गुजरात का चालुक्य वंश (940 ई. -1244 ई.)

  • संस्थापक – मूलराज प्रथम ( 942 से 995 ई.)
  • राजधानी – अन्हिलवाड़ को बनाया .
  • शासनकाल – 940 ई. – 1244 ई.

गुजरात के चालुक्य वंश की स्थापना मूलराज-1 के द्वारा की गयी थी एवं अपनी राजधानी अन्हिलवाड़ को बनाया था। भमी-1 के सामन्त विमल शाह ने माउन्ट आबू, राजस्थान में दिलवाड़ा जैन मंदिर का निर्माण करवाया था। भीम-1 के समय महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया था तथा भारी लूटपाट की थी। मूलराज-2 ने 1178 ई. में आबू पर्वत के समीप मुहम्मद गौरी को परास्त किया। 1187 ई. में कुतुबुद्दीन एबक ने भीम-2 को परास्त किया था।

चौलुक्य अथवा सोलंकी अग्निकुल से उत्पन्न राजपूतों में से एक थे । वाडनगर लेख में इस वंश की उत्पत्ति ब्रह्मा के चुलुक अथवा कमण्डलु से बताई गयी है । उन्होंने गुजरात में दसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से तेरहवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक शासन किया। उनकी राजधानी अन्हिलवाड़ में थी ।

अन्हिलवाड़ के चौलुक्यों के उदय के पूर्व गुजरात का इतिहास सामान्यत कन्नौज के गुर्जर प्रतिहारों से संबंधित है । प्रतिहार महेन्द्रपाल का साम्राज्य गुजरात तक विस्तृत था तथा उसके उत्तराधिकारी महीपाल ने भी कम से कम 914 ई. तक यहाँ अपना अधिकार बनाये रखा ।

महीपाल की राष्ट्रकूट शासक इन्द्र तृतीय (915-17 ई॰) द्वारा पराजय के पश्चात् प्रतिहारों की स्थिति निर्बल पड़ गयी । राष्ट्रकूटों के साथ अनवरत संघर्ष के परिणामस्वरूप गुजरात क्षेत्र भारी अराजकता एवं अव्यवस्था का शिकार हो गया । प्रतिहारों तथा राष्ट्रकूटों के पतन के उपरान्त चौलुक्यों को गुजरात में अपनी सत्ता स्थापित करने का सुअवसर प्राप्त हो गया ।

गुजरात के चौलुक्य शाखा की स्थापना मूलराज प्रथम (941-995 ईस्वी) ने की थी। उसने प्रतिहारों तथा राष्ट्रकूटों के पतन का लाभ उठाते हुए नवीं शती के द्वितीयार्ध में सरस्वती घाटी में अपने लिये एक स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया ।

गुजराती अनुश्रुतियों से पता चलता है कि मूलराज का पिता राजा कल्याण-कटक का क्षत्रिय राजकुमार था तथा उसकी माता गुजरात के चापोत्कट वंश की कन्या थी । उसके पिता की उपाधि ‘महाराजाधिराज’ की मिलती है किन्तु उसकी स्वतंत्र स्थिति में संदेह है । संभवत: वह प्रतिहारों का सामन्त था ।

1. मुमराज

मूलराज एक शक्तिशाली राजा था। गद्दी पर बैठने के बाद वह साम्राज्य विस्तार के कार्य में जुट गया। कादि लेख से पता चलता है कि उसने सारस्वत मण्डल को अपने बाहुबल से जीता था। कुमारपालकालीन वाडनगर प्रशास्ति से पता चलता है कि उसने चापोत्कट राजकुमारों की लक्ष्मी को बन्दी बना लिया था।

2. चामुंडराज

मूलराज प्रथम का पुत्र चामुण्डराज उसकी मृत्यु के बाद 995 ईस्वी में राजा हुआ । उसने धारा के परमार शासक सिम्मुराज के विरुद्ध सफलता प्राप्त की परन्तु वह लाट प्रदेश पर अधिकार रख सकने में सफल नहीं रहा तथा वारण के पुत्र गोग्गिराज ने पुन वहाँ अपना अधिकार जमा लिया । कलचुरि नरेश कोक्कल द्वितीय ने उसे पराजित कर दिया ।

3. दुर्लभराज

चामुण्डराज के दो पुत्र थे- बल्लभराज तथा दुर्लभराज । बल्लभराज की मृत्यु अपने पिता के काल में ही हो गयी । अत: चामुण्डराज के बाद दुर्लभराज शासक बना । उसने लाट प्रदेश को पुन, जीत लिया । इस समय लाट प्रदेश का शासक कीर्तिपाल था । दुर्लभराज ने उसी को हराकर लाट का प्रदेश जीता था । वाडनगर लेख तथा जयसिंहसूरि के ग्रन्थ कुमारपालभूपालचरित से इस विजय की सूचना मिलती है ।

4. भीमदेव राज

दुर्लभराज का उत्तराधिकारी उसका भतीजा भीमदेव प्रथम हुआ । वह अपने वंश का सबसे शक्तिशाली राजा था । उसके प्रबल प्रतिद्वन्दी परमार भोज तथा कलचुरि नरेश कर्ण थे । ऐसा प्रतीत होता है कि प्रारम्भ में भोज ने भीम पर दबाव बढ़ाया तथा उसे कुछ सफलता भी मिली ।

उदयपुर लेख से पता चलता है कि भोज ने भीम को पराजित किया था । किन्तु शीप्र ही भीम ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली तथा उसने परमार नरेश भोज के विरुद्ध कलचुरि नरेश कर्ण के साथ मिलकर एक संघ तैयार किया । इस संघ ने मालवा के ऊपर आक्रमण कर धारा नगर को लूटा ।

