सल्तनतकालीन स्थापत्य कला

कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद

1192 ई. में तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज चौहान के हारने क बाद उनके क़िले पर अधिकार कर वहाँ पर कुतुबुद्दीन ऐबक ने ‘क़ुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद’ का निर्माण करवाया। पहले यह जैन मंदिर था बाद में विष्णु मंदिर बना एवं फिर ऐबक ने इसे मस्जिद बना दिया। भारतीय-इस्लामिक शैली में निर्मित यह प्रथम स्थापत्य है। इसका विस्तार इल्तुतमिश एवं अलाउद्दीन खिलजी ने किया।

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अढ़ाई दिन का झोंपड़ा

कुतुबुद्दीन ऐबक ने अजमेर में इसका निर्माण करवाया था यह एक संस्कृत विद्यालय था । इसकी दीवारों पर हरिकेलि नाटक के अंश है

ढाई दिन का झोंपड़ा  का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने वहां पर पहले से मौजूद संस्कृत महाविद्यालय को तोड़कर इसे मस्जिद का रुप दिया था। ढाई दिन का झोंपड़ा का निर्माण 1194 ईस्वी में हुआ था।

तराइन के दूसरे युद्ध में मोहम्मद गौरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच भयंकर युद्ध हुआ। कई राजपूत राजा मोहम्मद गोरी का साथ दे रहे थे, जिसमें सबसे बड़ा नाम राजा जयचंद का था। पृथ्वीराज चौहान से लगातार 16 बार युद्ध में हार झेल चुके मोहम्मद गोरी को जब राजा जयचंद का साथ मिला तो उसने पृथ्वीराज चौहान को कैद कर लिया और अपने साथ गजनी ले गया।

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कुतुब मीनार

निर्माण कुतुबद्दीन एकब ने करवाया। इल्तुतमिश ने 3 मंजिल बनवाई एवं फिरोजशाह तुगलक ने मरम्मत एवं 1 मंजिल बनवायी एवं सिकंदर लोदी ने भी मीनार की मरम्मत करवायी।

क़ुतुब मीनार भारत  में दक्षिण दिल्ली शहर के महरोली भाग में स्थित, ईंट से बनी विश्व की सबसे ऊँची मीनार है। यह दिल्ली का एक प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल है। इसकी ऊँचाई 72.5 मीटर  (237.86 फ़ीट ) और व्यास 14.3 मीटर है, जो ऊपर जाकर शिखर पर 2.75 मीटर  (9.02  फ़ीट ) हो जाता है। इसमें 379 सीढियाँ हैं। मीनार के चारों ओर बने अहाते में भारतीय कला के कई उत्कृष्ट नमूने हैं, जिनमें से अनेक इसके निर्माण काल सन 1192 के हैं। यह परिसर यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर  के रूप में स्वीकृत किया गया है।

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सुल्तानगढ़ी का मकबरा

इल्तुतमिश ने इसका निर्माण दिल्ली में करवाया। सुल्तान गढ़ी पहले इस्लामिक समाधि था, 1231 ई. में प्रिंस नासिरुद-दीन महमूद, इल्तुमिश के सबसे बड़े बेटे, “फ़नरी लैंडस्केप ऑफ़ दिल्ली के लिए नांगल देवत में बनाया गया था।

इल्तुमिश गुलाम वंश का तीसरा सुल्तान था जिसने 1278 से 1236 ई। तक दिल्ली में शासन किया। वह क्षेत्र जहाँ गारी (अर्थ: गुफा) स्थित है, मध्ययुगीन दिल्ली का हिस्सा था जिसे दास राजवंश के रूप में जाना जाता है, जो कि 1206 से 1290 ई. की अवधि के दौरान शासन करता था, पूर्व से एक हिंदू मंदिर के रूप में विद्यमान था।गुर्जर-प्रतिहार युग (700 से 1100ई.)। यह क्षेत्र अब कुतुब परिसर का हिस्सा है।

