
  • दूदू मियां को पुलिस के द्वारा कई बार गिरफ्तार किया गया तथा इन्हें सन् 1847 ई० में गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया जिससे आंदोलन नेतृत्वहीन हो गया।सन् 1862 ई० दूदू मिंया की मृत्यु के पश्चात आंदोलन मंद पड़ गया।