5. कर्ण

भीम का पुत्र कर्ण एक निर्बल शासक था । उसे मालवा के परमारों ने पराजित किया । नाडोली के चौहानों ने भी उसके राज्य पर आक्रमण कर उसकी सत्ता को थोड़े समय के लिये चलायमान कर दिया ।

प्रबन्धचिन्तामणि से पता चलता है कि कर्ण ने आशापल्ली के भिल्ल राजा आशा के विरुद्ध सफलता प्राप्त की थी । कुमारपाल के चित्तौड़गढ़ लेख में कर्ण के सूदकूप पहाड़ी दर्रे के पास मालवों को जीतने का श्रेय दिया गया है । किन्तु इसकी पुष्टि अन्य स्रोतों से नहीं होती ।

विजयों की अपेक्षा कर्ण की रुचि निर्माण-कार्यों में अधिक थी । कर्णावती नामक नगर बसाकर वहाँ उसने कर्णेश्वर का मन्दिर तथा कर्णसागर नामक झील का निर्माण करवाया था । अन्हिलवाड़ के कर्णमेरु नामक मन्दिर के निर्माण का श्रेय भी उसी को दिया जाता है ।

6. जयसिंघ सिद्धराज

जयसिंह एक महान् योद्धा तथा विजेता था जिसने सभी दिशाओं में विजय प्राप्त की । उसकी प्रारम्भिक सफलताओं में से एक सौराष्ट्र के आभीर शासक को पराजित करना था। मेरुतुंग लिखता है कि आभीर शासक नवघन ने गिरनार से आगे बढ़ते हुए चालुक्य सेना को ग्यारह बार पराजित किया तथा वर्धमान (झल्वर) एवं दूसरे नगरों को घेर लिया ।

जयसिंह ने बारहवीं बार स्वयं उसके विरुद्ध अभियान करते हुए उसे मार डाला तथा अपनी ओर से सज्जन को सुराष्ट्र का दण्डाधिपति नियुक्त किया। दोहर्द लेख से भी इसकी पुष्टि होती है जहाँ बताया गया है कि जयसिंह ने सुराष्ट्र के राजा को बन्दी बना लिया था ।

7. कुमारपाल

जयसिंह का अपना कोई पुत्र नहीं था । अत: उसकी मृत्यु के पश्चात् कुमारपाल राजा बना । विभिन्न स्रोतों से उसके राज्यारोहण के पूर्व जीवन के विषय में जो सूचना मिलती है उसके अनुसार वह निम्न कुल (हीन उत्पत्ति) का था । इसी कारण जयसिंह उससे घृणा करता था । किन्तु जैन आचार्यो तथा मंत्री उदयन एवं सेनापति कान्हड़देव की सहायता से उसने राजगद्दी प्राप्त कर ली ।

8. अजयपाल

कुमारपाल के बाद उसका भतीजा अजयपाल राजा बना । गुजराती अनुश्रुतियों तथा मुस्लिम स्रोतों से पता चलता है कि उसने कुमारपाल की विष द्वारा हत्या करा दी थी । अजयपाल ने 1176 ईस्वी तक राज्य किया । उसके काल में शैव प्रतिक्रिया हुई । जैन ग्रन्थों के अनुसार उसने कपर्दिन नामक ब्राह्मण, जो दुर्गा का भक्त था, को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया तथा अन्य शैवों को भी प्रमुख प्रशासनिक पद दिये ।

उसकी उपाधि ‘परममाहेश्वर’ की मिलती है । मेरा उसकी हिंसक प्रवृति का उल्लेख करते हुए लिखता है कि उसने अपने मंत्री कपर्दिन तथा जैन आचार्य रामचन्द्र की हत्या करा दी । इसके अतिरिक्त उसने साधुओं की हत्या करायी तथा जैन मन्दिरों को ध्वस्त करवा दिया । सैनिक दृष्टि से उसकी मात्र यही उपलब्धि बताई गयी है कि उसने सपादलक्ष के चाहमान शासक सोमेश्वर को पराजित किया था । उसके किसी नौकर ने छूरा भोंककर उसकी हत्या कर दी ।

9. भीमदेव द्वितीय

अजयपाल के पश्चात् मूलराज द्वितीय राजा बना जो उसका पुत्र था । उसका शासन मात्र दो-ढाई वर्ष का ही रहा । उसने किसी तुर्क आक्रान्ता को पराजित किया था । इसे म्लेच्छ या हम्मीर कहा गया है । उसके बाद उसका छोटा भाई भीम द्वितीय राजा बना । आबू तथा नागौर क्षेत्रों पर अधिकार के लिये उसका चाहमान शासक पृथ्वीराज से संघर्ष हुआ ।

बाद में दोनों के बीच समझौता हो गया । 1178 ई. में मुइजुद्दीन गोरी के नेतृत्व में तुर्कों ने उसके राज्य पर आक्रमण किया किन्तु काशह्द के मैदाने में भीम ने उन्हें बुरी तरह पराजित कर दिया । इस युद्ध में नड्डुल के चाहमानों ने भीम का साथ दिया था । इसके बाद भी आक्रमण होते रहे ।

1178 ईस्वी में उसके राज्य पर मुसलमानों के आक्रमण हुए जिसका भीम ने सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया। 1195 ईस्वी में उसने कुतुबुद्दीन को हराकर उसे अजमेर तक खदेड़ दिया । परन्तु दूसरे वर्ष (1197 ईस्वी) वह पराजित हुआ ।