जाट विद्रोह (1669)

  • समय – 1669
  • नेतृत्व – गोकला (वह तिलपत का जमींदार था)
  • परिणाम –  मुग़ल गवर्नर हसन अली द्वारा विद्रोह को दबा दिया गया और गोकला की मृत्यु हो गयी।

यह आगरा एवं दिल्ली के आसपास के किसानों, काश्तकारों व जमीदारों ने शुरू किया। नेतृत्व जमीदारों के हाथ में था। सर्वप्रथम गोकुल नाम के हिन्दु जमींदार के नेतृत्व में हुआ बाद में पुनः विद्रोह किया तथा छापामार, हमला एवं लूटपाट की।

राजाराम सिकन्दरा में अकबर की कब्र से उसकी अस्थियां निकाल ले गया एवं जला दी। राजाराम के बाद चूरामन जाट ने नेतृत्व किया। चुनाराम जाट ने ही नामक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की।

औरंगजेब के खिलाफ पहला संगठित विद्रोह आगरा और दिल्ली क्षेत्र में बसे जाटों ने किया। इस विद्रोह की रीढ अधिकतर किसान और काश्तकार थे किन्तु नेतृत्व मुख्यतः जमीदारों ने किया।

जाटों का विद्रोह आर्थिक कारणों को लेकर शुरू हुआ इस विद्रोह को सतमानी आंदोलन का समर्थन प्राप्त था।

1669ई. में मथुरा क्षेत्र के जाटों ने एक स्थानीय जमीदार गोकुला के नेतृत्व में पहला हिन्दू विद्रोह किया। तिलपत के युद्ध में मुगल फौजदार हसन अली खाँ ने जाटों को परास्त किया और गोकुला को बंदी बनाकर मार डाला।

1685ई. में राजाराम के नेतृत्व में जाटों ने दूसरा जाट विद्रोह किया। यह विद्रोह अधिक संगठित था। इस युद्ध में जाटों ने छापामार हमलों के साथ – साथ लूटमार की नीति अपनायी।

राजाराम ने सिकंदरा में स्थित अकबर के मकबरे को लूटा था और मकबरे से अकबर की हड्डियाें को निकाल कर जला दिया था।

1688 ई. में राजाराम की मृत्यु के बाद इसके भतीजे चूरामन ने जाट नेतृत्व की बागडोर संभाली और औरंगजेब की मृत्यु तक विद्रोह करता रहा। अंत में उसने मथुरा के निकट भरतपुर नामक एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की।