कादिरी सिलसिला

  • स्थापना – बगदाद के शेख अब्दुल कादिर जिलानी।
  • सदी – 12वीं सदी।
  • पहले संत – शाह नियामत उल्ला और नासिरुद्दीन महमूद जिलानी।

कादिरी सम्प्रदाय की स्थापना बगदाद के शेख अब्दुल कादिर जिलानी ने 12वीं सदी में की थी । भारत में इस सम्प्रदाय के पहले संत शाह नियामत उल्ला और नासिरुद्दीन महमूद जिलानी थे । शेख अब्दुल जाकिर फतेहपुर सीकरी के दीवान-ए-आम में नमाज पढ़ते थे जिस पर अकबर ने विरोध किया तो शेख ने उत्तर दिया- ”मेरे बादशाह, यह आपका साम्राज्य नहीं है कि आप आदेश दें ।”  शाहजहाँ का ज्येष्ठ पुत्र दाराशिकोह कादिरी सूफी सम्प्रदाय का अनुयायी बन गया था और ‘मियां मीर’ से लाहौर में मुलाकात की थी । बाद में दाराशिकोह मुल्लाशाह बदख्शी का शिष्य बन गया ।

कादिरी या कदीरिया सिलसिला की स्थापना ‘सैय्यद अबुल कादि अल गिलानी’ ने की थी। इनको ‘पीरान-ए-पीर’ (संतो के प्रधान) तथा ‘पीर-ए-दस्तगीर’ (मददगार संत) आदि की उपाधियाँ प्राप्त थीं। भारत में इस ‘संघ’ या ‘सिलसिले’ के प्रवर्तक ‘मुहम्मद गौस’ थे।

कादिरी सिलसिले के अनुयायी गाने-बजाना पसन्द नहीं करते थे और इसके घोर विरोधी थे। इस सिलसिले के अनुयायी हरे रंग की पगड़ियाँ सिर पर धारण करते थे।

मुग़ल बादशाह शाहजहाँ का पुत्र दारा शिकोह इस सिलसिले का अनुयायी था। दारा शिकोह ‘मुल्लाशाह बदख्शी’ का शिष्य था।

भारत में प्रारंभ में यह सिलसिला ‘उच्छ’ (सिंध) में सीमित था, परन्तु बाद में आगरा एवं अन्य स्थानों पर भी फैल गया।