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हौज्-ए-शम्शी/शम्शी ईदगाह

हौज़-ए-शम्शी एक तालाब है, जिसे दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश के शासन काल के दौरान बनवाया गया था। चौहानो की हार के बाद कुतुबद्दीन ने दिल्ली का सिंहासन संभाला तो उसने क़िला रायपिथौरा और लालकोट में ही अपना डेरा जमाया। इस वंश के शम्शुद्दीन इल्तुतमिश के शासन 1211-1236 ई. के दौरान महरौली के दक्षिणी हिस्से में एक हौज़ का निर्माण किया गया। इसे ‘हौज़-ए-शम्शी’ का नाम दिया गया।

  • इल्तुतमिश के ‘शम्शी’ परिवार का होने के कारण ही इस तालाब को हौज़-ए-शम्शी नाम मिला था। उस समय के इतिहासकारों के अनुसार इल्तुतमिश के माता पिता मध्य एशिया के इल्बारी कबीले के शम्शी परिवार के थे।
  • दिल्ली की राजगद्दी पर बैठने वाला पहला तुर्क इल्तुतमिश था। इसके साथ ही दिल्ली में एक नए वंश के शासन की शुरुआत हुई थी।
  • दिल्ली की गद्दी संभालने के पहले इल्तुतमिश मुहम्मद गोरी का ग़ुलाम था।
  • हौज़-ए-शम्शी तालाब के बनाए जाने के बारे में एक रोचक कहानी बताई जाती है। यह कहानी कुछ इस प्रकार है-

“तत्कालीन समय में दिल्ली की पानी की समस्या से निपटने के लिए इल्तुतमिश एक तालाब बनवाने पर विचार कर रहा था। वह यह तय नहीं कर पा रहा था कि यह तालाब कहां पर बनाया जाए। एक रात उसे सपने में हजरत मोहम्मद दिखाई दिए। उन्होंने एक ख़ास जगह की ओर इशारा करके उसे वहां पर हौज़ बनवाने को कहा। सुबह उठने पर इल्तुतमिश बताई गई जगह पर गया। उसे वहां पर घोड़े के ‘हूफ’ यानी खुर का निशान दिखाई दिया। इल्तुतमश ने जहां पर यह निशान दिखाई दिया था, वहां पर एक छतरी बनवाई तथा उसके चारों ओर इस हौज़ का निर्माण करवाया।” यह कहानी कितनी ठीक है, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन यह हौज़ आज भी है।

अलाई दरवाजा

यह कुव्वत उल इस्लाम मस्जिद का प्रवेश द्वार है अलाउद्दीन खिलजी ने बनवाया यहां पहली बार घोड़े की नाल की आकृत में मेहराब (वृत्त के चाप की सी संरचना) बनाया गया।

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जमात खाना मस्जिद

जमात खाना मस्जिद का निर्माण दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलजी ने निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह के पास करवाया था। पूर्णतः इस्लामी शैली में निर्मित इस मस्जिद में लाल पत्थरो का इस्तेमाल किया गया है। मस्जिद के डाटों के कोने में कमल के पुष्प से मस्जिद में हिन्दू शैली के प्रभाव का आभास होता है। डाटों पर ‘क़ुरान’ की आयतें भी उत्कीर्ण हैं।

जमात ख़ाँ मस्जिद में तीन कमरे बने हैं, जिनमें दो कमरे आयताकार हैं तथा मस्जिद के मध्य भाग में निर्मित कमरा चोकोर है। पूर्णरूप से इस्लामी परम्परा में निर्मित यह भारत की पहली मस्जिद है। ख़िलजी वंश के शासन काल में पूर्णत: निर्मित अन्य निर्माण कार्यों में क़ुतुबुद्दीन मुबारक ख़िलजी द्वारा भरतपुर में निर्मित ‘ऊखा मस्जिद’ एवं ख़िज़्र ख़ाँ द्वारा निर्मित ‘निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह’ विशेष उल्लेखनीय हैं।

