मालवा राज्य

परमार वंश

परमार वंश की उत्पत्ति गुर्जर प्रतिहारों की भांति अग्निकुण्ड से बतायी जाती है परन्तु प्राचीन लेखों से ये सिद्ध होता है कि परमार शासकों का उद्भव राष्ट्रकूटों के कुल से हुआ। परमार वंश की स्थापना उपेन्द्र अथवा कृष्ण राज ने दसवीं शताब्दी के आरम्भ में की थी। पहले परमार राष्ट्रकूटों के सामन्त थे। वीरसिंह द्वितीय ने धार नगरी पर अधिकार किया। सीयक द्वितीय ने मालवा के स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। मालवा के परमारों की वास्तविक शक्ति का विकास वाक्यपति मुंज ने किया था। वाक्यपति मुंज ने उल्पलराज, अमोघवर्ष, श्री वल्लभ एवं पृथ्वी वल्लभ की उपाधि धारण की।

भोज

भोज ने चालुक्य नरेश जयसिंह द्वितीय को पराजित किया एवं मुंज की हार का बदला लिया। बाद में चालुक्य नरेश सोमेश्वर ने धार पर आक्रमण किया एवं जयसिंह द्वितीय की हार का बदला लिया। भोज के बाद मालवा पर सोलंकियों ने अपना अधिकार कर लिया। इल्तुतमिश एवं अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा को लूटा।

होशंगशाह

होशंगशाह ने राजधानी धार से मांडू स्थापित की। यह गुजरात में लड़े गये युद्ध में पराजित हुआ एवं बंदी बना लिया गया। बाद में गुजरात के शासकों के अनुग्रह से प्राप्त सत्ता पर वह 1432 ई. तक बना रहा। मांडू के किले का निर्माण हूशंगशाह ने करवाया था। इस किले में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है – दिल्ली दरवाजा। होशंगशाह के बाद उसका पुत्र सुल्तान महमूद गोरी गद्दी पर बैठा परन्तु 1436 ई. में उसके वजीर महमूद खां खिलजी ने महमूद गोरी को जहर दे दिया एवं मालवा में खिलजी वंश की स्थापना की

खिलजी वंश

चित्तौड़ के राणा एवं महमूद खिलजी के मध्य युद्ध हुआ संभवतः यह अनिर्णीत युद्ध था। राणा ने इस विजय के उपलक्ष में चित्तौड़ में विजय स्तंभ बनवाया। ठीक इसी प्रकार खिलजी ने भी विजय का दावा करते हुए माण्डू में एक मीनार बनवायी बाद में यह गिर गयी)। महमूद खिलजी के बाद सुल्तान गयासुद्दीन गद्दी पर बैठा परन्तु उसके पुत्र नासिरूद्दीन ने उसे जहर देकर मार दिया। नासिरूद्दीन गद्दी पर बैठा परन्तु कुछ समय बाद वह बुखार से मर गया। नासिरूद्दीन के बाद खिलजी वंश का अंतिम सुल्तान महमूद-II खिलजी गद्दी पर बैठा। कुछ समय बाद गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने महमूद-II को पराजित कर मार डाला एवं 1531 ई. में मालवा को गुजरात में मिला लिया।

कश्मीर राज्य

सुहा देव नामक एक हिंदू ने 1301 ईस्वी में कश्मीर में हिंदू राज्य की स्थापना की थी। चौदहवीं सदी के आरंभ में शाह मिर्जा अथवा मीर नामक मुसलमान ने कश्मीर पर अधिकार कर लिया एवं एक मुस्लिम वंश की स्थापना की। जो शमसुद्दीन शाहमीर के नाम से गद्दी पर बैठ गया। शमसुद्दीन शाहमीर ने अपनी राजधानी इंद्रकोर्ट में स्थापित किया। अलाउद्दीन ने राजधानी इंद्र कोर्ट से हटाकर अलाउद्दीनपुर (श्रीनगर) में स्थापित की।

सुल्तान सिकन्दर

सुल्तान सिकन्दर के समय में तैमूर का आक्रमण हुआ था। तैमूर ने कश्मीर पर आक्रमण नहीं किया था।

सुल्तान जैनुल आबिदीन

इसने लंबे समय तक कश्मीर पर शासन किया। यह धार्मिक रूप से सहिष्णु था। गौ हत्या पर प्रतिबंध लगाया एवं स्वयं मांस नहीं खाता था। संतों का आदर करता था। साहित्य, चित्रकला एवं संगीत को प्रोत्साहन दिया। इन गुणों के कारण यह कश्मीर का अकबर कहा जाता है। मिर्जा हैदर दुगलत (हुमायुं का रिश्तेदार) ने कश्मीर पर विजय प्राप्त की एवं स्वतंत्र (व्यवहारिक), हुमायुं का सूबेदार बनकर राज्य करता था। जैनुलाब्दीन फारसी, संस्कृत, कश्मीर, तिब्बती, आदि भाषाओं का ज्ञाता था। इसने महाभारत एवं का फारसी में अनुवाद कराया। कुछ वर्षों बाद कश्मीर पर चाक वंश ने अधिकार कर लिया। चाक वंश को 1586 में अकबर ने नष्ट कर दिया।