ऊखा मस्जिद

  • उखा मस्जिद राजस्थान के भरतपुर जिले के बयाना में स्थित राजस्थान की सबसे प्राचीन मस्जिद में से एक है जिसका निर्माण 720 ईस्वी में किया गया था।
  • यह मस्जिद पहले एक मंदिर था जिसे बहा अल-दीन तुगरुल द्वारा मंदिर में परिवर्तित किया गया था।
  • मंदिर-मस्जिद के इस पवित्र मिश्रण को ऊखा मंदिर की मस्जिद भी कहा जाता है।
  • इस अनोखी मस्जिद का निर्माण लाल बलुआ पत्थर से किया गया है जो इसे शाही और समृद्ध रूप देता है।
  • यदि आप राजस्थान की यात्रा पर हैं या राजस्थान में घूमने के लिए प्रमुख मस्जिदे सर्च कर रहे हैं तो उखा मस्जिद घूमने जरूर आयें और इस अद्भुद संयोजन को अपनी आँखों से देखने का शोभाग्य प्राप्त करें।
  • जमात ख़ाँ मस्जिद का निर्माण दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलजी ने निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह के समीप करवाया था।
  • पूर्णतः इस्लामी शैली में निर्मित इस मस्जिद में लाल पत्थर का प्रयोग किया गया है। मस्जिद के डाटों के कोने में कमल के पुष्प से मस्जिद में हिन्दू शैली के प्रभाव का आभास होता है।
  • डाटों पर ‘क़ुरान’ की आयतें भी उत्कीर्ण हैं।
  • जमात ख़ाँ मस्जिद में तीन कमरे बने हैं, जिनमें दो कमरे आयताकार हैं तथा मस्जिद के मध्य भाग में निर्मित कमरा चोकोर है।
  • पूर्णरूप से इस्लामी परम्परा में निर्मित यह भारत की पहली मस्जिद है।
  • ख़िलजी वंश के शासन काल में पूर्णत: निर्मित अन्य निर्माण कार्यों में क़ुतुबुद्दीन मुबारक ख़िलजी द्वारा भरतपुर में निर्मित ‘ऊखा मस्जिद’ एवं ख़िज़्र ख़ाँ द्वारा निर्मित ‘निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह‘ विशेष उल्लेखनीय हैं।

तुगलकाबाद किला

इसका निर्माण गयासुद्दीन तुगलक ने करवाया। तुगलकाबाद किला नई दिल्ली में एक मील का पत्थर है जिसे 1321 में दिल्ली सल्तनत के प्रसिद्ध तुगलक राजवंश के संस्थापक गयास-उद-दीन तुगलक द्वारा बनाया गया था। उन्होंने दिल्ली के तीसरे शहर की स्थापना की जिसे एक बार फिर 1327 में छोड़ दिया था। किला तुगलकाबाद इंस्टीट्यूशनल एरिया के साथ-साथ तुग़लकाबाद  के नजदीकी इलाके को अपना नाम देता है।

तुगलक ने कुतुब-बदरपुर रोड का भी निर्माण किया जिसने नए शहर को ग्रैंड ट्रंक रोड से जोड़ा। सड़क को आज महरौली-बदरपुर रोड कहा जाता है। किला डॉ कर्णी सिंह शूटिंग रेंज और प्रसिद्ध ओखला औद्योगिक क्षेत्र के पास स्थित है।

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गयासुद्दीन तुगलक का मकबरा

यह दिल्ली में स्थित पंचकोंणीय है। दिल्ली में तुगलकाबाद के किले के सामने एक खूबसूरत मकबरा है जो कि दिल्ली के बादशाह ग्यासुद्दीन तुगलक (1321-25 ई.) का है जिसने तुगलक वंश की स्थापना की थी l यह एक सुंदर इमारत है जो कि एक छोटे किले की तरह दिखती है। यह एक दर्शनीय स्थल है जो कि तुगलकाबाद किले के ठीक सामने है।

मूल रूप से यह बड़े तालाब के बीच में था और एक पुल के जरिए तुगलकाबाद के किले से जुड़ा हुआ था। अब इस सेतु के बीच में से महरौली-बदरपुर रोड जाती है। मकबरा गियासुद्दीन तुग़लक़ ने खुद अपने लिए 1321 में बनवाया था।

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आदिलाबाद किला

मोहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली में बनवाया था। आदिलाबाद, तुगलकाबाद के दक्षिण में पहाड़ियों पर बना मामूली आकार का एक किला, जहाँपनाह शहर के आसपास की सीमा पर सुरक्षात्मक विशाल प्राचीर प्रदान किया गया था।

यह किला अपने पूर्ववर्ती किले, तुगलकाबाद किले से बहुत छोटा था, लेकिन समान था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने संरक्षण के लिए किले की स्थिति के अपने मूल्यांकन में दर्ज किया है कि दो द्वार, आदि।

दक्षिण-पूर्व में दो गढ़ों के बीच और दक्षिण-पश्चिम में एक बर्बरीक के साथ अंदर, यह, एक बेली द्वारा अलग किया गया है, एक गढ़ है जिसमें दीवारों, गढ़ और द्वार शामिल हैं।

आदिलाबाद किले को ‘मुहम्मदाबाद’ के नाम से भी जाना जाता था, लेकिन बाद के दिन के विकास के रूप में इसका अनुमान लगाया गया था। आदिलाबाद किले के दक्षिण-पूर्व और दक्षिण-पश्चिम में दो द्वार निचले स्तर पर कक्ष थे जबकि पूर्व और पश्चिम के द्वार में ऊपरी मंजिल पर अनाज के डिब्बे और आंगन थे।

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कोटला फिरोजशाह

दिल्ली में फिरोज शाह तुगलक ने निर्माण करवाया।

फिरोज शाह कोटला एक किला है, जिसे 1360 में फिरोज शाह तुगलक ने बनवाया था, उस समय उन्‍होने दिल्‍ली के पांचवे शहर की स्‍थापना की थी।

किले के अवशेषों के साथ – साथ जामा मस्जिद और अशोक स्‍तम्‍भ के बचे अवशेष भी फिरोजाबाद में स्थित हैं। फिरोज शाह कोटला, यमुना नदी के तट पर स्थित है। यह जगह ज्‍यादातर अशोक के स्‍तंभ के कारण प्रसिद्ध है जो तीन मंजिला संरचना है।

कहा जाता है कि इस 13 मीटर ऊंचे खंभे को फिरोज शाह कोटला के द्वारा मेरठ से लाया गया था, जिसे सम्राट अशोक ने बनवाया था। इस खंभे का मुख्‍य उद्देश्‍य अशोक के अन्‍य स्‍तंभों की तरह जनता के बीच बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करना है।

हालांकि यह स्‍तंभ बलुआ पत्‍थर का बना हुआ है, लेकिन देखने में यह धातु जैसा लगता है और दोपहर को सूरज की किरणों के पड़ने पर चमकता है। यह समय फिरोज शाह कोटला को घूमने का सबसे अच्‍छा समय है।

इसके निकट स्थित अन्‍य आकर्षण जामा मस्जिद और राज घाट हैं।

भारत की आजादी प्राप्‍त करने से पहले इस राजधानी शहर में कई ऑडीटोरियम यानि सभागार नहीं थे। उस दौरान, अधिकाशत: संगीत के कार्यक्रम और अन्‍य कला शो, फिरोज शाह कोटला के या फिर कुतुब परिसर में हुआ करते थे।

फिरोज शाह कोटला के नजदीक अन्‍य भ्रमण लायक स्‍थल प्र‍गति मैदान, राजघाट और चांदनी चौक हैं।